केस मैट्रिक्स: Supreme Court on Police Excesses & Right to Protest
| पहलू | विवरण |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| माननीय पीठ | CJI सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची एवं जस्टिस वी. मोहना |
| केस का नाम | शैलेंद्र मणि त्रिपाठी बनाम भारत संघ व अन्य (Shailendra Mani Tripathi v. UOI) |
| मुख्य मुद्दा | शांतिपूर्ण प्रदर्शनों की सुरक्षा और देश भर में पुलिस बल प्रयोग पर राष्ट्रीय गाइडलाइंस की मांग |
| अदालत का रुख | शांतिपूर्ण विरोध संवैधानिक अधिकार है; केवल आंदोलन के नाम पर लाठीचार्ज/बर्बरता अनुचित है। |
| वर्तमान स्थिति | मामले पर विस्तृत सुनवाई जारी। |
Police Excesses & Right to Protest: देश भर में छात्रों और प्रदर्शनकारियों पर पुलिस द्वारा बल प्रयोग और लाठीचार्ज के बढ़ते मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है।
यह टिप्पणी मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने देशव्यापी शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के लिए दिशानिर्देश बनाए जाने की मांग करने वाली जनहित याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की। अदालत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि कानून के तहत शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने का अधिकार पूरी तरह से गारंटीकृत (मौलिक अधिकार) है, और केवल विरोध या आंदोलन होने के आधार पर पुलिस की बर्बरता या अत्यधिक बल प्रयोग को सही नहीं ठहराया जा सकता।
मामला क्या था?: पेपर लीक विवाद, जंतर-मंतर और बिहार में पुलिस कार्रवाई
- पृष्ठभूमि: हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर और बिहार के सिवान में प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक मामले को लेकर छात्रों द्वारा बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किए गए थे।
- जंतर-मंतर की घटनाएं: ऑनलाइन समूह कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के समर्थन के साथ विरोध तेज हो गया था। 20 जुलाई को ‘संसद चलो’ मार्च के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें हुईं, जिनमें आंसू गैस, लाठीचार्ज और पुलिस बल प्रयोग के गंभीर आरोप लगे।
- केंद्रीय शिक्षा मंत्री का इस्तीफा: चौतरफा दबाव के बाद 25 जुलाई को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया, जिसके बाद जंतर-मंतर पर प्रदर्शन समाप्त हुआ।
अदालत में दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता फौजिया शकील ने अदालत को बताया कि बिहार बंद के दौरान सिवान में सुरक्षा बलों द्वारा प्रदर्शनकारियों पर कथित तौर पर AK-47 जैसी स्वचालित राइफल तक का प्रदर्शन/प्रयोग किया गया।
वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने कहा कि देश भर के छात्रों पर पुलिसिया कार्रवाई हो रही है, इसलिए पूरे भारत के लिए एक समान दिशानिर्देश (Pan-India Protocol) की आवश्यकता है।
पुलिस पक्ष का बचाव करते हुए एक अन्य वकील ने तर्क दिया कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान कई पुलिस अधिकारी भी घायल हुए हैं और उन पर भी हमले हुए हैं।
सर्वोच्च न्यायालय की मुख्य विधिक टिप्पणी
शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार मौलिक है
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने विरोध प्रदर्शनों और पुलिस की कार्रवाई पर बेहद संतुलित लेकिन सख्त टिप्पणी की। CJI सूर्यकांत की मुख्य टिप्पणी: “शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार पूरी तरह से गारंटीकृत है। इसे छीना नहीं जा सकता। केवल इसलिए कि कहीं आंदोलन या प्रदर्शन हो रहा है, पुलिस के अत्यधिक बल प्रयोग (Police Excesses) को जायज नहीं ठहराया जा सकता। सिर्फ विरोध प्रदर्शन होने का मतलब यह नहीं है कि वहां लाठीचार्ज किया ही जाए।”
आत्म-अनुशासन और राष्ट्रव्यापी प्रोटोकॉल की जरूरत
CJI सूर्यकांत ने आगे कहा कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए स्व-विकसित अनुशासन (Self-Evolved Discipline) बहुत जरूरी है। “यह केवल दिल्ली का सवाल नहीं है। एक uniform protocol (समान नियमावली) की जरूरत है। प्रदर्शन के लिए उचित जगह होनी चाहिए और कोई अकारण प्रतिबंध नहीं होना चाहिए। अगर कोई असामाजिक तत्व इसमें शामिल होते हैं, तो उनसे अलग से निपटा जा सकता है।”
हर व्यक्ति की जान की कीमत समान
जब पुलिस अधिकारियों के घायल होने का मुद्दा उठाया गया, तो जस्टिस जोयमाल्या बागची ने कहा: हर व्यक्ति का जीवन महत्वपूर्ण है, चाहे वह प्रदर्शनकारी नागरिक हो या ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी।
सुप्रीम कोर्ट का अगला कदम
- सॉलिसिटर जनरल का आश्वासन: केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को आश्वस्त किया कि सरकार इस मुद्दे पर निष्पक्षता से अदालत की सहायता करेगी।
- अगली सुनवाई: पीठ ने इस विषय से जुड़ी सभी याचिकाओं को अगले दिन मंगलवार, 28 जुलाई को विस्तृत सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है।

