मुख्य बिंदु (Key Highlights)
- स्वेच्छा से जिम्मेदारी स्वीकार करना: हाईकोर्ट ने माना कि 2013 में शादी के समय पति को पूरी जानकारी थी कि महिला का पहली शादी से एक बेटा (जन्म 2007) है। जब उसने बच्चे को वैवाहिक परिवार के हिस्से के रूप में स्वीकार किया था, तो वह बाद में इस जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकता।
- पूर्व पति के साथ समझौते का असर नहीं: पति की ओर से दलील दी गई थी कि पत्नी को पूर्व पति से तलाक के समय स्त्रीधन और बच्चे के भरण-पोषण के लिए ₹5 लाख मिले थे। कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि पूर्व पति से हुआ कोई भी समझौता सौतेले पिता के उस कानूनी और नैतिक दायित्व को खत्म नहीं करता, जो उसने शादी के बाद स्वतः स्वीकार किया था।
- कमाऊ पत्नी का तर्क खारिज: पति का तर्क था कि पत्नी खुद ₹55,000 से ₹58,000 प्रति माह कमाती है, इसलिए वह बच्चों का खर्च उठा सकती है। कोर्ट ने पति की कुल आय (लगभग ₹2 लाख) और वित्तीय क्षमता को देखते हुए गुजारा भत्ता बढ़ाने का आदेश दिया।
नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने भरण-पोषण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में व्यवस्था दी है कि यदि किसी व्यक्ति ने पूर्व विवाह से जन्मे बच्चे की जानकारी होते हुए शादी की और उसे वैवाहिक परिवार के हिस्से के रूप में स्वीकार किया, तो वह बाद में ‘बायोलॉजिकल’ (जैविक) पिता न होने की दलील देकर उसकी देखभाल की जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता।
न्यायमूर्ति आलोक महरा की एकल पीठ ने फैमिली कोर्ट के जनवरी 2022 के उस आदेश को संशोधित कर दिया, जिसने सौतेले बेटे के भरण-पोषण के दावे को केवल इसलिए खारिज कर दिया था क्योंकि पति उसका जैविक पिता नहीं था। उच्च न्यायालय ने बेटे को ₹10,000 प्रति माह भरण-पोषण देने का आदेश दिया और साथ ही पत्नी व नाबालिग बेटी के भरण-पोषण की राशि में भी बढ़ोतरी की।
उच्च न्यायालय की प्रमुख कानूनी टिप्पणियां
अदालत ने पति की नैतिक और विधिक जिम्मेदारी को रेखांकित करते हुए 20 अगस्त के अपने आदेश में कहा: “एक बार जब प्रतिवादी (पति) ने बच्चे के अस्तित्व की पूरी जानकारी होने के बावजूद महिला से विवाह किया और बच्चे को वैवाहिक परिवार के हिस्से के रूप में स्वीकार किया, तो वह बाद में उस जिम्मेदारी से नहीं बच सकता जिसे उसने स्वेच्छा से स्वीकार किया था। यह बाद की दलील कि बच्चा उसका जैविक बेटा नहीं है, अपने आप में उसके भरण-पोषण की जिम्मेदारी से पूरी तरह मुकरने का औचित्य नहीं हो सकती।”
पूर्व पति के साथ हुए समझौते पर पीठ ने स्पष्ट किया: “पत्नी और उसके पूर्व पति के बीच हुए किसी भी समझौते के आधार पर बाद के वैवाहिक रिश्ते से उत्पन्न अधिकारों और दायित्वों को समाप्त नहीं किया जा सकता, जिसे पति ने पूरी जानकारी के साथ स्वेच्छा से ग्रहण किया था।”
मामले की पृष्ठभूमि और दोनों पक्षों की दलीलें
- 2013 में विवाह: दंपत्ति का विवाह 2013 में हुआ था। पति को पहले से ज्ञात था कि महिला का पूर्व विवाह से एक बेटा (जन्म 2007) है। शादी के बाद दोनों की एक बेटी भी हुई।
- पत्नी की दलील: पत्नी के वकील अक्षय प्रधान ने तर्क दिया कि पति ने बच्चे को परिवार के सदस्य के रूप में स्वीकार किया था। नवंबर 2025 में पति का सकल वेतन (Gross Salary) ₹2 लाख और कटौतियों के बाद शुद्ध वेतन (Net Salary) ₹1.06 लाख प्रति माह था। ऐसे में जैविक पिता न होने के आधार पर भरण-पोषण से इनकार नहीं किया जा सकता।
- पति का पक्ष: पति की वकील प्रभा नैथानी ने दावा किया कि महिला को पहले पति से तलाक के समय ₹5 लाख की एकमुश्त राशि मिली थी। इसके अलावा, पत्नी खुद ₹55,000 से ₹58,000 प्रति माह कमा रही है और पति के ही फ्लैट में रह रही है, इसलिए वह बच्चों का खर्च उठाने में सक्षम है।
हाईकोर्ट का निष्कर्ष और भरण-पोषण में संशोधन
उच्च न्यायालय ने पति के वित्तीय हलफनामों का विश्लेषण करने के बाद पाया कि उसके पास ऐसी कोई बड़ी देनदारी नहीं है जो भरण-पोषण देने की क्षमता को प्रभावित करती हो। तदनुसार, अदालत ने फैमिली कोर्ट के आदेश में संशोधन करते हुए आदेश दिया:
- सौतेले बेटे के लिए: बेटे को आवेदन दाखिल करने की तिथि से बालिग (Majority) होने तक ₹10,000 प्रति माह भरण-पोषण दिया जाए।
- पत्नी के लिए: पत्नी का भरण-पोषण ₹8,000 से बढ़ाकर ₹10,000 प्रति माह किया गया।
- नाबालिग बेटी के लिए: बेटी का भरण-पोषण ₹6,000 से बढ़ाकर ₹30,000 प्रति माह किया गया।
उत्तराखंड हाईकोर्ट की टिप्पणी
न्यायमूर्ति आलोक मेहरा ने 20 अगस्त के अपने आदेश में कहा: “एक बार जब प्रतिवादी ने बच्चे की मौजूदगी की पूरी जानकारी होते हुए शादी की और बच्चे को वैवाहिक परिवार के हिस्से के रूप में स्वीकार किया, तो वह बाद में अपनी स्वेच्छा से उठाई गई जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। यह दलील कि बच्चा उसका जैविक पुत्र नहीं है, अपने आप में भरण-पोषण की जिम्मेदारी से पूरी तरह इंकार करने का औचित्य नहीं बन सकती।”
Maintenance To Stepson: एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | उत्तराखंड उच्च न्यायालय (Uttarakhand High Court) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति आलोक मेहरा (Justice Alok Mahra) |
| विवाद का मुख्य आधार | क्या पहले पति से जन्मे बेटे को सौतेला पिता गुजारा भत्ता देने के लिए बाध्य है? |
| पति की वित्तीय स्थिति | सकल वेतन ₹2 लाख / कटौती के बाद ₹1.06 लाख प्रति माह |
| संशोधित गुजारा भत्ता | पत्नी: ₹10,000 |

