ITAT चंडीगढ़ पीठ के मुख्य निष्कर्ष
- गीता एक सार्वभौमिक दार्शनिक ग्रंथ: ट्रिब्यूनल ने माना कि भागवत गीता केवल पूजा-पाठ या कर्मकांड का ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह कर्तव्य, नीतिशास्त्र, शासन और मानव आचरण का एक महान दार्शनिक ग्रंथ है। इसके कर्मयोग, ज्ञानयोग और ध्यानयोग के सिद्धांत हर धर्म, जाति या राष्ट्रीयता से परे लागू होते हैं।
- स्वतंत्रता संग्राम का प्रेरणा स्रोत: पीठ ने उल्लेख किया कि लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी और आचार्य विनोबा भावे जैसे स्वतंत्रता सेनानियों ने भी गीता से प्रेरणा ली और इस पर पुस्तकें लिखीं।
- गौसेवा संवैधानिक उद्देश्य (Article 48 & 51A(g)): ट्रिब्यूनल ने कहा कि आवारा पशुओं की सुरक्षा और गौशालाओं का संचालन संविधान के अनुच्छेद 48 और 51A(g) के तहत आता है। केवल इसलिए कि किसी धार्मिक परंपरा में गाय को पूजनीय माना जाता है, गौसेवा को ‘धार्मिक गतिविधि’ करार नहीं दिया जा सकता।
- धारा 80G(5B) का उल्लंघन नहीं: आयकर विभाग यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा कि धार्मिक गतिविधियों पर ट्रस्ट का खर्च कानूनी सीमा (Statutory Limit) से अधिक था।
चंडीगढ़: आयकर अपीलीय अधिकरण (ITAT), चंडीगढ़ की पीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में व्यवस्था दी है कि श्रीमद्भगवद्गीता के दार्शनिक और नैतिक उपदेशों का प्रचार-प्रसार करना किसी धर्म विशेष का प्रचार या किसी विशिष्ट धार्मिक संप्रदाय को बढ़ावा देना नहीं माना जा सकता।
न्यायिक सदस्य ललित कुमार और लेखाकार सदस्य मनोज कुमार अग्रवाल की पीठ ने ‘वर्ल्ड संकीर्तन टूर ट्रस्ट’ (World Sankirtan Tour Trust) की अपील स्वीकार करते हुए आयकर आयुक्त (छूट) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसने गीता के प्रवचनों के प्रसारण के आधार पर ट्रस्ट को ‘धार्मिक संस्था’ वर्गीकृत कर धारा 80G के तहत टैक्स छूट देने से इनकार कर दिया था।
अधिकरण (ITAT) की प्रमुख टिप्पणियां
भगवद्गीता के सार्वभौमिक और दार्शनिक महत्व पर अधिकरण ने कहा: “श्रीमद्भगवद्गीता को नीतिशास्त्र, कर्तव्य, शासन और मानव आचरण पर दुनिया के महानतम दार्शनिक ग्रंथों में से एक माना जाता है। इसके 18 अध्याय कर्मयोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग, सन्यास, आत्म-अनुशासन, अनासक्ति, समभाव और सदाचार के माध्यम से आत्म-साक्षात्कार के सिद्धांतों को स्पष्ट करते हैं। गीता का मुख्य विषय कोई कर्मकांडीय पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि नैतिक जीवन, निस्वार्थ कर्म और नैतिक दायित्व है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भी गीता प्रेरणा का स्रोत रही और लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी तथा आचार्य विनोबा भावे ने इस पर पुस्तकें लिखकर इसे स्वतंत्रता आंदोलन का मार्गदर्शक बल माना था।”
सार्वभौमिक स्वीकार्यता को रेखांकित करते हुए पीठ ने जोड़ा: “ये शिक्षाएं सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत हैं जो धर्म, जाति या राष्ट्रीयता से परे सभी पर लागू होती हैं। दर्शनशास्त्र, नेतृत्व, प्रबंधन, मनोविज्ञान और लोक प्रशासन के क्षेत्रों में विश्वभर में इनका व्यापक अध्ययन किया जाता है। इस प्रकार के सार्वभौमिक रूप से स्वीकृत नैतिक दर्शन का प्रसार करना अपने आप में धर्म का प्रचार या किसी विशेष धार्मिक संप्रदाय को आगे बढ़ाना नहीं कहला सकता।”
गौशाला संचालन और संवैधानिक लक्ष्य
अधिकरण ने ट्रस्ट द्वारा संचालित गौशालाओं और लावारिस पशुओं की देखभाल पर टिप्पणी की:
- संवैधानिक कर्तव्यों की पूर्ति: गायों की रक्षा, गौशालाओं का रखरखाव और चिकित्सा सहायता प्रदान करना संविधान के अनुच्छेद 48 (राज्य के नीति निदेशक तत्व) और अनुच्छेद 51A(g) (मौलिक कर्तव्य) के उद्देश्यों को आगे बढ़ाता है।
- केवल श्रद्धा के कारण ‘धार्मिक’ नहीं: चूंकि किसी परंपरा में गाय पूजनीय है, केवल इस आधार पर पशु संरक्षण और गौशाला की वास्तविक धर्मार्थ गतिविधि को ‘धार्मिक गतिविधि’ में तब्दील नहीं किया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि और आयकर विभाग का रुख
- ट्रस्ट का उद्देश्य: ट्रस्ट का गठन लावारिस गोवंश के संरक्षण, गौशाला प्रबंधन, चिकित्सा सहायता और सामाजिक व राष्ट्रीय मूल्यों को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रमों के लिए किया गया था।
- आयकर विभाग की आपत्ति: आयकर आयुक्त (छूट) ने गतिविधियों को वास्तविक मानते हुए धारा 12AB में पंजीकरण तो दिया, लेकिन ट्रस्ट को “धार्मिक संस्था” (Religious Entity) के रूप में वर्गीकृत कर दिया। इसके बाद गीता के प्रवचनों के प्रसारण और ट्रस्ट डीड में मंदिरों के जीर्णोद्धार के एक अप्रयुक्त खंड का हवाला देकर धारा 80G के तहत कर छूट की मंजूरी खारिज कर दी।
- ट्रस्ट का पक्ष: ट्रस्ट ने वचनपत्र दिया कि मंदिर जीर्णोद्धार वाले खंड पर कभी कोई काम नहीं किया गया और न ही भविष्य में किया जाएगा। साथ ही, धारा 80G(5B) के तहत यदि कोई धार्मिक व्यय माना भी जाए, तो वह वैधानिक सीमा (कुल आय के 5%) से काफी कम था।
- इनकम टैक्स कमिश्नर का फैसला: आयकर आयुक्त (छूट) [CIT Exemptions] ने ट्रस्ट की गतिविधियों जैसे—बेसहारा मवेशियों की रक्षा, गौशालाओं का रखरखाव और पशु चिकित्सा सेवाओं को स्वीकार किया था। लेकिन, ट्रस्ट द्वारा भागवत गीता पर प्रवचनों के आयोजन और प्रसारण के कारण उसे “धार्मिक इकाई” की श्रेणी में डाल दिया और धारा 80G की मंजूरी खारिज कर दी।
- ट्रस्ट का पक्ष: ट्रस्ट ने तर्क दिया कि उसकी मुख्य गतिविधियां पूरी तरह से धर्मार्थ हैं। ट्रस्ट डीड में मंदिरों के जीर्णोद्धार का एक पुराना खंड था, जिस पर कभी अमल नहीं किया गया और ट्रस्ट ने आगे भी ऐसा न करने का वचन दिया। गीता के उपदेश सार्वभौमिक नैतिक मूल्य हैं। यदि कोई गतिविधि धार्मिक मानी भी जाए, तो भी उसका खर्च धारा 80G(5B) की वैधानिक सीमा से नीचे था।
ITAT द्वारा दिए गए मुख्य आधार
- प्रमुख उद्देश्यों और वास्तविक गतिविधियों से पहचान: किसी संस्था का चरित्र उसके वास्तविक कार्यों और प्रमुख उद्देश्यों से तय होता है, न कि ट्रस्ट डीड के किसी अप्रयुक्त खंड से।
- धारा 80G(5B) की सुरक्षा: आयुक्त ने इस वैधानिक प्रावधान की अनदेखी की, जो धार्मिक व्यय के निर्धारित सीमा के भीतर रहने पर भी 80G की मंजूरी की अनुमति देता है। विभाग यह साबित करने में विफल रहा कि ट्रस्ट का खर्च सीमा से अधिक था।
अंतिम आदेश
आईटीएटी चंडीगढ़ ने ट्रस्ट के पंजीकरण में संशोधन करते हुए आयकर आयुक्त (छूट) को निर्देश दिया:
- ट्रस्ट को ‘धार्मिक’ के बजाय ‘धर्मार्थ संस्था’ (Charitable Institution) के रूप में मान्यता देते हुए धारा 12AB के तहत नया पंजीकरण प्रमाण पत्र जारी किया जाए।
- ट्रस्ट को आयकर अधिनियम की धारा 80G के तहत आवश्यक मंजूरी/प्रमाण पत्र प्रदान किया जाए।
ITAT चंडीगढ़ पीठ की टिप्पणी
न्यायाधिकरण के सदस्य ललित कुमार और मनोज कुमार अग्रवाल की पीठ ने निर्णय सुनाते हुए कहा: “भागवत गीता के उपदेश सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत हैं जो धर्म, जाति या राष्ट्रीयता से परे लागू होते हैं। दर्शन, नेतृत्व, मनोविज्ञान और लोक प्रशासन के क्षेत्रों में दुनिया भर में इनका व्यापक अध्ययन किया जाता है। ऐसे सार्वभौमिक रूप से स्वीकृत नैतिक दर्शन का प्रसार करना अपने आप में धर्म का प्रचार करना या किसी विशेष धार्मिक संप्रदाय को बढ़ावा देना नहीं माना जा सकता।”
Bhagavad Gita: एट ए ग्लान्स (At a Glance of Order)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित ट्रिब्यूनल | आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण, चंडीगढ़ पीठ (ITAT Chandigarh) |
| पीठासीन सदस्य | ललित कुमार (न्यायिक सदस्य) एवं मनोज कुमार अग्रवाल (लेखाकार सदस्य) |
| करदाता संस्था | वर्ल्ड संकीर्तन टूर ट्रस्ट (World Sankirtan Tour Trust) |
| संबंधित धाराएं | आयकर अधिनियम की धारा 12AB, 80G एवं 80G(5B) |
| मुख्य विवाद | क्या गीता के उपदेशों का प्रसारण ट्रस्ट को ‘धार्मिक संस्था’ बनाता है? |
| ट्रिब्यूनल का फैसला | नहीं; ट्रस्ट को ‘धर्मार्थ संस्था’ का नया 12AB प्रमाणपत्र और 80G की मंजूरी देने का आदेश। |

