Sunday, October 4, 2026
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Matrimonial Home: ईसाई महिलाएं अपने वर्तमान निवास स्थान से दायर कर सकती हैं तलाक की याचिका; वैवाहिक घर के आधार पर अधिकार क्षेत्र को समझें

मामला सारांश (At a Glance)

पहलूविवरण
माननीय पीठन्यायमूर्ति ए. के. जयसंकरण नांबियार एवं न्यायमूर्ति प्रीता ए. के.
अपीलकर्तापिंसी एन. वी. (मानंतवडी, वायनाड)
मूल अदालतफैमिली कोर्ट, कल्पेट्टा (वायनाड)
मुख्य सिद्धांतईसाई महिलाएं घरेलू हिंसा या अलगाव के बाद अपने वर्तमान निवास स्थान की जिला/फैमिली कोर्ट में तलाक याचिका दायर कर सकती हैं।

Matrimonial Home: केरल हाईकोर्ट (Kerala High Court) ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि वैवाहिक घर (Matrimonial Home) छोड़ने वाली ईसाई महिलाएं अब अपने वर्तमान निवास स्थान वाले जिले की अदालत में भी तलाक की याचिका दायर कर सकती हैं। कोर्ट ने माना कि केवल वैवाहिक घर या विवाह स्थल के आधार पर अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) तय करना महिलाओं के साथ भेदभावपूर्ण होगा।

न्यायमूर्ति ए. के. जयसंकरण नांबियार (Justice AK Jayasankaran Nambiar) और न्यायमूर्ति प्रीता ए. के. (Justice Preeta AK) की खंडपीठ ने वायनाड (मानंतवडी) की निवासी पिंसी एन. वी. (Pincy N V) की अपील पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया।

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Matrimonial Home: अदालत का मुख्य निष्कर्ष और टिप्पणी

  • भेदभावपूर्ण प्रावधान को खारिज किया:“वह प्रावधान जो किसी ईसाई महिला को याचिका प्रस्तुत करने की तिथि पर उसके वर्तमान निवास स्थान के अधिकार क्षेत्र वाली जिला अदालत में जाने से रोकता है, वह भेदभावपूर्ण (Discriminatory) होगा और इससे बचा जाना चाहिए।”
  • समानता का अधिकार:
    • हाई कोर्ट ने माना कि यदि किसी प्रताड़ित महिला को केवल उस स्थान पर मुकदमा लड़ने के लिए मजबूर किया जाता है जहां वह अंतिम बार पति के साथ रही थी, तो यह उसे समान व्यवहार और न्याय के अधिकार से वंचित करने जैसा होगा।

Matrimonial Home: मामले की पृष्ठभूमि: फैमिली कोर्ट के फैसले को चुनौती

  1. घरेलू हिंसा और स्थान परिवर्तन: याचिकाकर्ता महिला ने आरोप लगाया कि कासरगोड स्थित अपने ससुराल में घरेलू हिंसा की शिकार होने के बाद उसने अपना वैवाहिक घर छोड़ दिया और अब वह वायनाड में रह रही है।
  2. फैमिली कोर्ट कल्पेट्टा का इनकार: जब महिला ने कल्पेट्टा (वायनाड) की फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दाखिल की, तो कोर्ट ने यह कहते हुए अर्जी खारिज कर दी कि उसके पास अधिकार क्षेत्र नहीं है, क्योंकि दंपति अंतिम बार कासरगोड में एक साथ रहे थे।
  3. हाई कोर्ट में अपील: महिला ने फैमिली कोर्ट के फैसले को केरल हाई कोर्ट में चुनौती दी और तर्क दिया कि अन्य व्यक्तिगत कानूनों की तरह ईसाई महिलाओं को भी अपने वर्तमान निवास स्थान से तलाक की याचिका दायर करने का समान अधिकार मिलना चाहिए।

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