Tuesday, September 29, 2026
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Sentence Review Board: रूसी लेखक एंटोन चेखव की पंक्तियों का हवाला देकर दो उम्रकैदियों को किया रिहा; सुधार की संभावना रिहाई का आधार

केस एवं विधिक सारांश (Overview Matrix)

विधिक/प्रशासनिक बिंदुविवरण (August 2026)
माननीय न्यायाधीशन्यायमूर्ति अनूप जयराम भंभानी (दिल्ली उच्च न्यायालय)
न्यायिक सिद्धांतRemission & Early Release Policy: रिहाई का निर्णय अपराध की गंभीरता के बजाय जेल के आचरण और पुनर्वास (Rehabilitation) पर आधारित होना चाहिए।
साहित्यिक संदर्भएंटोन चेखव की कहानी ‘द बेट’ (आजीवन कारावास बनाम मृत्युदंड)
अदालत का अंतिम आदेशSRB के खारिज करने के आदेश रद्द; दोनों उम्रकैदियों को तुरंत जेल से रिहा करने के निर्देश।

Sentence Review Board: दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और मानवीय निर्णय में दुष्कर्म के मामलों में दशकों से आजीवन कारावास की सजा काट रहे दो कैदियों को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया है।

न्यायमूर्ति अनूप जयराम भंभानी ने प्रसिद्ध रूसी साहित्यकार एंटोन चेखव (Anton Chekhov) की चर्चित लघु कथा ‘द बेट’ (The Bet) की पंक्तियों का उद्धरण देते हुए 11 अगस्त 2026 को यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया। साहित्यकार एंटोन चेखव ने लघु कथा में उल्लेख किया कि मृत्युदंड किसी व्यक्ति को तुरंत मार देता है, लेकिन आजीवन कारावास उसे धीरे-धीरे मारता है। कौन सा निष्पादक अधिक मानवीय है—वह जो आपको कुछ मिनटों में मार देता है या वह जो कई वर्षों के दौरान आपसे आपका जीवन छीन लेता है? कोर्ट ने माना कि सजा समीक्षा बोर्ड (Sentence Review Board – SRB) द्वारा केवल अपराध की पुरानी विभीषिका के आधार पर समय पूर्व रिहाई (Early Release) की अर्जी बार-बार खारिज करना गैर-कानूनी और मनमाना है।

Sentence Review Board: मामलों का विवरण और कैदियों का जेल रिकॉर्ड

  1. पहला मामला (1992 का अपराध)
    • कैदी को 1992 के मामले में उम्रकैद हुई थी। 3 जनवरी 2026 तक वह बिना रेमिशन (सजा में छूट) के 31 वर्ष से अधिक और छूट को मिलाकर 40 वर्ष से अधिक की सजा काट चुका था।
  2. दूसरा मामला (1997 का अपराध)
    • कैदी 6 अक्टूबर 2025 तक बिना रेमिशन के 15 वर्ष और छूट को मिलाकर 19 वर्ष से अधिक की जेल काट चुका था।

दोनों कैदियों का जेल में आचरण और व्यवहार “सतत रूप से उत्कृष्ट” पाया गया था। इसके बावजूद, सेंटेंस रिव्यू बोर्ड (SRB) और दिल्ली सरकार के गृह विभाग ने उनकी रिहाई की अर्जी को यह कहकर खारिज कर दिया था कि ‘अपराध जघन्य था और रिहाई से समाज में भय पैदा होगा या वे फिर से अपराध कर सकते हैं।’

🏛️ दिल्ली हाई कोर्ट की मुख्य कानूनी व्याख्याएं

  1. ‘सजा की प्रकृति स्थिर है, कैदी का आचरण परिवर्तनशील’
    • न्यायमूर्ति भंभानी ने स्पष्ट किया कि मूल अपराध की गंभीरता और दी गई सजा की अवधि “स्थिर ऐतिहासिक तथ्य” (Static, Historical Facts) हैं। यदि केवल इसी आधार पर रिहाई रोकी गई, तो कोई भी आजीवन कारावास का कैदी कभी भी समय पूर्व रिहाई का हकदार नहीं बन पाएगा।
  2. अटकलों के आधार पर रिहाई से इनकार गलत
    • कोर्ट ने कहा कि कैदी के पुन: अपराध करने (Propensity to Re-offend) की आशंका किसी मनोवैज्ञानिक या व्यावहारिक आकलन पर आधारित होनी चाहिए, न कि पीड़ितों/गवाहों के बेबुनियाद डर या generic उम्र संबंधी तर्कों पर।
  3. अनुच्छेद 21 (Right to Life & Liberty) का उल्लंघन
    • हाई कोर्ट ने SRB के खारिज करने के आदेशों को मनमाना (Arbitrary) और अनुच्छेद 21 के तहत मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करार देते हुए रद्द कर दिया।

⚖️ न्याय मित्र और वकीलों के तर्क

  • एमिकस क्यूरी (वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका जॉन): उन्होंने कोर्ट को बताया कि समय पूर्व रिहाई के लिए केवल यह देखना चाहिए कि क्या कैदी ने सुधार के बाद अपराध करने की प्रवृत्ति खो दी है, उसके समाज में उपयोगी नागरिक बनने की संभावना क्या है और उसके परिवार की सामाजिक-आर्थिक स्थिति क्या है।
  • याचिकाकर्ताओं के वकील (सौजन्या शंकरन एवं सार्थक मग्गॉन): उन्होंने दलील दी कि SRB केवल “समाज का विश्वास डगमगाना” या “जघन्य अपराध” जैसी सामान्य शब्दावलियों के पीछे छिपकर वास्तविक जेल आचरण की उपेक्षा कर रहा था।
  • राज्य सरकार (सरकारी वकील संजीव भंडारी एवं अमोल सिन्हा): उन्होंने तर्क दिया कि अपराध इतने बर्बर थे कि उन्होंने समाज की सामूहिक चेतना को झकझोर दिया था, इसलिए केवल जेल में लंबा समय बिताने के आधार पर रिहाई देना समाज के लिए सही नहीं होगा।

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