मुख्य बिंदु (Key Indicators)
- विवाद की पृष्ठभूमि: लुधियाना की कंपनी प्रेन्डा क्रिएशंस ने नवंबर 2024 में सुपारी का आयात किया और उसे ‘भुनी हुई सुपारी’ घोषित किया। हालांकि, कस्टम्स अधिकारियों का दावा था कि यह ‘सूखी सुपारी’ है। इस मतभेद के कारण माल 2024 से ही कस्टम्स वेयरहाउस (गोदाम) में अटका हुआ था।
- अधूरी लैब रिपोर्ट पर फटकार: कोर्ट ने पाया कि सेंट्रल रेवेन्यू कंट्रोल लैबोरेटरी (CRCL) की जिस रिपोर्ट के आधार पर कस्टम्स ने माल रोका था, वह केवल उत्पाद के ‘शारीरिक रूप’ (Physical Appearance) पर आधारित थी, किसी वैज्ञानिक पैरामीटर (Scientific Parameter) पर नहीं।
- निजी लैब रिपोर्ट और अन्य खेप का हवाला: कंपनी ने तर्क दिया कि निजी लैब रिपोर्ट से पुष्टि हुई है कि सुपारी भुनी हुई थी और नमी का स्तर (Moisture content) 7% से कम था। ऐसी ही चार अन्य समान खेपों को कस्टम्स पहले ही पर्सनल बॉन्ड पर रिहा कर चुका था।
- बैंक गारंटी की मांग अनुचित: हाईकोर्ट ने कहा कि केवल शारीरिक रूप की अधूरी रिपोर्ट के आधार पर आयातित माल को सालों तक रोके रखना या व्यापारी पर बैंक गारंटी (Bank Guarantee) का बोझ डालना सही नहीं है।
चंडीगढ़: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सीमा शुल्क (कस्टम्स) विभाग को एक भारतीय आयातक कंपनी द्वारा वर्ष 2024 में आयात की गई सुपारी (Areca Nuts/Betel Nuts) की खेप को तुरंत रिलीज करने का निर्देश दिया है [प्रेंडा क्रिएशंस प्राइवेट लिमिटेड, लुधियाना बनाम भारत संघ व अन्य]।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश अश्विनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति रोहित कपूर की खंडपीठ ने आयातक कंपनी द्वारा पर्सनल बॉन्ड (Personal Bond) प्रस्तुत करने पर माल को छोड़ने का आदेश दिया। यह पूरा विवाद इस बात पर केंद्रित था कि आयातित सुपारी ‘रोस्टेड’ (भुनी हुई) है या ‘ड्राइड’ (सूखी), क्योंकि दोनों श्रेणियों पर सीमा शुल्क की दरें भिन्न हैं। इस वर्गीकरण विवाद के चलते खेप नवंबर 2024 से सीमा शुल्क विभाग के गोदाम में फंसी हुई थी।
उच्च न्यायालय की मुख्य टिप्पणियां
अदालत ने सेंट्रल रेवेन्यू कंट्रोल लेबोरेटरी (CRCL) की रिपोर्ट में वैज्ञानिक आधार की कमी पर सवाल उठाते हुए कहा: “जब केंद्रीय राजस्व नियंत्रण प्रयोगशाला की रिपोर्ट का निष्कर्ष केवल उत्पाद के भौतिक स्वरूप (Physical Appearance) पर आधारित है, न कि किसी अन्य वैज्ञानिक मानक पर, तो ऐसी परिस्थितियों में प्रतिवादियों को वर्षों तक माल को रोके रखने या याचिकाकर्ता से केवल बैंक गारंटी पर माल छोड़ने की मांग करने की अनुमति देना उचित नहीं होगा।”
मामले की पृष्ठभूमि और आयातक की दलीलें
- वर्गीकरण विवाद: लुधियाना की ‘प्रेंडा क्रिएशंस प्राइवेट लिमिटेड’ ने सुपारी को ‘रोस्टेड नट्स’ घोषित किया था, जबकि कस्टम विभाग ने इसे ‘ड्राइड नट्स’ बताते हुए अलग शुल्क दर की मांग की और खेप रोक ली।
- वैज्ञानिक आधार का अभाव: आयातक ने दलील दी कि विभाग की परीक्षण रिपोर्ट केवल भौतिक दिखावे पर आधारित थी, जो वर्षों तक माल रोकने का वैध आधार नहीं हो सकती। साथ ही नियमों के तहत 5 दिनों के भीतर सैंपल रिपोर्ट देने के बजाय इसे करीब एक महीने बाद दिया गया।
- निजी लैब रिपोर्ट और पूर्व खेप: प्राइवेट लैब परीक्षणों में माल के ‘रोस्टेड सुपारी’ होने की पुष्टि हुई थी। इसके अलावा, पहले भी चार समान खेपों को पर्सनल बॉन्ड पर छोड़ा गया था क्योंकि उनका मॉइस्चर कंटेंट (Moisture Content) निर्णायक स्तर यानी 7% से कम पाया गया था।
हाईकोर्ट के निर्देश
- पर्सनल बॉन्ड पर रिहाई: अदालत ने निर्देश दिया कि मानव उपभोग के लिए उपयुक्त पाई गई खेप की वास्तविक डिलीवरी (Physical Delivery) पर्सनल बॉन्ड जमा करने पर दो सप्ताह (Fortnight) के भीतर सुनिश्चित की जाए।
- आठ महीने से रोकी गई दो खेपों की रिहाई: उन दो खेपों को भी तुरंत छोड़ने का आदेश दिया गया जिन्हें खुद अधिकारियों ने रोस्टेड पाया था, लेकिन फिर भी आठ महीने से रोक कर रखा था।
- शुल्क निर्धारण की कार्यवाही जारी रहेगी: अदालत ने स्पष्ट किया कि माल की रिहाई कस्टम ड्यूटी निर्धारण के लिए शुरू की गई प्रशासनिक कार्यवाही के अधीन रहेगी। आयातक कंपनी 4 सप्ताह के भीतर कारण बताओ नोटिस का जवाब देगी।
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का निर्देश
उच्च न्यायालय की पीठ ने माल रिहा करने का आदेश देते हुए कहा: “जब सेंट्रल रेवेन्यू कंट्रोल लैबोरेटरी ने अपना निष्कर्ष केवल शारीरिक बनावट पर आधारित किया है न कि किसी वैज्ञानिक मापदंड पर, तो उत्तरदाताओं (कस्टम्स) को वर्षों तक माल की रिहाई रोकने या याचिकाकर्ता से केवल बैंक गारंटी पर माल छोड़ने के लिए कहना उचित नहीं होगा।” कोर्ट ने निर्देश दिया कि जो माल उपभोग के लिए योग्य (Fit for consumption) पाया गया है, उसकी भौतिक डिलीवरी 15 दिनों (दो हफ्तों) के भीतर सुनिश्चित की जाए। हालांकि, कस्टम्स शुल्क के अंतिम निर्धारण के लिए विभाग की कार्यवाही जारी रहेगी।
Roasted Or Dryed?: एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)
| विवरण | जानकारी |
| केस शीर्षक | प्रेन्डा क्रिएशंस प्राइवेट लिमिटेड लुधियाना बनाम भारत संघ व अन्य (Prenda Creations Pvt. Ltd. v. Union of India & Ors.) |
| संबंधित अदालत | पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय (Punjab and Haryana High Court) |
| पीठासीन पीठ | कार्यवाहक CJ अश्वनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति रोहित कपूर |
| मुख्य विवाद | सुपारी का वर्गीकरण: ‘भुनी हुई’ (कम शुल्क) बनाम ‘सूखी’ (अधिक शुल्क) |
| अदालत का निर्णय | पर्सनल बॉन्ड पर 2 हफ्ते के भीतर माल रिहा करने का आदेश; अंतिम शुल्क जांच के अधीन रहेगा। |

