Sikh Religion: सिख धर्म के पांच प्रमुख तख्तों में से एक, तख्त श्री हजूर साहिब के प्रबंधकों और धार्मिक नेतृत्व ने महाराष्ट्र सरकार के एक विवादास्पद प्रस्ताव को पूरी तरह खारिज कर दिया है।
नांदेड़ सिख गुरुद्वारा सचखंड श्री हजूर अबचलनगर साहिब अधिनियम, 1956 का मामला
इस विवादित प्रस्ताव में सात दशक पुराने नांदेड़ सिख गुरुद्वारा सचखंड श्री हजूर अबचलनगर साहिब अधिनियम, 1956 को निरस्त (Repeal) कर उसकी जगह एक नया कानून लाने की तैयारी की जा रही है। धार्मिक स्वायत्तता और गुरुद्वारा प्रबंधन में सरकारी हस्तक्षेप के खिलाफ एक सुर में आवाज उठाते हुए सिख पादरियों और विद्वानों ने सर्वसम्मति से एक ‘गुरमाता’ (सामूहिक धार्मिक आदेश) जारी किया है, जिसमें मूल 1956 के अधिनियम को ही बनाए रखने की सख्त मांग की गई है।
क्या होता है ‘गुरमाता’ और क्यों है यह बेहद अहम?
सिख परंपरा में ‘गुरमाता’ (जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘गुरु की मति या सलाह’) कोई सामान्य प्रशासनिक प्रस्ताव नहीं होता।
यह गुरु ग्रंथ साहिब की छत्रछाया में पंज प्यारों (Panj Pyare), वरिष्ठ पादरियों और विभिन्न सिख धार्मिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों की उच्च स्तरीय बैठक के बाद सर्वसम्मति से लिया गया एक बाध्यकारी और सर्वोच्च सामूहिक धार्मिक निर्णय है।
तख्त के जत्थेदार ज्ञानी कुलवंत सिंह की उपस्थिति में सिंह साहिब ज्ञानी राम सिंह द्वारा औपचारिक रूप से इस गुरमाता को पढ़कर सुनाया गया।
तख्त के वरिष्ठ पदाधिकारियों के अनुसार, सरकार का यह कदम तख्त की स्थापित धार्मिक परंपराओं, स्वतंत्र मर्यादा (Religious Code) और प्रशासनिक स्वतंत्रता को कमजोर (Dilute) करने का एक सीधा प्रयास है।
विवाद की जड़: क्या है मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस सरकार का नया प्रस्ताव?
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की अध्यक्षता में महाराष्ट्र कैबिनेट ने हाल ही में 1956 के पुराने अधिनियम को रद्द करने और उसकी जगह “तख्त सचखंड श्री हजूर अबचलनगर साहिब गुरुद्वारा अधिनियम” नामक एक नया कानून पेश करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है।
विधानसभा में पेश करने की तैयारी: इस नए विधेयक को वर्तमान विधानसभा सत्र में पटल पर रखा जाना तय है। सरकार का तर्क है कि एक राज्य-गठित समिति (जस्टिस भाटिया समिति) की सिफारिशों के आधार पर गुरुद्वारा बोर्ड के चुनाव, प्रबंधन और उप-नियमों (By-laws) में संरचनात्मक और पारदर्शी सुधार करने के लिए यह नया ढांचा जरूरी है।
सिख संस्थाओं की आशंका: इसके विपरीत, पूर्व वरिष्ठ पदाधिकारियों और बड़े पंथिक संगठनों का मानना है कि इस नए कानून के पीछे निहित स्वार्थ (Vested Interests) छिपे हैं। इसके जरिए सरकार तख्त के मामलों में सीधे घुसपैठ करना चाहती है और इसके विशाल संसाधनों पर अपना नियंत्रण स्थापित करना चाहती है।
सरकार का पुराना ‘यू-टर्न’ और बार-बार संशोधन के प्रयास
यह पहली बार नहीं है जब नांदेड़ गुरुद्वारा बोर्ड के प्रशासनिक ढांचे को बदलने को लेकर टकराव हुआ है। इससे पहले भी सरकार को कड़े विरोध के आगे झुकना पड़ा था।
फरवरी 2024 का बड़ा विवाद: राज्य सरकार ने तब एक संशोधन के जरिए बोर्ड के 17 सदस्यों में से 12 को सीधे नामांकित (Direct Nomination) करने का अधिकार अपने हाथ में ले लिया था। इसके साथ ही शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) का कोटा कम कर दिया गया था और चीफ खालसा दीवान, हजूरी सचखंड दीवान तथा सिख सांसदों की सदस्यता को समाप्त कर दिया गया था।
पीछे हटने पर हुई थी मजबूर: SGPC और स्थानीय सिख संगठनों के भारी विरोध और बड़े पैमाने पर हुए प्रदर्शनों के बाद सरकार को वह संशोधन वापस (Roll back) लेने के लिए मजबूर होना पड़ा था। इसी तरह के प्रयास 2018 और 2019 में भी किए गए थे, जिन्हें सिख समुदाय ने नाकाम कर दिया था।
केस मैट्रिक्स: 1956 का कानून बनाम नया प्रस्तावित विधेयक
| प्रशासनिक बिंदु | 1956 का मौजूदा अधिनियम (Sachkhand Act) | नया प्रस्तावित कानून (Fadnavis Cabinet Proposal) |
| प्रबंधन का स्वरूप | संतुलित और स्वतंत्र बोर्ड, जिसमें SGPC, चीफ खालसा दीवान और स्थानीय हितधारकों का प्रतिनिधित्व है। | राज्य-गठित समिति की सिफारिशों पर आधारित नया ढांचा, जिसमें चुनाव और उप-नियमों में बड़े बदलाव शामिल हैं। |
| सिख संस्थाओं का स्टैंड | अकाली तख्त, SGPC और स्थानीय सिख संगठन इस कानून को पूरी तरह बनाए रखने के पक्ष में हैं। | पंथिक निकायों द्वारा इसे धार्मिक स्वायत्तता में सीधी सरकारी घुसपैठ और प्रभुत्व स्थापित करने की कोशिश माना जा रहा है। |
| धार्मिक प्रतिक्रिया | पंज प्यारों और जत्थेदार की मौजूदगी में सरकार के इस कदम के खिलाफ ‘गुरमाता’ जारी। | सरकार इसे गुरुद्वारे के आधुनिक और पारदर्शी प्रबंधन के लिए आवश्यक कदम बता रही है। |

