Sunday, June 14, 2026
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Unfair Trade Practice: कंपनी को बियर की बोतल पर ₹10 एक्स्ट्रा क्यों वसूलना पड़ा भारी…उपभोक्ता अदालत का आदेश आपको बताएगा

Unfair Trade Practice: उत्पाद की छपी हुई अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) से एक रुपया भी ज्यादा वसूलना ‘अनुचित व्यापार प्रथा’ की श्रेणी में आता है, जिसके लिए कंपनियों या सरकारी विभागों को भारी हर्जाना भुगतना होगा।

केरल स्टेट बेवरेजेज कॉरपोरेशन का मामला

जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, पथनमथिट्टा (केरल) ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए ‘केरल स्टेट बेवरेजेज कॉरपोरेशन’ (KSBC) को एक ग्राहक से बियर की बोतल पर मात्र ₹10 अतिरिक्त वसूलने का दोषी पाया है। अदालत ने इस प्रवृत्ति पर कड़ा रुख अपनाते हुए सरकारी शराब निगम को आदेश दिया है कि वह पीड़ित उपभोक्ता को ₹25,000 का मुआवजा और कानूनी खर्च अदा करे।

दोषी पक्ष पर पर्याप्त जुर्माना और हर्जाना लगाया जाना नितांत आवश्यक

आयोग के अध्यक्ष जॉर्ज बेबी और सदस्य निषाद थंकप्पन की पीठ ने अपने आदेश में साफ कहा, विपक्षी दल (KSBC) द्वारा एमआरपी से अधिक शुल्क वसूलना उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत ‘सेवा में कमी’ (Deficiency in Service) और ‘अनुचित व्यापार प्रथा’ (Unfair Trade Practice) है। बाजार में चल रहे इस गलत चलन को बदलने के लिए दोषी पक्ष पर पर्याप्त जुर्माना और हर्जाना लगाया जाना नितांत आवश्यक है।

मामला क्या था? (₹170 की बियर का ₹180 का बिल और स्टाफ की बदतमीजी)

यह मामला केरल के पथनमथिट्टा जिले में स्थित केरल स्टेट बेवरेजेज कॉरपोरेशन (जो राज्य में शराब की बिक्री संभालने वाली सरकारी संस्था है) के एक आउटलेट का है।

₹10 की अवैध वसूली: एक ग्राहक ने केएसबीसी (KSBC) के काउंटर से 650 मिलीलीटर की बियर की बोतल खरीदी। काउंटर पर मौजूद स्टाफ ने उनसे ₹180 वसूले और इसी राशि का बिल थमा दिया। हालांकि, जब ग्राहक ने बोतल पर छपी एमआरपी (MRP) देखी, तो उस पर ₹170 अंकित था।

शिकायत करने पर दी चुनौती: ग्राहक ने जब इस ₹10 के अंतर पर आपत्ति जताई, तो आउटलेट के कर्मचारियों ने उनके साथ कथित रूप से बेहद अभद्र व्यवहार किया। स्टाफ का कहना था कि कंप्यूटर बिल में जो राशि आई है, वही देनी होगी; अगर कोई शिकायत है, तो जाकर केस दर्ज करा दो। इसके बाद उपभोक्ता ने अपने अधिकारों की रक्षा के लिए उपभोक्ता फोरम में याचिका दायर की।

सरकारी निगम का अजीबोगरीब बचाव: ‘करोड़ों बोतलों पर नया स्टिकर लगाना मुमकिन नहीं’

केआरबीसी ने अदालत में स्वीकार किया कि बोतल पर ₹170 छपा होने के बावजूद उसे ₹180 में बेचा गया था, लेकिन इसके पीछे उन्होंने प्रशासनिक दलीलें दीं।

सोशल सिक्योरिटी सेस का हवाला: निगम ने तर्क दिया कि केरल सरकार द्वारा लगाए गए ‘सामाजिक सुरक्षा उपकर’ (Social Security Cess) और शराब की कीमतों में हुए संशोधन के कारण बियर के दाम ₹10 बढ़ गए थे।

व्यावहारिक कठिनाई: सरकारी वकील ने दलील दी कि जब भी सरकार कीमतें बदलती है, तो गोदामों, खुदरा दुकानों और सप्लाई चेन में पहले से मौजूद करोड़ों बोतलों पर दोबारा नया रेट प्रिंट करना या नया लेबल लगाना व्यावहारिक रूप से असंभव (Impractical) है। उन्होंने ‘लीगल मेट्रोलॉजी रूल्स, 2011’ का हवाला देकर पुराने स्टॉक को नई कीमतों पर बेचने की अनुमति होने का दावा किया।

उल्टा ग्राहक पर आरोप: निगम ने यह भी दावा किया कि दुकान के बाहर संशोधित कीमतों का नोटिस बोर्ड लगाया गया था और शिकायतकर्ता ने काउंटर पर हंगामा करके काम बाधित किया था।

उपभोक्ता फोरम का विधिक निष्कर्ष: ‘फाइलें देखना ग्राहक का काम नहीं, MRP ही अंतिम अनुबंध’

उपभोक्ता आयोग ने सरकारी निगम की सभी दलीलों को खारिज करते हुए ‘लीगल मेट्रोलॉजी (पैकेज्ड कमोडिटीज) रूल्स, 2011’ के नियम 18(2) की याद दिलाई, जो किसी भी खुदरा विक्रेता को पैकेट पर छपे मूल्य से अधिक पर सामान बेचने से सख्ती से रोकता है।

अदालत ने अपने फैसले में दूरगामी विधिक टिप्पणियां

एमआरपी ही अंतिम सत्य: बोतल पर छपी एमआरपी ही कानूनन अधिकतम सीमा है। कानून इस मामले में ‘सख्त उत्तरदायित्व’ (Strict Liability) तय करता है। जैसे ही बोतल पर ₹170 और बिल में ₹180 दिखा, अपराध स्वतः साबित हो जाता है।

आंतरिक सरकारी आदेशों से ग्राहक का क्या लेना-देना?: अदालत ने कहा कि किसी आम उपभोक्ता से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह सरकार के आंतरिक आदेशों, अधिसूचनाओं या प्रशासनिक व्यवस्थाओं की जानकारी रखे। उपभोक्ता को लीगल मेट्रोलॉजी एक्ट के तहत पैकेज पर लिखी जानकारी पर भरोसा करने का पूरा विधिक अधिकार है। ग्राहक को सरकारी फाइलें खंगालने के बोझ तले नहीं दबाया जा सकता। बोतल पर छपी एमआरपी ही विक्रेता और ग्राहक के बीच का वास्तविक अनुबंध (Contract Price) है।

विधिक विश्लेषण: उपभोक्ता आयोग का दंडात्मक मैट्रिक्स

अदालत ने माना कि ₹10 की इस अवैध वसूली और स्टाफ के अड़ियल रवैये ने उपभोक्ता को गंभीर मानसिक प्रताड़ना दी और उसे अपने बुनियादी अधिकारों के लिए दर-दर भटकने पर मजबूर किया।

उपभोक्ता फोरम का अंतिम आदेशनिर्धारित वित्तीय देनदारी (Payout Matrix)
अतिरिक्त राशि की वापसीवसूली गई एक्स्ट्रा राशि ₹10 को केस दर्ज होने की तारीख से 9% वार्षिक ब्याज के साथ लौटाने का आदेश।
मानसिक उत्पीड़न का हर्जानाग्राहक को हुई मानसिक प्रताड़ना और असुविधा के एवज में ₹15,000 का मुआवजा।
मुकदमेबाजी का खर्चकानूनी लड़ाई और अदालती चक्करों के खर्च के रूप में ₹10,000 का भुगतान।
भुगतान की समय सीमाआदेश जारी होने के 30 दिनों के भीतर केएसबीसी को यह पूरी राशि चुकानी होगी।
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