मुख्य बिंदु (Key Indicators)
- ‘सामान्य हित’ बनाम ‘व्यक्तिगत हित’ का टेस्ट: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुख्य आधार यह देखना है कि याचिका में ‘सामान्य हित’ (Common Interest) उठाया गया है या ‘व्यक्तिगत हित’ (Individual Interest)। यदि कई लोग एक ही सामान्य कारण से याचिका दाखिल करते हैं, तभी एक सेट कोर्ट फीस स्वीकार्य होगी।
- व्यक्तिगत लाभ वाले मामलों पर नियम: सेवा नियमितीकरण (Service Regularisation), पेंशन दावों या भर्ती प्रक्रियाओं को चुनौती देने जैसे मामलों में जहां परिणाम से प्रत्येक याचिकाकर्ता को व्यक्तिगत रूप से लाभ होता है, वहां प्रत्येक याचिकाकर्ता के हिसाब से अलग-अलग कोर्ट फीस देनी होगी।
- सुविधा का गलत इस्तेमाल नहीं: हाईकोर्ट ने कहा कि कई लोगों को एक ही याचिका में शामिल होने की अनुमति कागज, जगह और मुकदमेबाजी का खर्च बचाने की ‘प्रक्रियात्मक सुविधा’ (Procedural Convenience) के लिए दी जाती है। इस सुविधा का उपयोग राज्य के राजस्व (Court Fees) को नुकसान पहुंचाने या चोरी करने के लिए नहीं किया जा सकता।
- याचिकाकर्ता की दलील खारिज: याचिकाकर्ता वकील सत्यम सुराणा ने तर्क दिया था कि ‘महाराष्ट्र कोर्ट फीस एक्ट, 1959’ में हाईकोर्ट के समक्ष प्रस्तुत याचिका के लिए एक निश्चित शुल्क तय है और इसमें ‘प्रति याचिकाकर्ता’ शब्द जानबूझकर नहीं जोड़ा गया है। कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया।
मुंबई: बॉम्बे उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि संविधान के अनुच्छेद 226 या 227 के तहत दायर संयुक्त रिट याचिकाओं (Joint Writ Petitions) में यदि याचिकाकर्ताओं के वाद-कारण (Cause of Action) व्यक्तिगत हैं, तो कोर्ट फीस ‘प्रति याचिका’ (Per Petition) के बजाय ‘प्रति याचिकाकर्ता’ (Per Petitioner) के आधार पर चुकानी होगी [सत्यम सुराणा बनाम बॉम्बे हाईकोर्ट]।
न्यायमूर्ति संदीप वी. मार्ने की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि एक सेट कोर्ट फीस केवल उन्हीं मामलों में पर्याप्त होगी जहां सह-याचिकाकर्ताओं का वाद-कारण साझा या एक समान (Common/Identical) हो।
उच्च न्यायालय की प्रमुख कानूनी टिप्पणियां
अदालत ने ‘साझा हित’ बनाम ‘व्यक्तिगत हित’ के कानूनी परीक्षण (Test of Common Interest vs. Individual Interest) को रेखांकित करते हुए कहा: “समस्या की कुंजी यह जांचने में है कि याचिका के माध्यम से ‘साझा हित’ (Common Interest) उठाया जा रहा है या ‘व्यक्तिगत हित’ (Individual Interest)। केवल उन्हीं मामलों में एकल सेट कोर्ट फीस स्वीकार की जा सकती है जहां एक साझा वाद-कारण उठाया गया हो, भले ही कई लोग एक याचिका में शामिल हों।”
अदालत ने संयुक्त याचिकाओं के दुरुपयोग और राज्य के राजस्व पर टिप्पणी करते हुए कहा: “मुकदमेबाजों को दी गई सुविधा का दुरुपयोग कोर्ट फीस के भुगतान से बचने के लिए नहीं किया जा सकता। लागत, स्थान और कागज बचाने के लिए कई व्यक्तियों को एक ही याचिका में शामिल होने की अनुमति देकर उच्च न्यायालय राज्य के खजाने को कोर्ट फीस का नुकसान नहीं पहुंचा सकता।”
किन मामलों में अलग-अलग कोर्ट फीस लगेगी?
अदालत ने स्पष्ट किया कि जब किसी फैसले का लाभ प्रत्येक याचिकाकर्ता को व्यक्तिगत रूप से मिलता है, तो प्रत्येक याचिकाकर्ता को अलग से कोर्ट फीस देनी होगी। उदाहरण के लिए:
- सेवा नियमितीकरण (Service Regularisation) से जुड़े मामले
- पेंशन और परिलाभों के दावे (Pension Claims)
- भर्ती और चयन प्रक्रिया (Recruitment Challenges) से जुड़ी व्यक्तिगत आपत्तियां
याचिकाकर्ता की दलीलें
यह मामला अधिवक्ता सत्यम सुराणा द्वारा दायर एक आवेदन से संबंधित था, जिसमें उन्होंने मांग की थी कि ‘महाराष्ट्र कोर्ट फीस अधिनियम, 1959’ के तहत कोर्ट फीस को ‘प्रति याचिकाकर्ता’ के बजाय ‘प्रति याचिका’ लगाया जाना चाहिए:
- अधिनियम में शब्द लोप (Omission): याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि कानून में उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत आवेदन या याचिका के लिए एक निश्चित शुल्क तय किया गया है और इसमें ‘प्रति याचिकाकर्ता’ वाक्यांश को जानबूझकर नहीं जोड़ा गया है।
- मुकदमेबाजों पर वित्तीय बोझ: उन्होंने दलील दी कि प्रत्येक याचिकाकर्ता से अलग-अलग फीस वसूलने से वादकारियों को अनावश्यक वित्तीय नुकसान होता है।
अंतिम विधिक व्यवस्था
बॉम्बे उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता की दलीलों को खारिज करते हुए कानूनी स्थिति स्पष्ट की:
- संविधान के अनुच्छेद 226 या 227 के तहत दायर संयुक्त याचिका में यदि व्यक्तिगत वाद-कारण शामिल हैं, तो अलग-अलग कोर्ट फीस देय होगी।
- संयुक्त याचिकाएं केवल प्रक्रियात्मक सुविधा (Procedural Convenience) के लिए स्वीकार की जाती हैं, लेकिन इस रियायत का उपयोग राज्य के वैधानिक राजस्व को कम करने के लिए नहीं किया जा सकता।
एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)
| विवरण | जानकारी |
| केस शीर्षक | सत्यम सुराणा बनाम बॉम्बे हाईकोर्ट (Satyam Surana v. Bombay High Court) |
| संबंधित अदालत | बॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति संदीप वी. मार्ने (Justice Sandeep V. Marne) |
| मुख्य मुद्दा | संयुक्त रिट याचिका में कोर्ट फीस का निर्धारण (Per Petition vs Per Petitioner) |
| अदालत का निर्णय | व्यक्तिगत हित/कारण होने पर हर याचिकाकर्ता को अलग से कोर्ट फीस देनी होगी। |

