केस एवं प्रक्रियात्मक सारांश (Case Matrix Overview)
| विधिक/प्रशासनिक बिंदु | विवरण (2026) |
| माननीय पीठ | न्यायमूर्ति चंद्रशेखरन सुधा (दिल्ली उच्च न्यायालय) |
| पक्षकार | आरोपी (अधिवक्ता कन्हैया सिंघल) बनाम राज्य (अतिरिक्त लोक अभियोजक उत्कर्ष) |
| संबंधित कानून | POCSO Act, 2012 (Section 5(l) & 6) एवं Indian Evidence Act, 1872 / Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023 (Section 60) |
| मुख्य कानूनी सिद्धांत | जांच अधिकारी द्वारा डिजिटल मीडिया पर साक्ष्यों को सीधे देखना धारा 60 के तहत ‘प्रत्यक्ष साक्ष्य’ (Direct Evidence) है; FSL रिपोर्ट से पुष्टि होने पर नाबालिग पीड़िता को कोर्ट में अश्लील मीडिया दिखाना आवश्यक नहीं है। |
| अदालत का निर्णय | 12 वर्ष की कारावास की सजा बरकरार; अपील खारिज। |
POCSO Direct Evidence: दिल्ली हाईकोर्ट ने एक 14 वर्षीय नाबालिग लड़की के साथ बार-बार यौन उत्पीड़न करने और उसकी नग्न तस्वीरों से उसे ब्लैकमेल करने के मामले में 60 वर्षीय व्यक्ति की दोषसिद्धि और 12 साल की सश्रम कारावास (12 Years Rigorous Imprisonment) की सजा को बरकरार रखा है।
न्यायमूर्ति चंद्रशेखरन सुधा की पीठ ने आरोपी की उस अपील को खारिज कर दिया जिसमें सजा कम करने की मांग की गई थी। अदालत ने एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत तय करते हुए कहा कि जांच अधिकारी (Investigating Officer – IO) द्वारा जब्त मीडिया डिवाइस पर अश्लील तस्वीरों को सीधे देखना भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 60 (Section 60 of Indian Evidence Act) के तहत ‘प्रत्यक्ष मौखिक साक्ष्य’ (Direct Oral Evidence) माना जाता है। अदालत में सुनवाई के दौरान पीड़ित नाबालिग को वे अश्लील तस्वीरें दिखाने के लिए मजबूर करना न केवल कानूनी रूप से अनावश्यक है, बल्कि नैतिक रूप से भी अनुचित है।
हाई कोर्ट की मुख्य व महत्वपूर्ण टिप्पणियां
- जांच अधिकारी द्वारा मीडिया को देखना प्रत्यक्ष साक्ष्य (Direct Evidence):“आईओ (PW12) द्वारा फोन में देखी गई छवि का यह बयान कि फोटो पीड़िता की ही है, स्वयं अपनी इंद्रियों द्वारा महसूस किए गए तथ्य का प्रत्यक्ष साक्ष्य है और इसलिए साक्ष्य अधिनियम की धारा 60 के तहत स्वीकार्य है… केवल इसलिए कि पीड़िता या उसकी मां को सुनवाई के दौरान तस्वीरें नहीं दिखाई गईं, तस्वीरों या FSL रिपोर्ट के साक्ष्य मूल्य पर कोई असर नहीं पड़ता, विशेषकर तब जब आरोपी का यह मामला कभी था ही नहीं कि तस्वीरें किसी अन्य लड़की की हैं।”
- पीड़िता को दोबारा प्रताड़ित करने की जरूरत नहीं: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब वैज्ञानिक परीक्षण (FSL Report) और जांच अधिकारी के प्रत्यक्ष अवलोकन से पीड़िता की पहचान स्वतंत्र रूप से स्थापित हो चुकी है, तो नाबालिग पीड़िता को अदालत में वे अश्लील तस्वीरें दिखाकर असहज करना पूरी तरह से अनावश्यक है।
- अंतरिम जमानत कूदकर भगोड़ा रहने पर सख्त टिप्पणी: अदालत ने पाया कि आरोपी 2021 में अंतरिम जमानत मिलने के बाद फरार हो गया था और 4 साल तक कानून की पकड़ से दूर रहा। ऐसे गंभीर अपराध और खराब आचरण वाले व्यक्ति के लिए सजा में किसी राहत का कोई आधार नहीं बनता।
मामला क्या था? (Case Background)
- घटनाक्रम और ब्लैकमेलिंग (2015)
- 2015 में 60 वर्षीय अभियुक्त ने अपनी बहु की 14 वर्षीय सहपाठी (पीड़िता) को अपनी सहेली से मिलाने के बहाने त्रिलोकपुरी स्थित घर पर बुलाया। वहां उसने दरवाजा बंद कर नाबालिग का यौन उत्पीड़न किया और मोबाइल में उसकी नग्न तस्वीरें खींच लीं।
- इसके बाद वह तस्वीरों को इंटरनेट पर वायरल करने और पीड़िता के भाई-बहनों को नुकसान पहुंचाने की धमकी देकर उसे लगातार ब्लैकमेल करता रहा।
- अक्टूबर 2015 (भैया दूज) के दिन आरोपी चाकू लेकर पीड़िता के घर में घुसा और परिवार को धमकाया, जिसके बाद पीड़िता ने अपनी मां को पूरी आपबीती सुनाई और मयूर विहार थाने में एफआईआर दर्ज कराई गई।
- निचली अदालत (Special POCSO Court) का फैसला
- मई 2019 में विशेष पोक्सो अदालत ने आरोपी को POCSO एक्ट की धारा 5(l) सहपठित धारा 6 के तहत दोषी ठहराते हुए 12 साल की सश्रम कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई।
- बचाव पक्ष के तर्क
- आरोपी के वकील (अधिवक्ता कन्हैया सिंघल) ने तर्क दिया कि पीड़िता का नगर निगम जन्म प्रमाण पत्र पेश नहीं किया गया और केवल स्कूल रिकॉर्ड पर भरोसा किया गया।
- उन्होंने यह भी तर्क दिया कि सुनवाई के दौरान पीड़ित या उसकी मां को अश्लील फोटो दिखाकर पहचान नहीं कराई गई, जिससे साक्ष्य में कमी रह गई। साथ ही, वृद्धावस्था और बीमारियों का हवाला देकर सजा को 10 साल करने की मांग की।
- हाई कोर्ट की जांच और FSL रिपोर्ट
- हाई कोर्ट ने पाया कि फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) की रिपोर्ट ने स्वतंत्र रूप से पुष्टि की है कि फोन से निकाली गई तस्वीरों में कोई डिजिटल छेड़छाड़ नहीं की गई थी और वे पीड़िता की ही तस्वीरें थीं।
- इसके अलावा, आरोपी को दिसंबर 2025 में गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी होने के बाद दोबारा गिरफ्तार किया गया था।
हाई कोर्ट का अंतिम फैसला
दिल्ली हाई कोर्ट ने माना कि अपराध की गंभीरता, नाबालिग के साथ किए गए उत्पीड़न और आरोपी के 4 साल तक भगोड़ा रहने के रिकॉर्ड को देखते हुए सजा कम करने की कोई असाधारण परिस्थिति नहीं बनती।
अदालत ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई 12 साल की सजा और दोषसिद्धि को पूरी तरह से बरकरार (Upheld) रखा।

