Saturday, October 31, 2026
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Fictitious Degrees: क्या गैर-मान्यता प्राप्त संस्थान से ली गई डिग्री जमा करना खुद-ब-खुद जालसाजी या धोखाधड़ी माना जाएगा? यहां जवाब पढ़िए

केस मैट्रिक्स: Orissa High Court Ruling on Invalid vs Fictitious Degrees

पहलूविवरण
संबंधित अदालतउड़ीसा उच्च न्यायालय (Orissa High Court)
माननीय पीठजस्टिस दीक्षित कृष्ण श्रीपाद एवं जस्टिस चित्तरंजन डैश (Division Bench)
मुख्य विधिक प्रश्नक्या गैर-मान्यता प्राप्त संस्थान से ली गई डिग्री जमा करना खुद-ब-खुद जालसाजी या धोखाधड़ी माना जाएगा?
कोर्ट का निष्कर्षनहीं। ऐसी डिग्री अमान्य (Invalid) हो सकती है, लेकिन धोखाधड़ी (Fraud) तब तक नहीं जब तक उम्मीदवार की सक्रिय भूमिका न हो।
अंतिम आदेशडिमोशन रद्द; पद बहाली + ₹1,00,000 का हर्जाना।

Fictitious Degrees: उड़ीसा हाईकोर्ट ने सरकारी नौकरियों में कर्मचारियों की शैक्षणिक योग्यताओं और डिमोशन (Demotion) की वैधता पर एक बहुत ही महत्वपूर्ण कानूनी अंतर स्पष्ट किया है।

वरिष्ठ अधिकारी को ‘फर्जी डिग्री’ जमा करने के आरोप में डिमोट करने का मामला

हाईकोर्ट के जस्टिस दीक्षित कृष्ण श्रीपाद (अब सेवानिवृत्त) और जस्टिस चित्तरंजन डैश की खंडपीठ ने फैसला सुनाया है कि किसी अनधिकृत संस्थान (गैजेट में ब्लैकलिस्टेड/अमान्य संस्थान) से प्राप्त डिग्री कानूनी रूप से ‘अमान्य’ (Invalid) तो हो सकती है, लेकिन इसे तब तक ‘फर्जी या धोखाधड़ी’ (Fraud/Fabrication) नहीं माना जा सकता, जब तक कि उस फर्जीवाड़े में उम्मीदवार की खुद की सक्रिय भूमिका साबित न हो। न्यायालय ने राज्य सरकार के उस रवैये को “अविवेकपूर्ण और मनमाना” करार दिया, जिसने एक वरिष्ठ अधिकारी को ‘फर्जी डिग्री’ जमा करने के आरोप में डिमोट करके निचले पद पर भेज दिया था।

मामला क्या था?: 22 साल की सेवा के बाद डिमोशन

नियुक्ति और पदोन्नति: याचिकाकर्ता को वर्ष 1998 में Programmer-cum-Training Officer के पद पर नियुक्त किया गया था। बाद में 2005 में उन्हें System Analyst का प्रभार दिया गया और 2006 में उन्हें इस पद पर अवशोषित (Absorbed) कर लिया गया। बाद में इस पद को Assistant Director के रूप में पुनर्मूल्यांकित किया गया।

2020 का डिमोशन आदेश: 24 दिसंबर 2020 को (लगभग 22 साल बाद) अधिकारियों ने याचिकाकर्ता को यह कहते हुए असिस्टेंट डायरेक्टर के पद से घटाकर फिर से प्रोग्रामर के पद पर डिमोट कर दिया कि उनके पास MCA (मास्टर ऑफ कंप्यूटर एप्लीकेशन) की वैध डिग्री नहीं है और उन्होंने फर्जी प्रमाण पत्र जमा किया है।

याचिका: डिमोशन आदेश के खिलाफ कर्मचारी ने हाई कोर्ट की एकल पीठ में याचिका दायर की और वहां राहत न मिलने पर यह रिट अपील (Writ Appeal) दायर की।

उड़ीसा हाई कोर्ट की मुख्य विधिक व्याख्याएं

‘अमान्य डिग्री’ (Invalid Degree) बनाम ‘फर्जी डिग्री’ (Fictitious/Fraudulent Degree)

अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता ने नव भारत शिक्षा परिषद संस्थान, राउरकेला से MCA की डिग्री ली थी, जिसे UGC और AICTE द्वारा डिग्री देने के लिए अधिकृत नहीं माना गया था। उड़ीसा हाई कोर्ट की मुख्य टिप्पणी, हमें प्रतिवादियों (राज्य सरकार) के इस अविवेकपूर्ण और मनमाने रवैये से दुख होता है कि वे फर्जी प्रमाण पत्र और ऐसे अनधिकृत संस्थान से प्राप्त डिग्री जिसे UGC/AICTE द्वारा मान्यता नहीं दी गई है, के बीच के सूक्ष्म अंतर को नहीं समझ सके। यदि कोई संस्थान बिना अनुमति के कोर्स चलाकर डिग्री बांटता है, तो वह डिग्री अमान्य जरूर है, लेकिन यह तब तक ‘धोखाधड़ी या जालसाजी’ नहीं है जब तक कि उम्मीदवार ने खुद इसमें कोई सक्रिय साजिश न रची हो।

पद पर ‘लियन का अधिकार’ (Right of Lien)

उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के प्रसिद्ध मामले State of U.P v. Sughar Singh (1973) पर भरोसा जताते हुए माना कि याचिकाकर्ता का उस पद पर ‘लियन का अधिकार’ (Lien) बन चुका था। लियन को कर्मचारी और पद के बीच की ‘गर्भनाल’ (Umbilical Cord) माना जाता है, जिसे प्रशासन बिना ठोस कानूनी आधार के मनमाने ढंग से नहीं काट सकता।

नियमों से परे योग्यता थोपना गलत

पीठ ने कहा कि जब 1998 में याचिकाकर्ता की नियुक्ति हुई थी, तब MCA कोई अनिवार्य योग्यता नहीं थी। अधिकारियों द्वारा बाद में मनमाने तरीके से नई योग्यताएं थोपना सेवा कानून (Service Law) के स्थापित सिद्धांतों के खिलाफ है।

डिमोटेड पद पर जॉइन न करने का तर्क

राज्य सरकार ने तर्क दिया कि कर्मचारी ने डिमोशन के बाद निचले पद पर जॉइन नहीं किया, इसलिए वह किसी पिछले लाभ का हकदार नहीं है। हाई कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि जिस कर्मचारी को बिना किसी औचित्य के गलत तरीके से निचले पद पर रिवर्ट (Revert) किया गया हो, उसे उस निचले पद पर ड्यूटी रिपोर्ट न करने के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

हाई कोर्ट का अंतिम निर्णय और मुआवजा

अदालत ने याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाते हुए निम्नलिखित कड़े निर्देश जारी किए।

तत्काल बहाली: याचिकाकर्ता को सभी सेवा और वित्तीय लाभों (Service & Financial Benefits) के साथ असिस्टेंट डायरेक्टर के पद पर तुरंत बहाल किया जाए।

₹1,00,000 का अनुकरणीय हर्जाना: अनुचित व्यवहार और उत्पीड़न के लिए राज्य सरकार को आदेश दिया गया कि वह याचिकाकर्ता को 1 लाख रुपये का जुर्माना/लागत (Exemplary Cost) दे।

गलत अधिकारियों से वसूली की छूट: हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को यह स्वतंत्रता दी कि वह इस जुर्माने की राशि उन दोषी अधिकारियों की जेब/वेतन से वसूल कर सकती है जिनके फैसलों के कारण यह अवैध डिमोशन हुआ था।

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