Tuesday, November 3, 2026
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Mental Cruelty: जब तक शिकायत झूठी साबित न हो, पति के खिलाफ पुलिस केस करना क्रूरता नहीं…क्यों पति की तलाक की याचिका हुई खारिज

Mental Cruelty: मद्रास हाई कोर्ट ने वैवाहिक विवादों और तलाक के मुकदमों को लेकर दूरगामी कानूनी सिद्धांत स्पष्ट किया है।

हाई कोर्ट की मदुरै खंडपीठ के जस्टिस पी. वडमलाई ने एक पति द्वारा दायर की गई तलाक की अपील को सिरे से खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि महिलाओं द्वारा अपने अधिकारों की रक्षा के लिए शुरू की गई किसी भी कानूनी या पुलिस कार्यवाही को क्रूरता की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने कहा है कि यदि कोई पत्नी अपने पति या ससुराल वालों के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराती है, तो केवल इस कृत्य को पति के प्रति ‘मानसिक क्रूरता’ (Mental Cruelty) नहीं माना जा सकता, जब तक कि यह साबित न हो जाए कि वह शिकायत पूरी तरह से झूठी और मनगढ़ंत थी।

मामला क्या था? (14 साल से अलगाव, दहेज उत्पीड़न और ‘क्रूरता’ का दावा)

विवाह और अलगाव: इस जोड़े का विवाह 13 फरवरी 2011 को हुआ था और दिसंबर 2011 में उनका एक बेटा हुआ। पति का आरोप था कि उसकी पत्नी का स्वभाव बेहद अड़ियल था, वह झगड़ा करती थी, अपशब्दों का प्रयोग करती थी और खुद को नुकसान पहुंचाने की धमकी देती थी। पति के अनुसार, पत्नी अगस्त 2012 में हैदराबाद स्थित वैवाहिक घर छोड़कर चली गई और तब से (लगभग 14 वर्षों से) दोनों अलग रह रहे हैं।

पति की दलील: पति ने दावा किया कि उसकी पत्नी ने उसके और उसके परिवार के खिलाफ झूठी पुलिस शिकायतें दर्ज कराईं, जिससे उसे गंभीर मानसिक वेदना (Mental Agony) हुई। उसने दलील दी कि यह मानसिक क्रूरता है और इस आधार पर उसे तलाक मिलना चाहिए।

पत्नी का पक्ष: पत्नी ने पति के सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उसने पुलिस में शिकायतें केवल तब दर्ज कराईं जब उसे ससुराल में दहेज उत्पीड़न (Dowry Harassment) और शारीरिक शोषण (Physical Assault) का सामना करना पड़ा। इसके साथ ही, पत्नी ने अदालत के सामने पति के साथ दोबारा रहने (वैवाहिक जीवन को बहाल करने) की इच्छा भी जताई।

हाई कोर्ट का कानूनी विश्लेषण: सबूतों की कमी और ‘सच्ची लड़ाई’

जस्टिस पी. वडमलाई ने निचली अदालतों के फैसलों को बरकरार रखते हुए पति की अपील को खारिज कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदुओं को रेखांकित किया।

स्वतंत्र गवाहों का अभाव: कोर्ट ने नोट किया कि पति ने पत्नी पर क्रूरता और बिना वजह घर छोड़ने (Desertion) के जो आरोप लगाए थे, उन्हें साबित करने के लिए उसने पड़ोसियों या किसी भी स्वतंत्र गवाह (Independent Witness) का बयान अदालत में दर्ज नहीं कराया।

दस्तावेजों की प्रामाणिकता: दूसरी ओर, पत्नी ने अदालत में अपने दावों को पुख्ता करने के लिए मेडिकल रिकॉर्ड, पुलिस शिकायतों की रसीदें, सूचना का अधिकार (RTI) के तहत तंजावुर के समाज कल्याण कार्यालय से प्राप्त जानकारी और पुलिस उपाधीक्षक (DSP) तंजावुर द्वारा की गई कार्यवाही के दस्तावेज पेश किए। पति इन दस्तावेजों को झूठा साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा।

अधिकारों की रक्षा क्रूरता नहीं: हाई कोर्ट ने पूर्व के एक ऐतिहासिक फैसले (12 जुलाई 2023) का हवाला देते हुए साफ कहा, “रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि पति यह साबित नहीं कर पाया है कि पत्नी की शिकायत झूठी थी। अपने कानूनी अधिकारों को बचाने के लिए पत्नी द्वारा शुरू की गई मुकदमेबाजी को पति के प्रति क्रूरता नहीं कहा जा सकता।”

विश्लेषण: जॉयदीप मजूमदार केस और इस मामले में अंतर

सुनवाई के दौरान पति के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के 2021 के एक प्रसिद्ध फैसले जॉयदीप मजूमदार बनाम भारती जायसवाल मजूमदार का हवाला दिया था, जिसमें पत्नी द्वारा की गई शिकायतों को ‘मानसिक क्रूरता’ माना गया था। मद्रास हाई कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए दोनों मामलों के अंतर को स्पष्ट किया।

कानूनी बिंदु / केसजॉयदीप मजूमदार केस (सुप्रीम कोर्ट, 2021)वर्तमान मामला (मदरास हाई कोर्ट, 2026)
शिकायत का माध्यमपत्नी ने पति के करियर और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने के लिए सेना के वरिष्ठ अधिकारियों को मानहानिकारक शिकायतें भेजी थीं।पत्नी ने केवल अपनी सुरक्षा और अधिकारों के लिए पुलिस और समाज कल्याण विभाग में शिकायत दर्ज कराई।
कैरियर पर प्रभावपति की नौकरी और सामाजिक प्रतिष्ठा पर सीधा और विपरीत असर पड़ा था।पति के वरिष्ठ अधिकारियों या करियर को प्रभावित करने वाली कोई शिकायत नहीं की गई।
अदालती निष्कर्षइसे ‘मानसिक क्रूरता’ माना गया और तलाक को मंजूरी दी गई।इसे क्रूरता नहीं माना गया; याचिका खारिज कर दी गई।
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