Thursday, September 24, 2026
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Service Dispute: बिना नतीजा देखे ही दुनिया से चले गए…1979 के विवादित इस्तीफे के 47 साल बाद AIIMS के दिवंगत नर्सिंग अर्दली के कानूनी वारिसों को राहत

केस एवं प्रक्रियात्मक सारांश (Case Matrix Overview)

विधिक/प्रशासनिक बिंदुविवरण (2026)
माननीय पीठन्यायमूर्ति शैल जैन (दिल्ली उच्च न्यायालय)
पक्षकारएम्स (अधिवक्ता वी. एस. आर. कृष्णा) बनाम मोहम्मद रफीक के कानूनी वारिस (अधिवक्ता एल. गंगमेई)
संबंधित कानूनIndustrial Disputes Act, 1947 एवं CCS (CCA) Rules
मुख्य विधिक सिद्धांतजबरन/दबाव में लिया गया ‘इस्तीफा’ स्वैच्छिक त्यागपत्र नहीं माना जा सकता; यदि कर्मचारी तुरंत काम पर लौटने का अभ्यावेदन देता है तो यह उसकी नौकरी जारी रखने की मंशा को दर्शाता है।
अदालत का निर्णयएम्स की याचिका खारिज; LRs की याचिका आंशिक रूप से स्वीकार—बैक वेज 40% से बढ़ाकर 50% किया गया और 12 हफ्तों में एरियर भुगतान का आदेश।

Service Dispute: दिल्ली हाईकोर्ट ने 1979 में शुरू हुए एक 47 साल पुराने सेवा विवाद (Service Dispute) में एम्स (AIIMS – ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज) में कार्यरत एक दिवंगत कर्मचारी के कानूनी वारिसों (Legal Representatives/LRs) के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।

मामले की सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति शैल जैन की एकल पीठ ने दुख व्यक्त करते हुए कहा कि 1981 से कानूनी लड़ाई लड़ रहे कर्मचारी मोहम्मद रफीक (Mohd. Rafiq) की 2013 में रिट याचिकाओं के लंबित रहने के दौरान ही मृत्यु हो गई थी और वह अपने हक में आए इस फैसले के नतीजों को देखे बिना ही दुनिया से चले गए। अदालत ने माना कि कर्मचारी से लिया गया ‘इस्तीफा’ स्वैच्छिक नहीं था और उनके बैक वेज (Back Wages) को 40% से बढ़ाकर 50% कर दिया है।

हाई कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां

  • इस्तीफा देने की मंशा का परीक्षण:“इस्तीफे के लिए रोजगार संबंध को समाप्त करने की एक सचेत और स्पष्ट मंशा (Conscious and Unequivocal Intention) का होना आवश्यक है। मानव व्यवहार अक्सर मंशा का सबसे अच्छा प्रमाण होता है। सामान्यतः, जो कर्मचारी अपनी मर्जी से नौकरी छोड़ता है, वह कुछ ही दिनों के भीतर बार-बार नियोक्ता से काम पर लौटने की गुहार नहीं लगाएगा।”
  • त्वरित अभ्यावेदन (Representations) बने सबूत: अदालत ने माना कि 15 अक्टूबर 1979 को कथित इस्तीफे के तुरंत बाद कर्मचारी द्वारा 20 अक्टूबर 1979 को ड्यूटी पर लौटने के लिए दी गई अर्जी इस बात का प्रासंगिक सबूत है कि उनका इरादा कभी भी स्वेच्छा से नौकरी छोड़ने का नहीं था।

मामला क्या था? (Case Background)

  1. नियुक्ति और 1979 का विवाद
    • मोहम्मद रफीक को 1964 में एम्स में ‘नर्सिंग अर्दली’ (Nursing Orderly) के रूप में नियुक्त किया गया था।
    • 1979 में पत्नी की बीमारी के कारण अनुपस्थित रहने के बाद, जब वे 15 अक्टूबर 1979 को काम पर लौटे, तो उनसे एक दस्तावेज पर हस्ताक्षर कराए गए। एम्स ने इसे औपचारिक ‘इस्तीफा’ (Resignation) माना, जबकि रफीक का कहना था कि उन्होंने काम पर फिर से शामिल होने की प्रक्रिया समझकर उस पर हस्ताक्षर किए थे।
  2. औद्योगिक विवाद और श्रम न्यायालय (Labour Court) का फैसला
    • रफीक द्वारा बार-बार ड्यूटी पर लेने की अर्जियों को नजरअंदाज किए जाने पर मामला औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (Industrial Disputes Act, 1947) के तहत लेबर कोर्ट पहुंचा।
    • दिसंबर 1998 में लेबर कोर्ट ने माना कि यह इस्तीफा स्वैच्छिक नहीं था और स्वीकृति से पहले ही इसे प्रभावी रूप से वापस ले लिया गया था। लेबर कोर्ट ने सेवा निरंतरता और 40% बैक वेज के साथ बहाली का आदेश दिया।
  3. हाई कोर्ट में 28 साल तक लंबित याचिका
    • एम्स ने लेबर कोर्ट के फैसले को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी, वहीं रफीक के वारिसों ने (रफीक की 2013 में मृत्यु के बाद) 40% के बजाय 100% बैक वेज की मांग की।

⚖️ हाई कोर्ट का अंतिम आदेश और राहत

हाई कोर्ट ने एम्स के इन तर्कों को खारिज कर दिया कि CCS (CCA) नियमों के लागू होने से औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत सुनवाई बाधित होती है। कोर्ट ने निम्नलिखित फैसला सुनाया।

  1. अवैध सेवा समाप्ति की पुष्टि: कोर्ट ने माना कि एम्स द्वारा कर्मचारी को नौकरी से हटाना पूरी तरह से गैर-कानूनी था।
  2. बैक वेज में वृद्धि (Enhancement of Back Wages):
    • अदालत ने पाया कि 40% बैक वेज का लेबर कोर्ट का गणित स्पष्ट नहीं था, लेकिन कर्मचारी की अनाधिकृत अनुपस्थिति को देखते हुए 100% बैक वेज देना भी उचित नहीं था।
    • इसलिए, हाई कोर्ट ने अवैध समाप्ति की तिथि से कर्मचारी की सेवानिवृत्ति (Superannuation – अगस्त 1996) तक के बैक वेज को 40% से बढ़ाकर 50% कर दिया।
  3. 12 सप्ताह की समय सीमा: एम्स को निर्देश दिया गया है कि वह 12 सप्ताह के भीतर दिवंगत कर्मचारी के कानूनी वारिसों को सभी परिणामी मौद्रिक लाभ और सेवानिवृत्ति लाभ (Retiral Benefits) की गणना कर जारी करे। तय सीमा में भुगतान न करने पर 6% वार्षिक साधारण ब्याज देय होगा।

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