Friday, October 2, 2026
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Second Wife: पहली शादी कायम होना हमेशा दूसरी शादी की पत्नी के गुजारा भत्ते में बाधा नहीं…पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट की यह टिप्पणी पढ़ें

मामला सारांश (At a Glance)

पहलूविवरण
माननीय पीठन्यायमूर्ति मनदीप पन्नू (Justice Mandeep Pannu)
संबंधित कानूनदंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125
मुख्य कानूनी नजीरSmt. N. Usha Rani vs. Moodududla Srinivas (2025) & Chanmuniya (2011)
अदालत का फैसलालंबे सहवास (Co-habitation) के बाद पति पहली शादी के रद्द न होने की आड़ लेकर गुजारा भत्ता देने से इनकार नहीं कर सकता।

Second Wife: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट (Punjab and Haryana High Court) ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 (Section 125 CrPC) के तहत दिए गए एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि पति और पत्नी लंबे समय तक साथ रहे हैं और उनका बच्चा भी है, तो केवल पहली शादी के आधिकारिक रूप से कायम रहने के तकनीकी आधार पर दूसरी पत्नी को गुजारा भत्ता देने से इनकार नहीं किया जा सकता।

न्यायमूर्ति मनदीप पन्नू (Justice Mandeep Pannu) की पीठ ने पति द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision) को खारिज करते हुए पारिवारिक अदालत (Family Court) के गुजारा भत्ता देने के आदेश को बरकरार रखा।

अदालत ने कहा: पक्षकार लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह एक साथ रहे हैं और इस रिश्ते से एक बच्चे का जन्म भी हुआ है। याचिकाकर्ता केवल पहली शादी के कायम रहने के आरोप के आधार पर पत्नी के दावे को खारिज कराना चाहता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के ‘एन. उषा रानी’ मामले के बाद, ऐसा तकनीकी विरोध अकेले किसी महिला को धारा 125 CrPC के तहत भत्ते से वंचित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता।

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सुप्रीम कोर्ट के ‘एसएमटी. एन. उषा रानी (2025)’ नजीर का हवाला

हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के हालिया ऐतिहासिक फैसले ‘श्रीमती एन. उषा रानी बनाम मूडुदुदला श्रीनिवास (2025)’ पर भरोसा जताया।

  • इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि यदि महिला अपने पहले पति से पूरी तरह अलग (De facto separated) रह रही है और पहली शादी से उसे कोई वित्तीय या कानूनी लाभ नहीं मिल रहा है, तथा दूसरा पति सभी परिस्थितियों को जानते हुए उसके साथ रिश्ते में आया था, तो वह दूसरे पति से धारा 125 CrPC के तहत गुजारा भत्ता पाने की हकदार है।
  • पीठ ने जोर दिया कि धारा 125 CrPC एक सामाजिक न्याय का उपाय (Social Justice Measure) है और तकनीकी कानूनी खामियों के जरिए किसी पुरुष को संबंध के लाभ उठाने के बाद अपनी जिम्मेदारियों से भागने की इजाजत नहीं दी जा सकती।

फैसले के प्रमुख कानूनी बिंदु

  1. शिक्षित होना या पहले नौकरी करना भत्ता रोकने का आधार नहीं
    • पति की इस दलील को खारिज कर दिया गया कि पत्नी शिक्षित है और पहले शिक्षिका (Teacher) के रूप में काम कर चुकी है। कोर्ट ने कहा कि भत्ते की पात्रता का निर्धारण पक्षकारों के वास्तविक साधनों और वर्तमान परिस्थितियों के आधार पर होता है।
  2. डिफॉल्ट में खारिज (Dismissed in Default) याचिका की स्थिति
    • पति ने तर्क दिया था कि समान कारणों पर दायर पहली याचिका गैर-हाजिरी के कारण खारिज हो गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘डिफॉल्ट में खारिज होना’ और ‘गुण-दोष (Merits) पर फैसला होना’ दो अलग बातें हैं। गैर-हाजिरी के कारण याचिका का खारिज होना नई याचिका दायर करने में रुकावट नहीं बनता।
  3. सविताबेन केस (2005) बनाम एन. उषा रानी केस (2025)
    • पति द्वारा सविताबेन सोमाभाई भाटिया बनाम गुजरात राज्य (2005) के फैसले का हवाला देने पर कोर्ट ने कहा कि उस फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट ने चानमुनिया बनाम वीरेंद्र कुमार सिंह (2011) और एन. उषा रानी (2025) में “पत्नी” शब्द की व्यापक और उदार व्याख्या की है।

पारिवारिक अदालत का आदेश बरकरार

याचिकाकर्ता की पत्नी ने प्रताड़ना, दहेज उत्पीड़न और भरण-पोषण न करने का आरोप लगाते हुए ₹30,000 प्रति माह भत्ते की मांग की थी। निचली पारिवारिक अदालत ने:

  • पत्नी के लिए: ₹5,000 प्रति माह
  • बच्चे के लिए: ₹2,500 प्रति माह (वयस्क होने तक)

हाई कोर्ट ने इस आदेश को पूरी तरह उचित मानते हुए याचिका को खारिज कर दिया।

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