Rail Ticket: हादसे के 16 साल बाद एक बुजुर्ग मां को न्याय देते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने रेलवे दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (RACT) के एक फैसले को पलट दिया है।
दावों को अनुमानों या काल्पनिक धारणाओं के आधार पर खारिज नहीं कर सकते
हाईकोर्ट के जस्टिस आरिफ डॉक्टर की एकल पीठ ने रेलवे को आदेश दिया है कि वह मृतक की मां हुशना बानू मौलाली को ₹4 लाख का मुआवजा 9% वार्षिक ब्याज के साथ अदा करे। यह ब्याज दुर्घटना के वर्ष 2010 से जोड़ा जाएगा। कहा, यदि किसी ट्रेन दुर्घटना में मृत व्यक्ति के शव से रेलवे टिकट बरामद नहीं होता है, तो केवल इस एक तथ्य के आधार पर उसे ‘बिना टिकट यात्री’ (Ticketless Traveller) नहीं माना जा सकता। विशेषकर तब, जब मृतक की मां ने हलफनामा देकर स्पष्ट किया हो कि दुर्घटना के दौरान उसका मासिक सीजन टिकट (Pass) कहीं खो गया था और रेलवे इस दावे को झूठा साबित करने में पूरी तरह नाकाम रही हो। दावों को अनुमानों या काल्पनिक धारणाओं के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।
घटनाक्रम: 2010 का उपनगरीय लोकल ट्रेन हादसा
यह कानूनी लड़ाई 21 जुलाई 2010 को शुरू हुई थी।
हादसा: 25 वर्षीय कॉल सेंटर कर्मचारी उमर मौलाली हुब्बल्ली वसई (पश्चिम) स्थित अपने घर से मीरा रोड अपने दफ्तर जाने के लिए लोकल ट्रेन से यात्रा कर रहा था। सुबह करीब 8:55 बजे वह चलती ट्रेन से दुर्घटनावश नीचे गिर गया और सिर में गंभीर चोट लगने के कारण उसकी मौत हो गई।
ट्रिब्यूनल का इनकार (2014): अप्रैल 2014 में, रेलवे ट्रिब्यूनल (RACT) ने इस आधार पर मां का दावा खारिज कर दिया कि उमर के शव से कोई टिकट बरामद नहीं हुआ था, इसलिए वह एक वैध यात्री (Bona fide Passenger) नहीं था। मां ने 2015 में इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी।
विधिक बहस: सबूत का बोझ (Burden of Proof) किस पर?
हाई कोर्ट में दोनों पक्षों के बीच महत्वपूर्ण विधिक तर्कों पर बहस हुई।
रेलवे का तर्क: रेलवे ने दलील दी कि शव के पंचनामे में ₹115 नकद और लंच कूपन तो मिले, लेकिन कोई टिकट नहीं मिला। साथ ही, उमर का शव वसई स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर मिला, जो विपरीत दिशा में था, जिससे मां के दावे पर संदेह होता है।
पीड़ित पक्ष की दलील: हुशना के वकील साईंनंद चौगुले ने तर्क दिया कि मां ने साक्ष्य का हलफनामा (Affidavit of Evidence) दाखिल कर साफ किया था कि उनके बेटे के पास वैध मासिक सीजन टिकट था, जो ट्रेन से गिरने के प्रभाव के कारण कहीं गिर गया। रेलवे ने इस हलफनामे पर कोई प्रतिपरीक्षण (Cross-Examination) नहीं किया।
हाई कोर्ट का विधिक दृष्टिकोण: धारणाओं पर नहीं चलते अदालती फैसले
जस्टिस आरिफ डॉक्टर ने रेलवे के रुख की आलोचना करते हुए ‘वैध यात्री’ की परिभाषा और विधिक जिम्मेदारी को स्पष्ट किया।
दावेदार के हलफनामे का महत्व: कोर्ट ने कहा कि यदि दावेदार प्रासंगिक तथ्यों का हलफनामा देता है, तो केवल टिकट न मिलने से दावा खारिज नहीं हो सकता।
बदला हुआ विधिक दायित्व: जैसे ही मां ने हलफनामा दिया, साबित करने की जिम्मेदारी (Burden of Proof) रेलवे पर स्थानांतरित हो गई थी। रेलवे को यह साबित करना था कि मृतक वास्तव में बिना टिकट यात्रा कर रहा था, जिसमें वह विफल रही।
यह रहा अदालत का फैसला
अदालत ने कहा, विपरीत साक्ष्यों के अभाव में, रिकॉर्ड द्वारा असमर्थित अनुमानों, धारणाओं या एक काल्पनिक वैकल्पिक स्पष्टीकरण के आधार पर मुआवजे के दावे को खारिज नहीं किया जा सकता। अदालत ने रेलवे को आदेश दिया कि वह आदेश के आठ सप्ताह के भीतर 2010 से अब तक के 9% सालाना ब्याज के साथ पूरी मुआवजा राशि का भुगतान करे।
60 वर्षीय मां का दर्द…शायद अब पति के कैंसर का इलाज हो सके
मुआवजे की खबर मिलने के बाद उमर की 60 वर्षीय मां हुशना बानू भावुक हो गईं। उन्होंने बताया कि बेटे की मौत के बाद के साल उनके परिवार के लिए बेहद दर्दनाक और तंगहाली भरे रहे हैं। 2019 में एक दुर्घटना के कारण वह खुद लाठी के सहारे चलती हैं, जबकि उनके 68 वर्षीय पति पिछले दो साल से कैंसर से पीड़ित हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस मुआवजे की रकम से अब वह अपने पति का इलाज करा सकेंगी।
विधिक फैक्ट शीट: बॉम्बे हाई कोर्ट बनाम रेलवे मुआवजा क्षेत्राधिकार (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान निर्णय |
| संबंधित न्यायालय | बॉम्बे उच्च न्यायालय, मुंबई |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस आरिफ डॉक्टर (एकल पीठ) |
| अपीलकर्ता (दावेदार) | हुशना बानू मौलाली (मृतक उमर की मां) |
| मुआवजा राशि व शर्त | ₹4 लाख की मूल राशि + 2010 से 9% वार्षिक ब्याज |
| भुगतान की समय सीमा | हाई कोर्ट के आदेश के बाद 8 सप्ताह के भीतर अनिवार्य |
| स्थापित कानूनी सिद्धांत | हलफनामे के बाद यात्री को ‘गैर-वैध’ साबित करने की जिम्मेदारी रेलवे की है |
अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि रेलवे जैसी कल्याणकारी संस्था को केवल ‘पंचनामे में टिकट नहीं मिला’ जैसी तकनीकी दलील के पीछे छिपकर अपने दायित्वों से नहीं भागना चाहिए। १६ साल का यह लंबा इंतजार भले ही बहुत कष्टदायी रहा हो, लेकिन इस फैसले ने साबित किया है कि कानून अंधा हो सकता है, लेकिन असंवेदनशील नहीं।

