हाईकोर्ट का मुख्य कानूनी तर्क (Nexus Test)
अदालत ने माना कि पुलिस एक “वर्दीधारी बल” (Uniformed Force) है, जहां अनुशासन बनाए रखना जरूरी है। लेकिन कोर्ट ने दोनों अधिकारियों की भूमिकाओं को अलग-अलग कानूनी तराजू पर मापा:
- सर्कल इंस्पेक्टर को राहत क्यों? इंस्पेक्टर पर केवल जूनियर को डांटने, गाली देने और अनुशासनात्मक कार्रवाई की धमकी देने का आरोप था। कोर्ट ने माना कि यह अनुशासन बनाए रखने और आधिकारिक कर्तव्य (Official Duty) से जुड़ा मामला है। ऐसे मामलों में CrPC/पुलिस अधिनियम के तहत पूर्व मंजूरी (Prior Sanction) अनिवार्य थी, जो नहीं ली गई। इसलिए उसके खिलाफ मामला रद्द कर दिया गया।
- पूर्व SP की याचिका क्यों खारिज हुई? हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जूनियर को कमरे में बंद करना और पेपरवेट फेंककर गंभीर शारीरिक चोट (Physical Assault) पहुंचाना किसी भी तरह से सरकारी या आधिकारिक कर्तव्य का हिस्सा नहीं हो सकता। “शारीरिक हमला करने और गंभीर चोट पहुंचाने का आधिकारिक कर्तव्य से कोई संबंध (Nexus) प्रतीत नहीं होता। इसमें कोई उचित कारण या औचित्य था या नहीं, इसका फैसला ट्रायल कोर्ट में सुनवाई के दौरान होगा।” अदालत ने पूर्व SP को छूट दी कि वे मुकदमे के दौरान ट्रायल कोर्ट के समक्ष अपने बचाव के तर्क रख सकते हैं।
बेंगलुरु: कर्नाटक हाईकोर्ट ने वर्ष 2012 के एक चर्चित मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए एक पूर्व पुलिस अधीक्षक (SP) के खिलाफ दर्ज आपराधिक मुकदमे को रद्द करने से इनकार कर दिया है, जिन पर खेल गतिविधियों में शामिल न होने पर अपने जूनियर पुलिसकर्मी पर पेपरवेट फेंककर गंभीर चोट पहुंचाने का आरोप है।
न्यायमूर्ति रवि वी. होसमनी की एकल पीठ ने 2 सितंबर 2026 के अपने आदेश में पूर्व एसपी की याचिका को खारिज कर दिया, जबकि इसी मामले में सह-आरोपी रहे तत्कालीन सर्कल इंस्पेक्टर के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को अनिवार्य अभियोजन स्वीकृति (Sanction for Prosecution) के अभाव में रद्द (Quash) कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यद्यपि पुलिस बल में अनुशासन बनाए रखने के लिए दी गई चेतावनी या मौखिक डांट सरकारी कर्तव्य का हिस्सा हो सकती है, लेकिन कमरे का दरवाजा बंद करके पेपरवेट फेंकना और शारीरिक हमला करना किसी भी तरह से आधिकारिक कर्तव्य (Official Duty) के दायरे में नहीं आता।
उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां
1. आधिकारिक कर्तव्य से संबंध (Nexus Test) का सिद्धांत लोक सेवकों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति की अनिवार्यता पर विधिक स्थिति स्पष्ट करते हुए अदालत ने कहा: “यह निर्धारित करने के लिए ‘नेक्सस टेस्ट’ लागू किया जाना चाहिए कि कथित कृत्य का आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन से पूर्णतः या युक्तिसंगत रूप से कोई संबंध था या नहीं। शिकायतकर्ता और अभियुक्त दोनों ही पुलिस अधिकारी हैं और एक ‘वर्दीधारी बल’ (Uniformed Force) से संबंधित हैं, जहां 24 घंटे कर्तव्य निर्वहन और अनुशासन बनाए रखना अनिवार्य होता है।”
2. इंस्पेक्टर की डांट बनाम एसपी का शारीरिक हमला (विधिक अंतर) अदालत ने दोनों अधिकारियों के कृत्यों के बीच स्पष्ट अंतर किया:
- सर्कल इंस्पेक्टर की भूमिका: खेल गतिविधियों में अनुपस्थिति पर जूनियर को डांटना, मौखिक चेतावनी देना और विभागीय कार्रवाई की चेतावनी देना अनुशासन बनाए रखने से जुड़ा था। इसे अत्यधिक मामले में “कर्तव्य निर्वहन में उचित सीमा से कुछ अधिक” (Reasonable Excesses) माना जा सकता है। इसलिए बिना वैध अभियोजन स्वीकृति के इंस्पेक्टर पर मुकदमा नहीं चल सकता।
- पूर्व एसपी का शारीरिक हमला: अदालत ने कहा कि जूनियर को अपने कार्यालय में बुलाना, दरवाजा बंद करना और फिर उस पर भारी पेपरवेट फेंकना—जिससे उसकी भौंह कट गई और खून बहने लगा—आधिकारिक कर्तव्य का हिस्सा नहीं माना जा सकता। इसके लिए किसी पूर्व सरकारी मंजूरी की आड़ नहीं ली जा सकती।
मामले की पृष्ठभूमि (2012 का कार्यस्थल हमला विवाद)
- घटना (2 जनवरी 2012): एक कनिष्ठ पुलिस अधिकारी (शिकायतकर्ता) खेल गतिविधियों में शामिल नहीं हुआ था। आरोप है कि उसे एसपी कार्यालय में तलब किया गया, जहां तत्कालीन एसपी ने उसे गालियां दीं और गुस्से में पेपरवेट फेंककर मारा, जिससे उसकी आंख की भौंह पर गंभीर चोट आई।
- एफआईआर और पुलिस की ‘B’ रिपोर्ट: पीड़ित ने 3 जनवरी 2012 को शिकायत दी और सितंबर 2012 में एफआईआर दर्ज हुई। जांच के बाद पुलिस ने मामले में क्लोजर रिपोर्ट यानी ‘B’ Report दाखिल कर दी।
- प्रोटेस्ट पिटीशन और संज्ञान: शिकायतकर्ता ने ‘B’ रिपोर्ट के खिलाफ विरोध याचिका (Protest Petition) दायर की। न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 4 जुलाई 2015 को सामग्री का परीक्षण कर आरोपियों के खिलाफ संज्ञान (Cognizance) लिया और समन जारी किए।
- अधिकारियों की हाईकोर्ट में दलीलें: दोनों अधिकारियों ने सीआरपीसी के तहत समयसीमा बीत जाने (Limitation Bar) और कर्नाटक पुलिस अधिनियम के तहत पूर्व अभियोजन मंजूरी न होने का हवाला देकर केस रद्द करने की मांग की थी।
प्रक्रियात्मक पहलुओं पर अदालत का रुख
- समयसीमा (Limitation) का तर्क खारिज: कोर्ट ने कहा कि घटना के अगले ही दिन (3 जनवरी 2012 को) शिकायत दर्ज करा दी गई थी, इसलिए मामला समयबाधित नहीं है।
- ‘B’ रिपोर्ट पर अलग आदेश की अनुपस्थिति: अदालत ने माना कि यदि मजिस्ट्रेट के आदेश से यह स्पष्ट होता है कि उसने अभियोजन सामग्री और प्रोटेस्ट पिटीशन पर पर्याप्त न्यायिक विवेक (Application of Mind) का इस्तेमाल किया है, तो ‘B’ रिपोर्ट पर अलग से औपचारिक आदेश न होना पूरी कार्यवाही को अमान्य नहीं बनाता।
उच्च न्यायालय का अंतिम आदेश
- सर्कल इंस्पेक्टर की याचिका स्वीकार: सर्कल इंस्पेक्टर के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी गई।
- पूर्व एसपी की याचिका खारिज: पूर्व एसपी के खिलाफ आपराधिक मामला जारी रहेगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि घटना के औचित्य या बचाव से जुड़े अपने सभी तर्क पूर्व एसपी ट्रायल कोर्ट के समक्ष उचित चरण में उठाने के लिए स्वतंत्र रहेंगे।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: आपराधिक कार्यवाही निरस्तीकरण याचिका (Section 482 CrPC)
- याचिकाकर्ताओं की ओर से: अधिवक्ता के.बी.के. स्वामी
- पीठ: न्यायमूर्ति रवि वी. होसमनी (आदेश की तारीख: 2 सितंबर 2026)
Official Duty: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | कर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court) |
| पीठ | न्यायमूर्ति रवि वी. होसमानी |
| घटना का वर्ष | 2 जनवरी 2012 (FIR सितंबर 2012) |
| मुख्य विवाद | खेल गतिविधियों में शामिल न होने पर SP द्वारा जूनियर अधिकारी पर पेपरवेट फेंकना। |
| कोर्ट का आदेश | पूर्व SP: याचिका खारिज (मुकदमे का सामना करना होगा)। पूर्व इंस्पेक्टर: याचिका स्वीकार (आपराधिक मामला रद्द)। |

