Friday, October 2, 2026
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POCSO Act: वैवाहिक विवादों में POCSO अधिनियम का दुरुपयोग…सौतेले पिता ने लड़की को गलत राह पर जाने से रोकने के लिए चैट की निगरानी की, पढ़ें

मामला सारांश (At a Glance)

पहलूविवरण
संबंधित अदालतकेरल उच्च न्यायालय (Kerala High Court)
मुख्य कानूनी चिंतावैवाहिक व पारिवारिक विवादों में POCSO Act का दुरुपयोग
निचली अदालत की सजा40 साल का कठोर कारावास (जिसे हाई कोर्ट ने रद्द किया)
मुख्य निष्कर्षअभिभावक द्वारा सुरक्षात्मक निगरानी को यौन उत्पीड़न नहीं माना जा सकता; पारिवारिक कलह में पॉक्सो आरोपों की सख्त न्यायिक जांच आवश्यक है।

POCSO Act: केरल हाईकोर्ट (Kerala High Court) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में चेतावनी दी है कि बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए बनाए गए ‘पॉक्सो कानून’ (POCSO Act) का इस्तेमाल कुछ लोगों द्वारा आपसी रंजिश निकालने, डर पैदा करने और वैवाहिक विवादों में अनुचित लाभ हासिल करने के लिए किया जा रहा है।

अदालत ने कहा कि यौन उत्पीड़न जैसे जघन्य अपराधों से बच्चों की सुरक्षा के लिए यह कड़ा कानून लाया गया था, लेकिन पति-पत्नी के बीच वैवाहिक कलह (Matrimonial Discord) के दौरान इसका झूठा इस्तेमाल सबसे अधिक देखा जा रहा है।

अदालत की मुख्य टिप्पणियां (Key Court Observations)

  • वैवाहिक विवादों में हथियारीकरण:“विशेष रूप से जब पत्नी का अपने पति से विवाद होता है, तो वह न केवल फैमिली कोर्ट या मजिस्ट्रेट कोर्ट में याचिकाएं दाखिल करती है, बल्कि पति को दबाव व डर में रखने और बच्चे की कस्टडी (Custody) देने से बचने के लिए अपने ही बच्चों के खिलाफ पिता या सौतेले पिता द्वारा यौन उत्पीड़न के झूठे आरोप लगाने जैसे मामले सामने आ रहे हैं।”
  • अदालतों के लिए सतर्कता का निर्देश:
    • पीठ ने कहा कि निर्दोष लोगों को पॉक्सो के झूठे मामलों में फंसाने की घटनाएं अब असामान्य नहीं हैं।
    • इसलिए, जब भी अभियुक्त द्वारा झूठे आरोप का मुख्य बचाव (Defense) लिया जाए, तब निचली अदालतों का यह कर्तव्य है कि वे साक्ष्यों की सूक्ष्मता और विवेक (Insight) के साथ जांच करें ताकि किसी बेगुनाह को सजा न हो।

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मामला और बरी होने का आधार (Case Background & Acquittal)

  • निचली अदालत की सजा: विशेष अदालत (Special Court) ने एक सौतेले पिता को अपनी नाबालिग सौतेली बेटी के यौन उत्पीड़न के आरोप में 40 वर्ष के कठोर कारावास और ₹1 लाख के जुर्माने की सजा सुनाई थी।
  • घटनाक्रम और देरी:
    • कथित घटनाएं 2014 से 2018 के बीच की बताई गई थीं, जबकि पीड़िता का बयान 2020 में दर्ज किया गया था।
    • इतनी लंबी देरी का पीड़िता द्वारा कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। कोर्ट ने कहा कि वह स्कूल अधिकारियों या किसी जिम्मेदार व्यक्ति से शिकायत कर सकती थी।
  • निगरानी और नाराजगी (The Real Trigger):
    • अभियुक्त एक कंप्यूटर विशेषज्ञ था। उसने अभिभावक के नाते पीड़िता (जो ईसाई समुदाय से थी) को उसके प्रेमी (जो हिंदू समुदाय से था) के साथ चैट करते देखा।
    • आरोपी ने अपनी तकनीक के ज़रिए पीड़िता के फोन को अपने डिवाइस से लिंक किया और उसके चैट के स्क्रीनशॉट लेकर उसकी मां को भेजे, जिससे वह रिश्ता टूट गया।
    • साक्ष्यों से स्पष्ट हुआ कि पीड़िता के मन में अपना प्रेम संबंध टूटने के कारण सौतेले पिता के प्रति गहरी नाराजगी/असंतोष (Discontent) था।
  • मेडिकल साक्ष्य की व्याख्या:
    • पीड़िता की मेडिकल जांच में शारीरिक संबंध (Intercourse) के संकेत मिले थे। हालांकि, हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि पीड़िता का अपने प्रेमी के साथ संबंध था, इसलिए इन संकेतों को आरोपी के खिलाफ संपुष्टिकारक साक्ष्य (Corroborative Evidence) नहीं माना जा सकता।

अदालत का अंतिम निर्णय

केरल हाई कोर्ट ने पाया कि सौतेले पिता ने केवल एक जिम्मेदार अभिभावक के रूप में लड़की को गलत राह पर जाने से रोकने के लिए उसकी चैट की निगरानी की थी, जिसे रंजिश के तहत यौन उत्पीड़न का रूप दे दिया गया।

अदालत ने विशेष अदालत के 40 साल की सजा के आदेश को रद्द (Quash) करते हुए आरोपी को सभी आरोपों से सम्मानपूर्वक बरी (Acquitted) कर दिया।

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