Sunday, November 8, 2026
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Litigant Attendence In Court:वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेशी विवेक पर निर्भर है, यह मौलिक अधिकार नहीं; याचिकाकर्ता पर ₹6.7 लाख का जुर्माना

केस एवं प्रक्रियात्मक सारांश (Case Matrix Overview)

विधिक/प्रशासनिक बिंदुविवरण (अगस्त 2026)
माननीय पीठन्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी (इलाहाबाद उच्च न्यायालय)
मामला/विषयराज्य सूचना आयोग के आदेश के खिलाफ रिट याचिका एवं वीसी से पेशी का दावा
संबंधित कानूनRight to Information Act, 2005 एवं High Court Video Conferencing Rules
मुख्य कानूनी सिद्धांतVideo Conferencing कोर्ट की सुविधा व विवेक पर निर्भर है, यह मौलिक अधिकार नहीं है; न्याय प्रशासन में बाधा डालने के लिए RTI का दुरुपयोग करने पर भारी हर्जाना लगाया जा सकता है।
अदालत का निर्णययाचिका खारिज; याचिकाकर्ता पर कुल ₹6.7 लाख का जुर्माना।

Litigant Attendence In Court: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) के जरिए अदालत में पेशी की अनुमति देना कोर्ट के विवेक (Discretion) का विषय है, न कि किसी याचिकाकर्ता का मौलिक अधिकार (Fundamental Right)।

न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की पीठ ने राज्य सूचना आयोग के आदेश को चुनौती देने वाली रिट याचिका को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। अदालत के आदेश के बावजूद व्यक्तिगत रूप से पेश न होने और सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम का दुरुपयोग करने पर हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता (Litigant-in-person) पर कुल ₹6,70,000 (6.7 लाख रुपये) का भारी-भरकम जुर्माना लगाया है।

हाई कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां

  • वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग मौलिक अधिकार नहीं:“केवल वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश होने का पूर्ण अधिकार (Absolute Right) खारिज किया जाता है, क्योंकि यह याचिकाकर्ता द्वारा दावा किया गया मौलिक अधिकार नहीं है बल्कि सुविधा का एक जरिया है। वीसी के माध्यम से उपस्थिति केवल मुकदमेबाजी में तेजी लाने की सुविधा प्रदान करने के लिए है। इसका अधिकार के रूप में दावा नहीं किया जा सकता। यदि कोर्ट व्यक्तिगत रूप से (In-Person) उपस्थित होने का निर्देश देता है, तो बिना किसी अकारण बहाने के उसका पालन किया जाना चाहिए।”
  • न्याय प्रशासन और RTI का दुरुपयोग: अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता ने जून और जुलाई 2026 के बीच कोर्ट रजिस्ट्री को परेशान करने और अदालती कार्यवाही में बाधा डालने के उद्देश्य से सर्वर लॉग्स और उपस्थिति रजिस्टर जैसे अप्रासंगिक प्रशासनिक रिकॉर्ड की मांग करते हुए 24 निरर्थक RTI आवेदन दायर किए थे।

मामला क्या था? (Case Background)

  1. मूल विवाद (RTI से जुड़ी जानकारी)
    • याचिकाकर्ता ने विमेन हेल्पलाइन और साइबर सेल, गोरखपुर में उसके खिलाफ की गई शिकायतों और जांच अधिकारियों के विवरण की मांग करते हुए 2022 में RTI दाखिल की थी।
    • उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग (State Information Commission, U.P.) ने 28 जुलाई 2023 को उसकी अपील यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि मांगी गई जानकारी जनवरी 2023 में ही पंजीकृत डाक द्वारा भेजी जा चुकी है। याचिकाकर्ता ने इसी आदेश को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
  2. अदालत के आदेश का उल्लंघन
    • याचिकाकर्ता ने अपने वकील को हटाकर खुद बहस करने (In-Person) की अनुमति मांगी और वीसी से ही पेश होने का ‘मौलिक अधिकार’ जताते हुए लिखित विरोध दर्ज कराया।
    • हाई कोर्ट ने 24 जुलाई 2026 को स्पष्ट आदेश दिया था कि वह 5 अगस्त 2026 को अंतिम सुनवाई के लिए व्यक्तिगत रूप से (In-Person) अदालत में उपस्थित हो। इसके बावजूद याचिकाकर्ता कोर्ट के स्पष्ट निर्देश की अवहेलना करते हुए केवल वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जुड़ा।
  3. गलत आवेदन और रजिस्ट्री को प्रताड़ित करना
    • याचिकाकर्ता ने जवाब दाखिल न करने का झूठा आरोप लगाते हुए तीन प्रतिवादियों को दंडित करने की अर्जी भी लगाई, जबकि रिकॉर्ड में जवाब पहले ही दाखिल पाया गया। इसके अतिरिक्त, उसने रजिस्ट्री कर्मचारियों का समय बर्बाद करने के लिए 24 निरर्थक RTI अर्जियां लगा दी थीं।

⚖️ हाई कोर्ट का अंतिम फैसला और जुर्माना (Breakdown of Costs)

अदालत ने याचिका को गुण-दोष (Merits) के आधार पर खारिज कर दिया, क्योंकि मांगी गई जानकारी पहले ही दी जा चुकी थी। कोर्ट ने याचिकाकर्ता के आचरण और अदालत का समय बर्बाद करने पर सख्त रुख अपनाते हुए कुल ₹6,70,000 का जुर्माना लगाया।

  1. गलत/गुमराह करने वाले आवेदन पर: ₹50,000 का जुर्माना।
  2. 24 निरर्थक RTI आवेदनों पर: प्रति आवेदन ₹5,000 के हिसाब से कुल ₹1,20,000।
  3. अदालती आदेश का उल्लंघन और याचिका खारिज होने पर: ₹5,00,000 का भारी हर्जाना।

भुगतान का निर्देश: याचिकाकर्ता को यह संपूर्ण राशि 4 सप्ताह के भीतर हाई कोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी (High Court Legal Services Committee) के पास जमा करने का निर्देश दिया गया है। ऐसा न करने पर रजिस्ट्रार जनरल को वसूली की कानूनी प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दिया गया है।

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