Thursday, November 5, 2026
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Judicial Dignity: अब ‘लोअर कोर्ट’ नहीं, ‘ट्रायल कोर्ट’ कहिए…शब्दों की मर्यादा पर दिया जोर, पढ़ें न्यायिक शब्दावली की नसीहत

Judicial Dignity: इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस अब्दुल शाहिद की बेंच ने न्यायिक शब्दावली में एक बड़ा बदलाव किया है।

अदालत ने कोर्ट रजिस्ट्री को निर्देश दिया है कि आधिकारिक रिकॉर्ड और प्रक्रियाओं में कोर्ट बिलो (Court Below) या लोअर कोर्ट (Lower Court) जैसे शब्दों का उपयोग बंद किया जाए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन वाक्यांशों के बजाय ट्रायल कोर्ट (Trial Court) या संबंधित नामित अदालत के नाम का उपयोग किया जाना चाहिए। यह निर्देश एक आपराधिक अपील की सुनवाई के दौरान आया, जहाँ विशेष अदालत (SC/ST Act) को कोर्ट बिलो कहकर संबोधित किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला (Ethos of the Constitution)

  • हाई कोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के 2024 के ऐतिहासिक फैसले [सखावत बनाम उत्तर प्रदेश राज्य] का संदर्भ दिया।
  • संवैधानिक गरिमा: सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि किसी भी अदालत को “लोअर” या “नीची” अदालत कहना संविधान की मूल भावना और न्यायिक गरिमा के विरुद्ध है।
  • समान महत्व: न्यायपालिका में हर स्तर की अदालत का अपना महत्व है, और शब्दावली में पदानुक्रम (Hierarchy) के बजाय कार्यक्षमता (Functionality) झलकनी चाहिए।

मामला क्या था? (The Case Background)

  • यह कानूनी विवाद महोबा के जिला पंचायत अध्यक्ष जय प्रकाश अनुरागी द्वारा दर्ज कराई गई एक FIR से शुरू हुआ था।
  • आरोप: शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि जून 2025 में टेंडर प्रक्रिया के दौरान आरोपी महेश तिवारी और अंकित शुक्ला ने उनके साथ मारपीट की, गाली-गलौज की और जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया।
  • Summoning Order: इसी आधार पर विशेष न्यायाधीश (SC/ST Act), महोबा ने आरोपियों को तलब (Summon) करने का आदेश दिया था।

विरोधाभासी बयान और CCTV फुटेज

  • हाई कोर्ट ने मामले की जांच करते हुए पाया कि शिकायतकर्ता के बयानों में भारी विसंगतियां थीं।
  • बयान बदलना: शिकायतकर्ता ने पहले कुछ और भूमिकाएं बताईं, लेकिन कार्यालय के CCTV फुटेज देखने के बाद अपनी पूरी कहानी बदल दी।
  • कोर्ट की टिप्पणी: “किसी भी व्यक्ति को अपनी इच्छाओं, अनुमानों और अटकलों के अनुसार कानून की प्रक्रिया शुरू करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।” कोर्ट ने माना कि जब चश्मदीद गवाह का बयान और तकनीकी सबूत (CCTV) एक-दूसरे के विपरीत हों, तो पूरा मामला संदिग्ध हो जाता है।

हाई कोर्ट का अंतिम फैसला (The Verdict)

  • अदालत ने न केवल शब्दावली बदलने का निर्देश दिया, बल्कि मामले के मेरिट पर भी निर्णय सुनाया।
  • कार्यवाही रद्द: हाई कोर्ट ने महोबा की विशेष अदालत द्वारा जारी समन आदेश और पूरी आपराधिक कार्यवाही को क्वैश (Quash) कर दिया।
  • रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश: आदेश की प्रति रजिस्ट्रार जनरल को भेजी गई है ताकि प्रशासनिक स्तर पर “ट्रायल कोर्ट” शब्द का उपयोग अनिवार्य किया जा सके।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

पुरानी शब्दावलीनई अनिवार्य शब्दावली
Court BelowTrial Court
Lower CourtSpecial/Designated Court

महत्वपूर्ण निष्कर्ष

  • न्यायिक सम्मान: यह बदलाव जिला न्यायपालिका के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
  • झूठे मुकदमों पर लगाम: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विरोधाभासी बयानों के आधार पर किसी को कानूनी प्रक्रिया में नहीं घसीटा जा सकता।

शब्दों की अपनी शक्ति होती है

इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला बताता है कि न्याय केवल फैसलों में नहीं, बल्कि उन शब्दों में भी होना चाहिए जिनसे हम न्याय के मंदिरों को संबोधित करते हैं। “ट्रायल कोर्ट” शब्द उस स्थान की भूमिका को परिभाषित करता है जहाँ न्याय की नींव रखी जाती है, जबकि “लोअर कोर्ट” उसे कमतर दिखाने का आभास देता है।

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