Rishu Shree: देश में आपराधिक मामलों की जांच के दौरान होने वाले मीडिया ट्रायल’ (Media Trial) और सोशल मीडिया पर चलने वाले समानांतर मुकदमों को लेकर पटना हाईकोर्ट से एक बेहद महत्वपूर्ण विधिक आदेश आया है।
कथित टेंडर घोटाले का आरोपी Rishu Shree ने दायर की थी याचिका
हाईकोर्ट के जस्टिस अंसुल की एकल पीठ ने ऋशु श्री द्वारा विशेष सतर्कता इकाई (SVU) केस संख्या 05/2025 से उत्पन्न आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए यह अंतरिम विधिक संरक्षण प्रदान किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि मीडिया को मामले से जुड़े तथ्यात्मक घटनाक्रम (Factual Developments) रिपोर्ट करने की पूरी आजादी है, लेकिन ट्रायल से पहले किसी आरोपी पर आपराधिक दायित्व मढ़ना उसके निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार (Right to a Fair Trial) का हनन है। अदालत ने प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक, डिजिटल और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को सख्त निर्देश दिया है कि वे बिहार के कथित टेंडर घोटाले (Tender Scam) के आरोपी ठेकेदार ऋशु श्री को मुकदमा (Trial) शुरू होने से पहले दोषी के रूप में पेश न करें।
मामला क्या था? टेंडर घोटाला और Rishu Shree की गिरफ्तारी के बाद मीडिया कवरेज
विलंबित छापेमारी और गिरफ्तारी: यह कानूनी विवाद विशेष सतर्कता इकाई (SVU) द्वारा दर्ज एक भ्रष्टाचार के मामले से जुड़ा है। याचिकाकर्ता के अनुसार, प्राथमिकी (FIR) साल 2025 में ही दर्ज की गई थी, लेकिन उसके आवास पर छापेमारी 27 मई 2026 को की गई, जिसके बाद उसे गिरफ्तार किया गया।
एकतरफा नैरेटिव का आरोप: याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता नंदिता राव ने दलील दी कि तलाशी के दौरान कोई आपत्तिजनक सामग्री बरामद नहीं होने के बावजूद टीवी चैनलों, समाचार पत्रों, ऑनलाइन पोर्टल्स और सोशल मीडिया पर एकतरफा नैरेटिव चलाया गया। प्राइम-टाइम डिबेट्स आयोजित की गईं, जहां याचिकाकर्ता का पक्ष सुने बिना उसे बदनाम और विलीनीकृत (Vilified) किया गया।
सुप्रीम कोर्ट की मिसाल: याचिकाकर्ता ने महाराष्ट्र राज्य बनाम राजेंद्र जवानमल गांधी मामले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि प्रेस या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा चलाया जाने वाला ट्रायल ‘कानून के शासन’ (Rule of Law) के बिल्कुल विपरीत है।
हाई कोर्ट का विधिक रुख: यह विचाराधीन मामले को पहले से तय करना है
जस्टिस अंसुल ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद ‘मीडिया ट्रायल’ के वर्तमान स्वरूप, विशेषकर सोशल मीडिया की भूमिका पर गंभीर चिंता व्यक्त की।
सोशल मीडिया पर ‘दोषी’ घोषित करने की बाढ़
अदालत ने नोट किया कि यह समस्या अब केवल पारंपरिक मीडिया तक सीमित नहीं है। यह देखा जा सकता है कि ये खबरें न केवल मुख्यधारा के प्रेस या टेलीविजन चैनलों में हैं, बल्कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म भी ट्रायल शुरू हुए बिना ही याचिकाकर्ता को दोषी व्यक्ति घोषित करने वाली खबरों से पटे पड़े हैं।
आरोप की गंभीरता से मौलिक अधिकार खत्म नहीं होते
अदालत ने एक महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत को रेखांकित करते हुए कहा कि भले ही किसी व्यक्ति पर गंभीर अपराध का आरोप हो, लेकिन केवल आरोपों की गंभीरता के आधार पर उसे संवैधानिक विधिक संरक्षणों से वंचित नहीं किया जा सकता।
प्रेस की स्वतंत्रता असीमित नहीं है
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति और प्रेस की स्वतंत्रता ‘उचित प्रतिबंधों’ (Reasonable Restrictions) के अधीन है। किसी व्यक्ति को अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने से पहले ही अपराधी के रूप में चित्रित करना मानहानि (Defamation), अनैतिक और अश्लील कृत्य की श्रेणी में आ सकता है, क्योंकि यह एक विचाराधीन (Subjudice) मामले में पहले से ही अपना फैसला सुना देने (Pre-judging) जैसा है।
Rishu Shree को लेकर मीडिया के लिए कड़े विधिक दिशा-निर्देश
अदालत ने स्पष्ट किया कि वह पूरी तरह से मीडिया गैग (Media Gag – समाचारों पर पूर्ण प्रतिबंध) लगाने के पक्ष में नहीं है, लेकिन गैर-जिम्मेदाराना रिपोर्टिंग को नियंत्रित करना अनिवार्य है। इसके तहत कोर्ट ने निम्नलिखित कड़े निर्देश जारी किए।
प्रतिबंधित शब्द: मीडिया आउटलेट्स ऋशु श्री के लिए “मास्टरमाइंड” (Mastermind), “घोटालेबाज” (Scamster), “किंगपिन” (Kingpin) या ऐसे ही किसी अन्य शब्द का प्रयोग नहीं करेंगे जो विधिक रूप से उसका आपराधिक दायित्व तय करते हों।
स्वीकारोक्ति बयानों पर रोक: कथित बयानों, इकबालिया बयानों (Confessions) या अप्रमाणित दस्तावेजों के आधार पर कोई ‘मीडिया ट्रायल’ नहीं चलाया जाएगा, क्योंकि इनकी विधिक साक्ष्यात्मक प्रामाणिकता (Evidentiary Value) अभी अदालत द्वारा तय की जानी बाकी है।
सभी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर लागू: यह आदेश केवल टीवी और अखबारों पर नहीं, बल्कि ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल्स, वीडियो स्ट्रीमिंग सेवाओं (YouTube आदि), पॉडकास्ट, सोशल मीडिया अकाउंट्स और चैनलों पर भी समान रूप से लागू होगा।
हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणियां: अभिव्यक्ति की आजादी असीमित नहीं
जस्टिस अंशुल ने कोर्ट के सामने पेश की गईं मीडिया रिपोर्ट्स का संज्ञान लेते हुए प्रेस की स्वतंत्रता और आरोपी के अधिकारों के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया:
- छवि बिगाड़ना मानहानि के दायरे में: कोर्ट ने कहा, “किसी ऐसे व्यक्ति की छवि को धूमिल करना जिसे अभी तक अदालत द्वारा दोषी नहीं ठहराया गया है, मानहानि (Defamation), अनैतिक कृत्य या अभद्र कृत्य के दायरे में आ सकता है। जब मामला विचाराधीन (Sub-judice) हो, तो यह मुद्दे को पहले से तय करने जैसा है।”
- संविधान का दायरा: कोर्ट ने याद दिलाया कि अनुच्छेद 19(1)(A) के तहत प्रेस की स्वतंत्रता गारंटीकृत है, लेकिन यह अनुच्छेद 19(2) के तहत राज्य की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता, नैतिकता और मानहानि जैसे उचित प्रतिबंधों (Reasonable Restrictions) के अधीन है।
- आरोप गंभीर होने पर भी अधिकार सुरक्षित: बेंच ने स्पष्ट किया कि भले ही किसी व्यक्ति पर कितना भी गंभीर आरोप क्यों न लगा हो, आरोपों की गंभीरता के कारण उसका ‘फेयर ट्रायल’ पाने का संवैधानिक अधिकार खत्म नहीं हो जाता।
मीडिया के लिए ‘क्या करें और क्या न करें’ (Dos & Don’ts)
पटना हाई कोर्ट ने मीडिया ट्रायल को रोकने के लिए स्पष्ट विधिक दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
- क्या न करें (Don’ts):
- किसी भी आरोपी के लिए “मास्टरमाइंड”, “किंगपिन”, “घोटालेबाज” (Scamster) या आपराधिक जिम्मेदारी तय करने वाले समकक्ष शब्दों का प्रयोग न करें।
- जांच के दौरान कथित बयानों, अपुष्ट दस्तावेजों या जांच सामग्री के आधार पर ऐसी समानांतर बहसें न चलाएं जो यह निष्कर्ष निकालती हों कि आरोपी ही अपराधी है।
- ऐसी कोई भी सामग्री प्रसारित न करें जो किसी व्यक्ति के कानूनी रूप से दोषी साबित होने से पहले ही उसकी आपराधिक संलिप्तता को अंतिम सत्य मानती हो।
- क्या करें (Dos):
- जांच की तथ्यात्मक प्रगति, कानूनी गिरफ्तारियों और अदालती कार्यवाही (Court Proceedings) की निष्पक्ष, सटीक और तटस्थ रिपोर्टिंग पूरी तरह जारी रखी जा सकती है।
- कानूनी शब्दावली जैसे “कथित” (Alleged) शब्द का अनिवार्य और सही उपयोग करें (यह केवल व्याकरण का हिस्सा नहीं, विधिक आवश्यकता है)।
- यह आदेश ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल्स, पॉडकास्ट, वीडियो-स्ट्रीमिंग सेवाओं (जैसे YouTube) और फेसबुक-एक्स (X) जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी समान रूप से लागू होगा।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों की नजीर
अपने फैसले को मजबूती देने के लिए पटना हाई कोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के कई पुराने और ऐतिहासिक फैसलों का हवाला दिया:
- महाराष्ट्र राज्य बनाम राजेंद्र जवानमल गांधी (1997): सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि “प्रेस द्वारा ट्रायल” कानून के शासन (Rule of Law) के बिल्कुल विपरीत है।
- एम.पी. लोहिया बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (2005): मीडिया को उन मामलों में एकतरफा और पूर्वाग्रह से ग्रसित खबरें दिखाने के प्रति आगाह किया गया था जो अदालत में लंबित हैं।
- सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉरपोरेशन लिमिटेड बनाम सेबी (2012): कोर्ट को न्याय प्रशासन की रक्षा के लिए असाधारण परिस्थितियों में प्रकाशन पर कड़े प्रतिबंध लगाने का अधिकार दिया गया था।
Rishu Shree: केस मैट्रिक्स और विधिक सारांश (Case Matrix Overview)
| विधिक श्रेणियां / बिंदु | पटना उच्च न्यायालय का विधिक निर्देश (जून 2026) |
| संबंधित अदालत | पटना उच्च न्यायालय (Patna High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस अंसुल (एकल पीठ) |
| याचिकाकर्ता | ऋशु श्री (बिहार के संवेदक/ठेकेदार) |
| प्रतिवादी/जांच एजेंसी | विशेष सतर्कता इकाई (Special Vigilance Unit – SVU), बिहार |
| मुख्य कानूनी प्रश्न | क्या अदालत में ट्रायल शुरू होने से पहले मीडिया किसी आरोपी को ‘दोषी’ या ‘मास्टरमाइंड’ के रूप में पेश कर सकता है? |
| अदालत का विधिक स्टैंड | नहीं। तथ्यों की निष्पक्ष रिपोर्टिंग की जा सकती है, लेकिन ट्रायल से पहले मीडिया द्वारा दोषारोपण करना ‘निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार’ और ‘कानून के शासन’ का उल्लंघन है। |
| अगली विधिक सुनवाई | 10 जुलाई 2026 |
यहां जानिए ठेकेदार रिशु रंजन सिन्हा उर्फ ‘रिशु श्री’ से जुड़ा टेंडर घोटाले का मामला
बिहार के चर्चित और हाई-प्रोफाइल टेंडर घोटाले (Bihar Tender Scam) के मुख्य आरोपी व ठेकेदार रिशु रंजन सिन्हा उर्फ ‘रिशु श्री’ पर जांच एजेंसियों और सरकार का शिकंजा लगातार कसता जा रहा है। मई-जून 2026 में इस पूरे मामले में बड़ी गिरफ्तारियां, चार्जशीट और प्रशासनिक कार्रवाई देखने को मिली है।
रिशु श्री की गिरफ्तारी और बरामदगी
विशेष निगरानी इकाई (SVU) और प्रवर्तन निदेशालय (ED) की लंबी जांच के बाद, 27 मई 2026 की रात रिशु श्री के पटना (मीठापुर) स्थित ठिकानों पर करीब 11 घंटे तक छापेमारी चली। इसके अगले दिन यानी 28 मई 2026 को रिशु श्री को गिरफ्तार कर 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में बेउर जेल भेज दिया गया।
बरामद संपत्ति: जांच एजेंसियों की छापेमारी में रिशु श्री के ठिकानों से अकूत संपत्ति का खुलासा हुआ है। इसमें लगभग ₹53.5 लाख नकद और ₹2.13 करोड़ से अधिक के सोने-चांदी व हीरे के जेवरात, जमीन-जायदाद से जुड़े 61 सेल डीड (रजिस्ट्री दस्तावेज), जिनकी सरकारी कीमत (सर्किल रेट) ही लगभग ₹58.58 करोड़ आंकी गई है। रिशु श्री ने महज 7-8 वर्षों में दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा और बिहार में करोड़ों की संपत्तियां और लग्जरी गाड़ियां खरीदी थीं।
कोर्ट में 4,000 पन्नों की चार्जशीट दाखिल
जून 2026 में स्पेशल विजिलेंस यूनिट (SVU) के एडीजी पंकज दराद ने बताया कि इस टेंडर घोटाले में रिशु श्री समेत 7 मुख्य आरोपियों के खिलाफ 4,000 पन्नों की चार्जशीट (आरोप पत्र) कोर्ट में दाखिल कर दी गई है।
क्या हैं आरोप?
टेंडर मैनेज करना: रिशु श्री अपनी पांच कंपनियों (जैसे Reliable Infra Services) के जरिए जल संसाधन, नगर विकास और भवन निर्माण विभागों के बड़े सरकारी टेंडर फिक्स करता था।
सीक्रेट पेपर्स लीक: टेंडर जारी होने से पहले ही विभागों के गोपनीय दस्तावेज रिशु श्री को भेज दिए जाते थे। वह अफसरों के साथ मिलकर टेंडर की शर्तों में हेरफेर करवा देता था।
कमिशन का खेल: रिशु श्री गुजरात और अन्य राज्यों की कंपनियों को टेंडर दिलवाने के एवज में 7% से 10% तक का मोटा कमिशन लेता था, जिसका एक बड़ा हिस्सा भ्रष्ट अधिकारियों में बंटता था। कोसी बराज (सुपौल) के ₹69 करोड़ के टेंडर को नियमों को ताक पर रखकर ₹94 करोड़ तक बढ़ा दिया गया था।
दो सीनियर IAS अधिकारी निलंबित, कई अफसर गिरफ्तार
रिशु श्री की डायरी और डिजिटल सबूतों के आधार पर बिहार सरकार और जांच एजेंसियों ने प्रशासनिक अमले पर अब तक की सबसे बड़ी गाज गिराई है।
दो IAS अधिकारी निलंबित (30 मई 2026): बिहार सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग ने आईएएस योगेश कुमार सागर (2017 बैच) और आईएएस अभिलाषा कुमारी शर्मा (2014 बैच) को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया। आरोप है कि रिशु श्री ने आईएएस योगेश कुमार और उनके परिवार के 8 सदस्यों के ऑस्ट्रेलिया व यूरोप (वियना, साल्जबर्ग) दौरे का करीब ₹22 लाख का खर्च उठाया था। वहीं आईएएस अभिलाषा शर्मा के घर के रिनोवेशन, रूफटॉप गार्डन और महंगे आईफोन का खर्च भी रिशु ने वहन किया था।
3 सीनियर अधिकारियों की गिरफ्तारी: एसवीयू ने इस मामले में भवन निर्माण विभाग के पूर्व मुख्य अभियंता तारिनी दास, वित्त विभाग के पूर्व संयुक्त सचिव मुमुक्षु चौधरी और बुडको (BUIDCO) के कार्यपालक अभियंता उमेश कुमार सिंह को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। इन अधिकारियों के घरों से भी करोड़ों रुपये कैश बरामद हुए थे।
फरार आरोपियों पर शिकंजा: वरिष्ठ आईएएस अधिकारी संजीव हंस और रिशु का सहयोगी पवन कुमार फिलहाल फरार हैं, जिनकी गिरफ्तारी के लिए लगातार छापेमारी जारी है।

