मामला सारांश (At a Glance)
| विधिक बिंदु | विवरण |
| माननीय अदालत | मद्रास उच्च न्यायालय (First Division Bench) |
| पीठ (Bench) | मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी एवं न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन |
| याचिकाकर्ता | AIADMK व्हिप एग्री एस. एस. कृष्णमूर्ति (वरिष्ठ अधिवक्ता वी. गिरि द्वारा) |
| मुख्य विवाद | 4 AIADMK विधायकों के इस्तीफे बिना जांच (Inquiry) स्वीकार किए जाने और स्पीकर की अदालत में गैर-मजूदगी |
| मुख्य संवैधानिक धारा | भारतीय संविधान का अनुच्छेद 190 (3) (b) |
| अगली सुनवाई | 17 अगस्त 2026 |
Notice To Speaker: ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK) ने चार विधायकों के इस्तीफे स्वीकार किए जाने के विधानसभा अध्यक्ष (Speaker) के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर मद्रास हाईकोर्ट में अपना रुख कड़ा कर लिया है।
मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की प्रथम खंडपीठ के समक्ष AIADMK के व्हिप एग्री एस. एस. कृष्णमूर्ति की ओर से बहस करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता वी. गिरि ने यह कानूनी दलील रखी। पार्टी ने हाईकोर्ट में सवाल उठाया है कि नोटिस जारी होने के बावजूद स्पीकर अदालत के समक्ष उपस्थित क्यों नहीं हुए और न ही अपना पक्ष रखने के लिए खुद का प्रतिनिधित्व दर्ज कराया।
⚖️ मुख्य विधिक और संवैधानिक दलीलें
- अदालत के क्षेत्राधिकार के समक्ष समर्पण अनिवार्य
- वरिष्ठ अधिवक्ता वी. गिरि ने कहा कि नोटिस मिलने के बाद अध्यक्ष (Speaker) को अदालत के क्षेत्राधिकार के अधीन आना होगा। उसके बाद ही वह यह दलील दे सकते हैं कि उन्होंने सचिव को उनकी ओर से जवाब देने के लिए अधिकृत किया है।
- उन्होंने कहा कि विधानसभा सचिव द्वारा हलफनामा दायर कर यह कहना कि वह स्पीकर की ओर से अधिकृत हैं, प्रक्रियागत रूप से अनुचित है।
- राज्यपाल की तरह पूर्ण संवैधानिक छूट (Immunity) प्राप्त नहीं
- AIADMK के वकील ने स्पष्ट किया कि विधानसभा अध्यक्ष को राज्यपाल (Governors) जैसी उच्च संवैधानिक हस्तियों की तरह संवैधानिक प्रतिरक्षा/छूट (Constitutional Immunity) प्राप्त नहीं है, जो उन्हें अदालती नोटिस के बाद पेश होने से रोकती हो।
- अनुच्छेद 190 (3) (b) और जांच की विफलता (Failure to Conduct Inquiry)
- याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि चार विधायकों के इस्तीफे “बिजली की गति” (Lightning Speed) से स्वीकार किए गए।
- संविधान का अनुच्छेद 190 (3) (b) यह अनिवार्य करता है कि इस्तीफे की प्रामाणिकता और स्वैच्छिकता की जांच के लिए स्पीकर को एक बुनियादी ‘जांच’ (Inquiry) आयोजित करनी चाहिए।
- AIADMK ने कहा कि स्पीकर के पास यह जानकारी थी कि संबंधित विधायकों ने पार्टी व्हिप का उल्लंघन किया है और उनके खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही (Disqualification Proceedings) लंबित थी, फिर भी संवैधानिक प्रक्रिया की अनदेखी कर इस्तीफे स्वीकार कर लिए गए।
आगे की कार्यवाही: प्रथम खंडपीठ ने AIADMK की इन दलीलों को दर्ज करने के बाद मामले की अगली सुनवाई 17 अगस्त 2026 के लिए स्थगित कर दी है।
विधायकों के इस्तीफे (Resignation) की स्वीकृति और अनुच्छेद 190(3)(b) से जुड़े विधिक नियम
संविधान के तहत विधानसभा अध्यक्ष (Speaker) का पद अत्यंत गरिमामय और संवैधानिक शक्तियों से लैस होता है। विधायकों के इस्तीफे (Resignation) की स्वीकृति और अनुच्छेद 190(3)(b) से जुड़े विधिक नियम अक्सर दल-बदल और राजनीतिक उथल-पुथल के दौरान चर्चा में आते हैं।
अनुच्छेद 190(3)(b) और इस्तीफे का संवैधानिक नियम
संविधान का अनुच्छेद 190(3)(b) राज्य विधानमंडल के सदस्यों द्वारा पद से इस्तीफा देने की प्रक्रिया तय करता है:
- इस्तीफा सौंपना: कोई भी विधायक विधानसभा अध्यक्ष (Speaker) को संबोधित अपने हस्ताक्षरयुक्त पत्र द्वारा अपनी सीट से त्यागपत्र दे सकता है।
- इस्तीफे की स्वैच्छिक जांच (Voluntary & Genuine Test): 33वें संविधान संशोधन (1974) द्वारा अनुच्छेद 190(3)(b) में एक महत्वपूर्ण शर्त जोड़ी गई। इसके अनुसार, यदि अध्यक्ष को जानकारी या शिकायत मिलती है (या जांच में लगता है) कि इस्तीफा:
- स्वेच्छा से नहीं दिया गया है (Not Voluntary), या
- असली/प्रामाणिक नहीं है (Not Genuine),
विधानसभा अध्यक्ष की मुख्य शक्तियां और अधिकार
| अधिकार / क्षेत्र | संवैधानिक प्रावधान / विवरण |
| इस्तीफे पर अंतिम निर्णय | इस्तीफा स्वीकार करना है या नहीं, इसका अंतिम निर्णय अध्यक्ष का ही होता है। |
| दलबदल विरोधी कानून (10वीं अनुसूची) | 10वीं अनुसूची के तहत विधायकों की अयोग्यता (Disqualification) पर फैसला करने की न्यायाधिकरण (Tribunal) जैसी शक्ति। |
| सदन का संचालन और व्यवस्था | सदन में अनुशासन बनाए रखना, नियम तय करना और मतदान के दौरान टाई होने पर कास्टिंग वोट (Casting Vote) डालना। |
सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत
विधानसभा अध्यक्ष के अधिकारों और इस्तीफे/अयोग्यता के बीच टकराव पर सर्वोच्च न्यायालय ने कई ऐतिहासिक निर्णयों में नियम स्पष्ट किए हैं।
- श्रीमंत बालासाहेब पाटिल बनाम कर्नाटक विधानसभा (2019)
- इस्तीफा बनाम अयोग्यता: सुप्रीम कोर्ट ने माना कि विधायक को इस्तीफा देने का अधिकार है, लेकिन यदि दलबदल के तहत अयोग्यता (10वीं अनुसूची) की कार्यवाही पहले से लंबित है, तो केवल इस्तीफा देकर अयोग्यता से नहीं बचा जा सकता।
- जांच का दायरा सीमित: अध्यक्ष की जांच केवल यह देखने तक सीमित होनी चाहिए कि इस्तीफा स्वैच्छिक और प्रामाणिक है या नहीं। अध्यक्ष को इस्तीफा रोकने या अनुचित देरी करने का अधिकार नहीं है।
- किहोतो होलोहन बनाम ज़चिल्हू (1992)
- 10वीं अनुसूची के तहत निर्णय लेते समय अध्यक्ष एक ‘न्यायाधिकरण’ (Tribunal) की तरह कार्य करते हैं। इसलिए, अध्यक्ष के अंतिम फैसले की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की जा सकती है।
- नेबाम रेबिया बनाम उप-सभापति (2016)
- यदि अध्यक्ष को खुद उनके पद से हटाने का संकल्प (Notice of Removal) सदन में लंबित है, तो वे विधायकों की अयोग्यता याचिका पर निर्णय नहीं ले सकते।

