Saturday, November 7, 2026
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South Eastern Railway: ट्रेन 317 मिनट देरी से पहुंचने पर यात्री को मिला ₹60,000 का मुआवजा… झारखंड उपभोक्ता आयोग का फैसला जानिए

केस मैट्रिक्स एवं विधिक सारांश (Case Matrix Overview)

विधिक/प्रशासनिक बिंदुविवरण (अगस्त 2026)
फोरम/अदालतजिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, सराइकेला-खरसावां (झारखंड)
प्रतिवादीवरिष्ठ मंडल परिचालन प्रबंधक (दक्षिण पूर्व रेलवे, चक्रधरपुर) एवं जीएम (कोलकाता)
मुआवजा राशि₹50,000 (मानसिक प्रताड़ना हेतु) + ₹10,000 (मुकदमा खर्च) = ₹60,000 (45 दिनों में देय)
मुख्य कानूनी बिंदुबिना ठोस व जायज कारण के ट्रेन अत्यधिक लेट होना ‘सेवा में कमी’ है; यात्री उपभोक्ता आयोग में मुआवजे का हकदार है।

South Eastern Railway: जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, सराइकेला-खरसावां (झारखंड) ने ट्रेन के 5 घंटे (317 मिनट) की देरी से पहुंचने पर दक्षिण पूर्व रेलवे (South Eastern Railway) पर ₹60,000 का जुर्माना और मुआवजा देने का आदेश दिया है।

अध्यक्ष सुनील कुमार सिंह और सदस्यों प्रदीप कुमार मिश्रा एवं संजू शाही की पीठ ने यह महत्वपूर्ण आदेश जारी किया। आयोग ने माना कि बिना किसी उचित कारण के ट्रेन का अत्यधिक लेट होना ‘सेवा में कमी’ (Deficiency in Service) है, जिससे यात्री को शारीरिक और मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ा।

मामला क्या था? (The Background)

  1. देरी से यात्रा और दावा: यात्री ने 13 अक्टूबर 2024 को टाटानगर से संबलपुर की यात्रा के लिए केबीजे इस्पात एक्सप्रेस (KBJ Ispat Express) में टिकट बुक कराया था। ट्रेन का तय समय सुबह 10:18 बजे टाटानगर से छूटकर दोपहर 3:50 बजे संबलपुर पहुंचने का था। लेकिन ट्रेन अपने गंतव्य पर 317 मिनट (5 घंटे से अधिक) की देरी से पहुंची, जिससे यात्री को मानसिक प्रताड़ना और असुविधा हुई। यात्री ने ₹2.5 लाख के मुआवजे की मांग की थी।
  2. रेलवे की दलील: दक्षिण पूर्व रेलवे ने तर्क दिया कि रेलवे संबंधी मामलों की सुनवाई का अधिकार क्षेत्र ‘रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल एक्ट, 1987’ के पास है, इसलिए उपभोक्ता आयोग में यह याचिका विचारणीय नहीं है। इसके अलावा रेलवे ने IRCTC और खड़गपुर डिवीजन को पक्ष न बनाने का हवाला देते हुए सेवा में किसी भी कमी से इनकार किया।

उपभोक्ता आयोग के मुख्य विधिक निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट की नजीर और अधिकार क्षेत्र

रेलवे की आपत्तियों को खारिज करते हुए आयोग ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग (NCDRC) कई मामलों में स्पष्ट कर चुके हैं कि ‘सेवा में कमी’ के लिए जिला उपभोक्ता फोरम के पास सुनवाई का पूरा अधिकार है।

आयोग की टिप्पणी: “सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि यात्रियों का समय कीमती है। यदि रेलवे ट्रेन में देरी के कारणों को साबित करने और उन्हें जायज ठहराने में विफल रहता है, तो वह यात्रियों को मुआवजा देने के लिए उत्तरदायी है।”

देरी का कारण बताने में विफल रहा रेलवे

आयोग ने नोट किया कि रेलवे यह साबित करने के लिए कोई साक्ष्य या दस्तावेज पेश नहीं कर सका कि 5 घंटे से अधिक की देरी ऐसी परिस्थितियों के कारण हुई जो उनके नियंत्रण से बाहर थीं। इसलिए, यात्री को हुई मानसिक प्रताड़ना के लिए मुआवजा देना अनिवार्य है।

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