Human Trafficking: गुवाहाटी हाईकोर्ट ने मानव तस्करी और बाल यौन शोषण के खिलाफ एक सख्त विधिक रुख अपनाते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
सिलिगुड़ी के एक वेश्यालय में बेचने का आरोप
हाईकोर्ट के जस्टिस माइकल जोथानखुमा और जस्टिस संजीव कुमार शर्मा की खंडपीठ ने एक आरोपी की अपील को पूरी तरह खारिज करते हुए उसे निचली अदालत द्वारा दी गई 14 साल की जेल की सजा को बरकरार रखा है। दोषी ने एक नाबालिग लड़की को शादी का झांसा देकर सिलीगुड़ी के एक वेश्यालय (Brothel) में बेच दिया था। कहा, शरीर पर चोट के निशान (Injury Marks) न होने का मतलब यह कतई नहीं है कि पीड़िता के साथ दुष्कर्म नहीं हुआ था। जब किसी नाबालिग लड़की को शादी का झूठा झांसा देकर देह व्यापार (Prostitution) के दलदल में धकेल दिया जाए, तो यह समाज और मानवता के खिलाफ एक जघन्य अपराध है। ऐसे मामलों में पीड़िता की विश्वसनीय गवाही ही दोषी को सजा दिलाने के लिए अपने आप में पर्याप्त है।
मामला क्या है?: फार्मेसी जाने के बहाने अपहरण और सिलीगुड़ी में सौदा
यह दर्दनाक मामला वर्ष 2020 से शुरू हुआ था, जिसमें न्यायपालिका ने अब अंतिम मुहर लगा दी है।
घटना की पृष्ठभूमि: पीड़ित नाबालिग लड़की एक घर में घरेलू सहायिका (Domestic Help) के रूप में काम करती थी। 21 जुलाई 2020 को वह दवा लेने (फार्मेसी जाने) के बहाने घर से निकली, लेकिन मुख्य आरोपी उसे शादी का झांसा देकर अपने साथ फुसला ले गया।
वेश्यालय में बिक्री: आरोपी उसे पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी ले गया, जहां उसने सह-आरोपी महिला द्वारा चलाए जा रहे एक वेश्यालय में उसे बेच दिया। पीड़िता ने कोर्ट को बताया कि उसने अपनी आंखों से वेश्यालय की मालकिन को मुख्य आरोपी को ‘चाय के पैसे’ के रूप में ₹500 देते देखा था। इसके बाद आरोपी यह कहकर चला गया कि वह रात को लौटेगा, लेकिन वह कभी वापस नहीं आया।
पुलिस रेस्क्यू: वेश्यालय में तीन दिनों तक बंधक रहने और अज्ञात लोगों द्वारा लगातार यौन उत्पीड़न (Sexual Assault) का शिकार होने के बाद पुलिस ने एक गुप्त सूचना के आधार पर छापेमारी कर लड़की को सुरक्षित रेस्क्यू किया था।
हाई कोर्ट का विधिक दृष्टिकोण: चोट के निशान न होना बेगुनाही का सबूत नहीं
बचाव पक्ष के वकील एस. बिस्वास ने अदालत में दलील दी थी कि मेडिकल जांच में पीड़िता के शरीर पर कोई चोट के निशान नहीं मिले थे। साथ ही, रेडियोलॉजिकल (हड्डी) जांच के आधार पर लड़की की उम्र 18 से 20 वर्ष के बीच बताई गई थी, जिससे यह मामला पोक्सो एक्ट के दायरे से बाहर का लगता है। अदालत ने इन सभी दलीलों को खारिज कर दिया।
विधिक सिद्धांत का प्रतिपादन: खंडपीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से स्थापित किया कि हम पाते हैं कि विद्वान निचली अदालत ने साक्ष्यों का बिल्कुल सही मूल्यांकन किया है। यह कानून का स्थापित सिद्धांत है कि पीड़िता के शरीर पर चोट के निशान न होने का यह अर्थ नहीं निकाला जा सकता कि उसके साथ बलात्कार नहीं हुआ था। विशेष रूप से वेश्यालय जैसी परिस्थितियों में जहां पीड़िता अत्यधिक मानसिक खौफ और लाचारी में होती है।
गवाही की विश्वसनीयता: अदालत के लिए नियुक्त न्यायमित्र (Amicus Curiae) एस. शर्मा की दलीलों को स्वीकार करते हुए कोर्ट ने माना कि पीड़िता ने वेश्यालय की मालकिन और घटनाक्रम की सटीक पहचान की है। उसकी गवाही पूरी तरह से सत्य और अदालत में अटूट विश्वास जगाने वाली है।
पोक्सो अधिनियम और आईपीसी के तहत दोषसिद्धि
अदालत ने स्पष्ट किया कि यद्यपि मुख्य आरोपी ने खुद सीधे तौर पर शारीरिक उत्पीड़न नहीं किया था, लेकिन वह इस पूरे अपराध का मुख्य सूत्रधार था।
धारा 366 (IPC): शादी का झूठा वादा करके महिला को अगवा करना और उसे देह व्यापार के लिए मजबूर करना इस धारा के तहत गंभीर अपराध है।
पोक्सो की धारा 6/17 (POCSO Act): अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपी को सीधे दुष्कर्म (धारा 6) के लिए नहीं, बल्कि धारा 6/17 (गंभीरतम यौन अपराध के लिए उकसाने/सहायता करने या तस्करी करने) के तहत सही ढंग से दोषी ठहराया गया है, क्योंकि उसने नाबालिग को वेश्यालय में धकेलने का घिनौना कृत्य किया था।
विधिक केस शीट: गुवाहाटी हाई कोर्ट बनाम मानव तस्करी एवं पोक्सो वाद (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान निर्णय |
| संबंधित अदालत | गुवाहाटी उच्च न्यायालय (असम) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस माइकल जोथानखुमा और जस्टिस संजीव कुमार शर्मा |
| मुख्य कानूनी सिद्धांत | शारीरिक चोट के निशानों की अनुपस्थिति बलात्कार के साक्ष्य को खारिज नहीं कर सकती |
| लागू कानूनी धाराएं | आईपीसी की धारा 366, पोक्सो एक्ट की धारा 6/17 और अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम |
| अपराध का स्वरूप | नाबालिग को शादी का झांसा देकर सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल) के वेश्यालय में बेचना |
| अंतिम अदालती फैसला | आरोपी की अपील खारिज; 14 वर्ष के कारावास की सजा पूरी तरह बरकरार |
तस्करी का शिकार हुई लड़कियों के पुनर्वास और न्याय की दिशा में पोक्सो एक्ट की धारा 17 (दुष्प्रेरण/सहमति देना) का यह अनुप्रयोग देश की अन्य अदालतों के लिए भी एक नजीर का काम करेगा।

