याचिका में उठाए गए मुख्य बिंदु
- जानबूझकर तैयार किए गए एडिक्टिव फीचर्स: याचिका में आरोप लगाया गया है कि प्लेटफॉर्म्स पर मौजूद फीचर्स जैसे—इन्फिनिट स्क्रॉलिंग (Infinite Scrolling), ऑटोप्ले (Autoplay), एल्गोरिथम-आधारित पर्सनल फीड, पुश नोटिफिकेशन और “लाइक्स” (Likes) जैसे एंगेजमेंट मीट्रिक्स—यूजर्स को बांधे रखने के लिए जानबूझकर डिजाइन किए गए हैं।
- मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर असर: ये फीचर्स केवल तकनीक का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि विज्ञापनों से राजस्व (Revenue) बढ़ाने के उद्देश्य से तैयार किए गए हैं। इनका बच्चों और युवाओं के मनोवैज्ञानिक व शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
- मुख्य प्रार्थनाएं (Prayers):
- विशेषज्ञ समिति का गठन: केंद्र सरकार को सोशल मीडिया फीचर्स की जांच करने और सिफारिशें देने के लिए एक्सपर्ट कमेटी बनाने का निर्देश दिया जाए।
- फीचर्स पर प्रतिबंध व विनियमन: टेक प्लेटफॉर्म्स के ऐसे लत लगाने वाले फीचर्स को प्रतिबंधित या विनियमित किया जाए।
- मेंटल हेल्थ रेड्रेसल फंड: सोशल मीडिया के कारण प्रभावित यूजर्स के इलाज और सहायता के लिए टेक कंपनियों के योगदान से ‘मेंटल हेल्थ फंड’ का गठन किया जाए।
नई दिल्ली: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के मनोवैज्ञानिक रूप से नशे की लत लगाने वाले डिज़ाइनों (Addictive Design Features) और बच्चों व युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर उनके दुष्प्रभाव को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है।
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ इस याचिका पर सुनवाई करेगी। याचिका में केंद्र सरकार को इन फीचर्स के नियमन के निर्देश देने के साथ-साथ मेटा (Meta), गूगल (Google), टेलीग्राम (Telegram), एक्स (X) और स्नैपचैट (Snapchat) जैसी दिग्गज टेक कंपनियों से मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने के एवज में मुआवजे की मांग की गई है [डॉ. विकास कथूरिया बनाम भारत संघ एवं अन्य]।
जनहित याचिका (PIL) में उठाए गए मुख्य विधिक व तकनीकी बिंदु
1. ‘इंजीनियरिंग संयोग नहीं, बल्कि जानबूझकर चुना गया व्यावसायिक डिजाइन’ बीएमएल मुंजाल यूनिवर्सिटी में कानून के प्रोफेसर डॉ. विकास कथूरिया द्वारा दायर याचिका में सोशल मीडिया कंपनियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं: “इन्फिनिट स्क्रॉलिंग (Infinite Scrolling), ऑटोप्ले (Autoplay), एल्गोरिद्म-आधारित पर्सनलाइज्ड फीड, बार-बार आने वाले नोटिफिकेशन और ‘लाइक्स’ (Likes) जैसी एंगेजमेंट मेट्रिक्स कोई तकनीकी सुविधा का आकस्मिक परिणाम नहीं हैं। यह जानबूझकर चुने गए ऐसे डिजाइन हैं, जिन्हें उपयोगकर्ताओं का ध्यान खींचने, उन्हें रोके रखने और बार-बार आकर्षित करने के लिए तैयार किया गया है, ताकि उपयोगकर्ताओं के मनोवैज्ञानिक व शारीरिक स्वास्थ्य की परवाह किए बिना विज्ञापन राजस्व (Advertising Revenue) को अधिकतम किया जा सके।”
2. युवाओं और बच्चों के विकास व मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर याचिका में रेखांकित किया गया है कि सोशल मीडिया के लंबे और अत्यधिक उपयोग से बच्चों और किशोरों के संज्ञानात्मक विकास (Cognitive Development), व्यवहार और मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है, जिससे वे डिप्रेशन, एंग्जाइटी और स्क्रीन की गंभीर लत का शिकार हो रहे हैं।
जनहित याचिका में मांगी गई प्रमुख राहतें
याचिकाकर्ता ने उच्च न्यायालय से निम्नलिखित निर्देश जारी करने की प्रार्थना की है:
- विशेषज्ञ समिति का गठन: केंद्र सरकार को एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति (Expert Committee) गठित करने का निर्देश दिया जाए, जो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के डिजाइन फीचर्स की जांच करे और इससे निपटने के लिए वैधानिक सिफारिशें दे।
- एडिक्टिव फीचर्स पर प्रतिबंध या नियमन: केंद्र सरकार और संबंधित प्राधिकारियों को निर्देश दिया जाए कि वे ऐसे लत लगाने वाले फीचर्स (जैसे ऑटोप्ले, एल्गोरिद्मिक फीड्स आदि) को प्रतिबंधित, सीमित या कड़े नियमों के तहत लाएं।
- मेंटल हेल्थ रिड्रेसल फंड (Mental Health Redressal Fund): सोशल मीडिया के दुष्प्रभावों से प्रभावित उपयोगकर्ताओं के मानसिक स्वास्थ्य उपचार और पुनर्वास के लिए एक विशेष मानसिक स्वास्थ्य निवारण कोष की स्थापना की जाए।
- टेक कंपनियों पर हर्जाना: मेटा, गूगल, टेलीग्राम, एक्स और स्नैपचैट द्वारा इस तरह के एडिक्टिव फीचर्स संचालित करने के कारण उपयोगकर्ताओं को पहुंचे मानसिक नुकसान के लिए इन कंपनियों से वित्तीय मुआवजा/हर्जाना वसूला जाए।
विधिक प्रतिनिधित्व
- याचिकाकर्ता की ओर से: अधिवक्ता वर्तिका शर्मा, हर्षा साधवानी और सुभिका जोशी।
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया।
Social Media Addiction: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| पीठासीन पीठ | चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया |
| याचिकाकर्ता | डॉ. विकास कठूरिया (कानून के प्रोफेसर) |
| प्रतिवादी कंपनियां | Meta (Facebook/Instagram), Google (YouTube), X, Snapchat, Telegram |
| मुख्य मांगें | एडिक्टिव फीचर्स का विनियमन, विशेषज्ञ समिति का गठन, टेक कंपनियों से मानसिक स्वास्थ्य मुआवजा फंड बनाना। |

