Justice for Bonded Labour: सुप्रीम कोर्ट ने भारत में बंधुआ मजदूरी (Bonded Labour) और विशेष रूप से नाबालिगों की अंतर-राज्यीय तस्करी (Inter-state trafficking) पर गंभीर रुख अपनाया है।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने उस जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिया, जिसमें बंधुआ मजदूरों के मौलिक अधिकारों को लागू करने की मांग की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय श्रम और रोजगार मंत्रालय के सचिव से व्यक्तिगत हलफनामा (Affidavit) मांगा है। कोर्ट ने मंत्रालय से पूछा है कि इस अमानवीय प्रथा को रोकने और पीड़ितों के पुनर्वास के लिए अब तक क्या ठोस कदम उठाए गए हैं।
11,000 बच्चे रेस्क्यू, लेकिन मदद कितनों को?
- सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील एच.एस. फूलका ने चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए।
- रेस्क्यू: विभिन्न राज्यों से लगभग 11,000 बच्चों को बंधुआ मजदूरी से छुड़ाया गया।
- वित्तीय सहायता: इन 11,000 बच्चों में से केवल 971 बच्चों को ही तत्काल वित्तीय सहायता (Immediate Financial Assistance) प्रदान की गई।
- विवाद: कोर्ट ने चिंता जताई कि जब बच्चों को उनके गृह राज्य से दूसरे राज्य में तस्करी कर ले जाया जाता है, तो राज्यों के बीच समन्वय की कमी के कारण उन्हें ‘रिलीज सर्टिफिकेट’ और मुआवजा मिलने में भारी देरी होती है।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य निर्देश
- अदालत ने केंद्र सरकार और श्रम मंत्रालय को 3 सप्ताह के भीतर हलफनामा दाखिल करने को कहा है, जिसमें निम्नलिखित बिंदु स्पष्ट होने चाहिए।
- कार्रवाई का विवरण: तस्करी और बंधुआ मजदूरी के खिलाफ अब तक की गई कार्रवाई।
- योजना की स्थिति: बंधुआ मजदूरों के पुनर्वास के लिए चल रही योजनाओं की वर्तमान स्थिति क्या है?
- अदालती दिशा-निर्देश: मंत्रालय यह भी बताए कि इस व्यवस्था को और मजबूत करने के लिए सुप्रीम कोर्ट से उन्हें और किन निर्देशों (Further Directions) की आवश्यकता है।
पृष्ठभूमि: शाहजहांपुर का मामला
यह याचिका एक पीड़ित मजदूर की आपबीती पर आधारित है जिसे 2019 में उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर के एक ईंट भट्टे (Brick Kiln) से छुड़ाया गया था। पीड़ित को बिहार के गया जिले से एक गैर-पंजीकृत ठेकेदार द्वारा तस्करी कर लाया गया था। उसे न्यूनतम मजदूरी नहीं दी जा रही थी और उसकी आवाजाही की स्वतंत्रता पर पूरी तरह पाबंदी थी।
केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)
| बिंदु | विवरण |
| मुख्य मुद्दा | अंतर-राज्यीय तस्करी और तत्काल वित्तीय सहायता में देरी। |
| कोर्ट का निर्देश | श्रम मंत्रालय के सचिव 3 हफ्ते में व्यक्तिगत हलफनामा दें। |
| NHRC की भूमिका | प्रक्रिया को अंतिम रूप देते समय राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को शामिल करने का निर्देश। |
| अगली सुनवाई | 19 मई, 2026। |
रिलीज सर्टिफिकेट की अहमियत
बंधुआ मजदूर के लिए ‘रिलीज सर्टिफिकेट’ (Release Certificate) सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इसके बिना वह सरकारी लाभों और पुनर्वास राशि का हकदार नहीं होता। कोर्ट ने पूर्व में निर्देश दिया था कि इस सर्टिफिकेट को जारी करने और मुआवजा देने की प्रक्रिया को सरल और ‘फास्ट-ट्रैक’ बनाया जाए।
कागजों से जमीन तक का सफर
सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप इस ओर इशारा करता है कि केवल कानून बना देना काफी नहीं है। जब तक छुड़ाए गए बच्चों और मजदूरों के हाथ में तत्काल आर्थिक मदद नहीं पहुंचती, तब तक उनके फिर से तस्करी के जाल में फंसने का खतरा बना रहता है। अब 19 मई को होने वाली सुनवाई में केंद्र को यह साबित करना होगा कि वह इस संकट को लेकर कितना गंभीर है।

