मामला सारांश (At a Glance)
| पहलू | विवरण |
| माननीय पीठ | न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद एवं न्यायमूर्ति संजय प्रसाद |
| विवाह की अवधि | 1989 से (लगभग 35 वर्ष) |
| पति के मुख्य आरोप | गाय न रखने देना, शौचालय बंद करना, पानी की आपूर्ति काटना और घर से निकालना। |
| मुख्य सिद्धांत | घरेलू छोटी-मोटी असहमति या तकरार 498A या तलाक का आधार नहीं बन सकती; परित्याग के लिए स्थायी अलगाव की मंशा जरूरी। |
| हाई कोर्ट का निर्णय | तलाक की याचिका पूरी तरह खारिज। |
Grounds for Divorce: झारखंड हाईकोर्ट (Jharkhand High Court) ने एक 58 वर्षीय पति द्वारा अपनी पत्नी से तलाक की मांग करने वाली याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि घरेलू छोटी-मोटी अनबन, जैसे—घर में गाय न रखने देना या बाथरूम की आपूर्ति काटना, किसी भी सूरत में 35 साल पुरानी शादी को तोड़ने का वैध आधार (Grounds for Divorce) नहीं बन सकती।
न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद (Justice Sujit Narayan Prasad) और न्यायमूर्ति संजय प्रसाद (Justice Sanjay Prasad) की खंडपीठ ने 6 अगस्त के अपने आदेश में कहा कि एक शादी में जो बात क्रूरता (Cruelty) लग सकती है, वह किसी अन्य मामले में समान नहीं हो सकती। हर मामला अपने विशिष्ट तथ्यों पर निर्भर करता है।
हाई कोर्ट की प्रमुख और महत्वपूर्ण टिप्पणियां
- आरोपों की प्रकृति और विवाह का लंबा इतिहास:“यद्यपि याचिकाकर्ता ने अपने हलफनामे में कहा कि उसकी पत्नी ने शौचालय का दरवाजा बंद करके, कभी पानी का कनेक्शन काटकर और घर में गाय न रखने देकर उसे प्रताड़ित किया; लेकिन अदालत का यह विचार है कि ये कथित विशिष्ट कृत्य और आचरण इतने गंभीर प्रकृति के नहीं हैं कि लगभग 35 वर्षों के लंबे वैवाहिक संबंधों को समाप्त कर दिया जाए।”
- वैवाहिक ‘क्रूरता’ (Cruelty) की कोई निश्चित परिभाषा नहीं:
- पीठ ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत ‘क्रूरता’ की कोई एक निश्चित या स्थिर परिभाषा नहीं है। यह दोनों पक्षों के जीवन स्तर, सामाजिक पृष्ठभूमि, व्यवहार और व्यक्तिगत स्वभाव पर निर्भर करता है।
- स्वास्थ्य, प्रतिष्ठा या आजीविका को गंभीर नुकसान पहुँचना क्रूरता तय करने का मुख्य मानदंड होता है, न कि रोजमर्रा की मामूली अनबन।
- परित्याग (Desertion) का कानूनी सिद्धांत:
- पति के ‘परित्याग’ (घरेलू अलगाव) के दावे पर अदालत ने कहा कि केवल अलग रहना ही परित्याग नहीं कहलाता। इसके लिए वैवाहिक संबंध को स्थायी रूप से समाप्त करने की मंशा (Intention to Permanently End) साबित होनी चाहिए। यदि कोई जीवनसाथी गुस्से या नाराजगी में घर छोड़ता है, तो उसे कानूनी परित्याग नहीं माना जा सकता।
मामले का बैकग्राउंड (Case Background)
- 31 साल साथ रहने के बाद विवाद: दंपत्ति का विवाह 1989 में हिंदू रीति-रिवाजों से हुआ था। उनके तीन बच्चे भी हैं और वे 31 साल तक साथ रहे।
- पति का दावा: 58 वर्षीय पति का आरोप था कि जून 2020 के बाद पत्नी के व्यवहार में अचानक बदलाव आया और उसने उसे अपने ही घर से निकाल दिया, जिसके बाद से वह किराए के मकान में रह रहा है।
- पारिवारिक अदालत का निर्णय: फैमिली कोर्ट ने 2024 में पति की तलाक की अर्जी खारिज कर दी थी। इसके बाद उसने झारखंड हाई कोर्ट का रुख किया। हाई कोर्ट द्वारा कराई गई मध्यस्थता (Mediation) भी विफल रही।
अदालत का अंतिम निर्णय
हाई कोर्ट ने माना कि पारिवारिक अदालत का फैसला पूरी तरह तथ्यसंगत और कानूनी सिद्धांतों के अनुरूप था। पति के आरोप केवल गंभीर वैवाहिक असहमति को दर्शाते हैं, न कि ऐसी मानसिक या शारीरिक क्रूरता को जिससे उसके जीवन या स्वास्थ्य को खतरा हो।
अदालत ने पति की अपील खारिज कर दी और शादी को बरकरार रखा।

