Thursday, September 24, 2026
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Self Financing: EWS आरक्षण केवल एडमिशन के लिए, प्राइवेट कॉलेजों से कम फीस की उम्मीद नहीं कर सकते…किस मामले में आई टिप्पणी, पढ़ें

Self Financing: सुप्रीम कोर्ट ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के छात्रों के लिए निजी मेडिकल कॉलेजों की भारी-भरकम फीस से जुड़ी एक बेहद महत्वपूर्ण याचिका को बुधवार को खारिज कर दिया है।

राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले को रखा बरकरार

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस जोयमाल्य बागची की खंडपीठ ने हर्षवर्धन सिंह बनाम राजस्थान राज्य मामले में सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि निजी मेडिकल कॉलेज ‘सेल्फ-फाइनेंसिंग’ (स्व-वित्तपोषित) संस्थान होते हैं, और उनसे सरकारी कॉलेजों की तरह सब्सिडी वाली फीस वसूलने की उम्मीद नहीं की जा सकती। शीर्ष अदालत ने राजस्थान उच्च न्यायालय (Rajasthan High Court) के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें कहा गया था कि EWS आरक्षण केवल प्रवेश (Admission) के स्तर पर लागू होता है, और यह छात्रों को निजी कॉलेजों में रियायती या कम फीस पाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं देता।

मामला क्या है?: ₹8 लाख की आय सीमा बनाम ₹25 लाख सालाना फीस

यह याचिका एक EWS श्रेणी के छात्र द्वारा दायर की गई थी, जिसने व्यावहारिक विसंगति पर सवाल उठाए थे।

छात्र का तर्क: याचिकाकर्ता ने दलील दी कि राजस्थान के निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस ₹18.9 लाख से लेकर ₹25 लाख प्रति वर्ष तक है। दूसरी ओर, सरकार ने EWS श्रेणी में आने के लिए अधिकतम पारिवारिक आय सीमा ₹8 लाख सालाना तय की है। ऐसे में ₹8 लाख कमाने वाला परिवार ₹25 लाख की सालाना फीस कैसे भर सकता है? छात्र का कहना था कि इतनी ऊंची फीस के कारण निजी कॉलेजों में EWS कोटा व्यावहारिक रूप से बेअसर (Ineffective) हो जाता है।

राजस्थान हाई कोर्ट का रुख: इससे पहले राजस्थान हाई कोर्ट ने छात्र की इस दलील को खारिज कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि राज्य की फीस नियामक समिति (State Fee Regulatory Committee) ने सुप्रीम कोर्ट के ‘इस्लामिक एकेडमी ऑफ एजुकेशन बनाम कर्नाटक राज्य’ फैसले के तहत ही फीस तय की है। कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो निजी कॉलेजों को EWS छात्रों के लिए फीस माफ करने या कम करने को मजबूर करे।

सुप्रीम कोर्ट का विधिक रुख: हमें डॉक्टरों की जरूरत है, प्राइवेट संस्थान बंद नहीं किए जा सकते

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया। सुनवाई के दौरान जस्टिस बी. वी. नागरत्ना ने निजी और सरकारी संस्थानों के बीच के बुनियादी अंतर को स्पष्ट करते हुए कई अहम टिप्पणियां कीं।

सरकारी सब्सिडी बनाम निजी संस्थान: जस्टिस नागरत्ना ने कहा, आप यह नहीं कह सकते कि निजी शैक्षणिक संस्थान भी सरकारी संस्थानों जितनी ही फीस वसूलें। ऐसा नहीं हो सकता। कोई यह कहकर कोर्ट नहीं आ सकता कि निजी कॉलेज की फीस बहुत ज्यादा है, इसलिए इसे सरकारी जैसा बना दो। ये स्व-वित्तपोषित (Self-financing) संस्थान हैं। सरकारी संस्थानों को राज्य से अनुदान (Subsidies) मिलता है, दोनों में बुनियादी अंतर है।

टीएमए पाई (TMA Pai) केस का हवाला: कोर्ट ने ऐतिहासिक टीएमए पाई केस का हवाला देते हुए कहा कि हालांकि मेडिकल कॉलेजों में ‘कैपिटेशन फीस’ (डोनेशन या अवैध अतिरिक्त वसूली) पर पूरी तरह प्रतिबंध है, लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि संस्थान अपनी सामान्य कॉलेज फीस भी नहीं ले सकते।

निजी क्षेत्र का योगदान जरूरी: अदालत ने आगाह किया कि अगर निजी कॉलेजों पर इस तरह के वित्तीय दबाव बनाए गए, तो चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में राज्य को मिलने वाली उनकी मदद बंद हो जाएगी। उन्होंने कहा, “हमें डॉक्टरों की जरूरत है।”

अफोर्डेबिलिटी पर कोर्ट का सुझाव: फीस चुकाने में असमर्थता पर जस्टिस नागरत्ना ने सुझाव दिया, “यदि आप भुगतान करने में असमर्थ हैं… तो स्कॉलरशिप (छात्रवृत्ति) या सबवेंशन (वित्तीय सहायता/लोन) प्राप्त करें…”

अंतिम आदेश: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “हमें हाई कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं दिखता। याचिका खारिज की जाती है। कानून का प्रश्न (यदि कोई हो) खुला रखा गया है।”

केस मैट्रिक्स और विधिक सारांश (Case Overview)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्चतम न्यायालय की विधिक कार्यवाही
संबंधित अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस जोयमाल्य बागची (खंडपीठ)
याचिकाकर्ताहर्षवर्धन सिंह (EWS अभ्यर्थी)
चुनौती का आधारनिजी मेडिकल कॉलेजों की ₹25 लाख/वर्ष की फीस EWS की ₹8 लाख आय सीमा के विपरीत है।
संबद्ध ऐतिहासिक केसटीएमए पाई फाउंडेशन (TMA Pai) और इस्लामिक एकेडमी ऑफ एजुकेशन केस
सुप्रीम कोर्ट का विधिक सिद्धांतEWS आरक्षण केवल ‘सीट अलॉटमेंट’ (प्रवेश) तक सीमित है; निजी कॉलेज सरकारी अनुदान के बिना चलते हैं, अतः वे पूरी फीस लेने के हकदार हैं।
अंतिम निर्णयराजस्थान हाई कोर्ट का फैसला बरकरार; याचिका पूर्णतः खारिज
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