Monday, October 26, 2026
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Mental Illness & Divorce: खराब स्वास्थ्य किसी की गलती नहीं…पत्नी की बीमारी के आधार पर तलाक से अदालत ने क्यूं किया इनकार, जानिए केस में

केस मैट्रिक्स: Jharkhand High Court Ruling on Mental Illness & Divorce

पहलूविवरण
संबंधित अदालतझारखंड उच्च न्यायालय (Ranchi Bench)
माननीय पीठजस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद एवं जस्टिस संजय प्रसाद
विवाह की तिथि30 जनवरी 2015
पति के वकीलअधिवक्ता अरविंद कुमार चौधरी
पत्नी के वकीलअधिवक्ता शैलेंद्र जीत
मुख्य कानूनी सिद्धांतजीवनसाथी की बीमारी तलाक का वैध आधार नहीं है; स्वयं पत्नी को मायके छोड़कर ‘परित्याग’ का आधार नहीं बनाया जा सकता।

Mental Illness & Divorce: वैवाहिक जीवन, जीवनसाथी के प्रति दायित्वों और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर एक अत्यंत मानवीय टिप्पणी करते हुए झारखंड उच्च न्यायालय ने एक पति की तलाक की याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पत्नी का स्वास्थ्य खराब होना या कोई बीमारी होना तलाक का आधार नहीं बन सकता।

जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसने मानसिक बीमारी (Mental Illness) और परित्याग (Desertion) के आधार पर तलाक मांगने वाले पति की अर्जी खारिज कर दी थी।

मामला क्या था?: दहेज प्रताड़ना और बीमारी का आरोप

  • विवाह और आरोप: दोनों का विवाह 30 जनवरी 2015 को हुआ था। विवाह के कुछ समय बाद पति ने दावा किया कि उसकी पत्नी एक “असाध्य” (Incurable) मानसिक बीमारी से पीड़ित है और पति-पत्नी के रिश्ते को समझने में असमर्थ है। पति ने दावा किया कि उसने बेंगलुरु, रांची, जमशेदपुर और दुर्गापुर में डॉक्टरों को दिखाया, लेकिन बीमारी ठीक नहीं हुई।
  • पत्नी का पक्ष: पत्नी ने फैमिली कोर्ट में कहा कि शादी के तीन महीने बाद ही पति और उसके ससुराल वालों ने अतिरिक्त दहेज की मांग शुरू कर दी थी। दहेज न मिलने पर उसे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया।
  • मायके छोड़ आना: पति 10 जुलाई 2017 को पत्नी को उसके मायके छोड़ आया और कभी वापस लाने की कोशिश नहीं की। पत्नी (अधिवक्ता शैलेंद्र जीत के माध्यम से) ने कोर्ट में बार-बार अपने पति के साथ वापस रहने और रिश्ता सुधारने की इच्छा जताई, लेकिन पति ने साफ मना कर दिया।

झारखंड हाई कोर्ट की मुख्य विधिक व्याख्याएं

“खराब स्वास्थ्य किसी का दोष नहीं”

अदालत ने विवाह की बुनियादी अवधारणा और सुख-दुख के साथ पर झारखंड हाई कोर्ट भावुक व कानूनी टिप्पणी करते हुए कहा, जीवन अच्छे और बुरे दौर से मिलकर बना है, और बुरा दौर अपने साथ गंभीर बीमारियां और अत्यधिक कठिनाइयां ला सकता है। शादी में साझीदारों को इन तूफानों का सामना करना चाहिए और समान भाव से धूप को गले लगाना चाहिए। किसी भी व्यक्ति का स्वास्थ्य खराब हो सकता है; यह उनकी गलती नहीं है, और ज्यादातर समय यह उनके नियंत्रण में नहीं होता।

“पति ने खुद तोड़ा वैवाहिक घर

परित्याग (Desertion) के आरोप पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानूनन कम से कम 2 साल का निरंतर परित्याग होना चाहिए। इस मामले में पत्नी 2.5 साल तक ससुराल में रही और पति ने ही उसे मायके छोड़ा।

  • कोर्ट ने कहा कि पति ने खुद वैवाहिक घर को नष्ट किया और वह अपनी ही गलती (Own Wrong) का फायदा उठाकर तलाक का दावा नहीं कर सकता।
  • पत्नी हर कदम पर साथ रहने को तैयार थी, लेकिन पति ने बिना किसी जायज कारण के खुद को रिश्ते से अलग कर लिया।

सबूतों का अभाव

मानसिक बीमारी के दावे पर हाई कोर्ट ने पाया कि पति (अधिवक्ता अरविंद कुमार चौधरी के माध्यम से प्रस्तुत पक्ष) ने अपनी पत्नी की मानसिक स्थिति साबित करने के लिए न तो कोई ठोस मेडिकल रिपोर्ट जमा की और न ही किसी डॉक्टर या अस्पताल कर्मचारी की गवाही कराई।

हाई कोर्ट का अंतिम आदेश

  1. अपील खारिज: उच्च न्यायालय ने फैमिली कोर्ट के आदेश को पूरी तरह सही ठहराते हुए पति की अपील खारिज कर दी।
  2. तलाक से इनकार: अदालत ने माना कि बिना किसी ठोस सबूत के केवल बीमारी का बहाना बनाकर पत्नी को छोड़ना कानूनन अनुचित है।

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