Re-Appointment: बिहार सरकार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की दोबारा नियुक्ति (Reappointment) को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।
जनहित याचिका दायर पर दोबारा मंत्री बनने पर सवाल उठाया गया
सामाजिक कार्यकर्ता राकेश कुमार सिंह द्वारा अधिवक्ता सान्या कौशल और सुदीप चंद्रा के माध्यम से दायर इस जनहित याचिका (PIL) में दीपक प्रकाश से पूछा गया है कि वे किस संवैधानिक आधार पर मंत्री पद पर बने हुए हैं। याचिका में आरोप लगाया गया है कि बिना चुनाव जीते उन्हें दोबारा मंत्री बनाना संविधान के अनुच्छेद 164(4) (Article 164(4)) का स्पष्ट उल्लंघन है। बिहार में जून 2026 में ही विधान परिषद (MLC) की खाली सीटों पर द्विवार्षिक चुनाव होने जा रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि क्या दीपक प्रकाश को इन सीटों के जरिए सदन में भेजा जाएगा या सुप्रीम कोर्ट की इस याचिका के बाद उनके मंत्री पद पर तलवार लटक जाएगी। अदालत इस पर क्या रुख अपनाती है, इस पर पूरे देश की नजरें टिकी हैं।
दीपक प्रकाश के मामले की वर्तमान स्थिति
| विवरण | महत्वपूर्ण तथ्य |
| नाम और पद | दीपक प्रकाश (कौशवाहा), पंचायती राज मंत्री, बिहार सरकार |
| राजनीतिक दल | राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) |
| पहला शपथ ग्रहण | 20 नवंबर 2025 (नीतीश कुमार सरकार) |
| दूसरा शपथ ग्रहण | 07 मई 2026 (सम्राट चौधरी सरकार) |
| 6 महीने की सीमा | 20 मई 2026 को समाप्त (याचिका के अनुसार) |
| मांगी गई राहत | कोर्ट से ‘रिट ऑफ को-वारंटो’ (Writ of Quo Warranto) जारी करने और नियुक्ति अवैध घोषित करने की मांग। |
यह है पूरा कानूनी विवाद (The Constitutional Conflict)
संविधान का अनुच्छेद 164(4) कार्यपालिका को यह असाधारण शक्ति देता है कि किसी भी ऐसे व्यक्ति को मंत्री नियुक्त किया जा सकता है जो राज्य विधानसभा (Vidhan Sabha) या विधान परिषद (Vidhan Parishad) का सदस्य नहीं है। लेकिन इस पर एक सख्त समय सीमा लागू होती है।
अनुच्छेद 164(4): एक मंत्री जो लगातार छह महीने की अवधि तक राज्य के विधानमंडल का सदस्य नहीं रहता है, वह उस अवधि की समाप्ति पर मंत्री नहीं रहेगा। दीपक प्रकाश (जो राष्ट्रीय लोक मोर्चा के नेता और उपेंद्र कुशवाहा के बेटे हैं) के मामले में समयरेखा कुछ इस प्रकार रही है।
20 नवंबर 2025: उन्हें तत्कालीन नीतीश कुमार सरकार में पहली बार पंचायती राज मंत्री के रूप में शपथ दिलाई गई, जबकि वे किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे। इस तारीख से उनका 6 महीने का संवैधानिक समय (Constitutional Clock) शुरू हुआ, जो 19 मई 2026 को समाप्त होना था।
अप्रैल 2026 (तख्तापलट/इस्तीफा): नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद पूरी मंत्रिपरिषद भंग हो गई। 15 अप्रैल 2026 को सम्राट चौधरी ने नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। इस बीच 22 दिनों तक दीपक प्रकाश किसी पद पर नहीं थे।
7 मई 2026: नवनिर्मित सम्राट चौधरी कैबिनेट के विस्तार में दीपक प्रकाश को दोबारा पंचायती राज मंत्री नियुक्त कर दिया गया, जबकि उन्होंने अब तक कोई चुनाव नहीं जीता था।
याचिकाकर्ता के मुख्य तर्क: ‘कलरएबल एक्सरसाइज ऑफ पावर’
याचिका में इस बात पर जोर दिया गया है कि सरकार एक ही व्यक्ति को बिना चुनाव लड़ाए, बीच में छोटा सा अंतराल (Interregnum) देकर बार-बार मंत्री नियुक्त नहीं कर सकती।
संवैधानिक घड़ी को रीसेट नहीं किया जा सकता: याचिकाकर्ता का तर्क है कि सरकार बदलने या मुख्यमंत्री बदलने से 6 महीने की वह अवधि ‘शून्य’ या रीसेट नहीं हो जाती, जो 20 नवंबर 2025 से शुरू हुई थी। वह अवधि 20 मई 2026 को खत्म हो चुकी है।
संसदीय लोकतंत्र को धोखा: इस तरह टुकड़ों में मंत्री पद बांटना संविधान की मूल भावना और लोकतांत्रिक जवाबदेही के साथ खिलवाड़ है। यह सीधे तौर पर कलरएबल एक्सरसाइज ऑफ पावर (Colourable Exercise of Power) है—यानी जो काम आप सीधे तौर पर (बिना चुनाव जीते ६ महीने से अधिक मंत्री रहना) नहीं कर सकते, उसे घुमा-फिराकर करने की कोशिश की जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: ‘एस. आर. चौधरी बनाम पंजाब राज्य (2001)’
सुपूरीम कोर्ट में दायर इस याचिका का सबसे मजबूत आधार शीर्ष अदालत का ही २४ साल पुराना एक ऐतिहासिक फैसला है।
वर्ष 2001 में एस. आर. चौधरी बनाम पंजाब राज्य (S.R. Chaudhari v. State of Punjab) मामले में सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने ठीक इसी तरह के एक विवाद पर कड़ा रुख अपनाया था। तब कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा था, “अनुच्छेद 164(4) के तहत दी गई 6 महीने की छूट एक गैर-नवीकरणीय (Non-renewable) और सीमित रियायत है। कोई भी गैर-विधायक व्यक्ति बिना चुनाव जीते एक ही विधानसभा के कार्यकाल के दौरान इस्तीफा देकर या दोबारा कैबिनेट गठन का फायदा उठाकर दोबारा मंत्री नहीं बन सकता। ऐसा करना जनता के जनादेश और लोकतांत्रिक प्रणाली का अपमान होगा।”

