सिक्किम हाईकोर्ट के मुख्य कानूनी निष्कर्ष
- कानून की नजर में नाबालिग की सहमति अमान्य: अदालत ने दोहराया कि POCSO कानून के तहत 18 वर्ष से कम उम्र का व्यक्ति बच्चा माना जाता है, और कानून की नजर में नाबालिग द्वारा दी गई सहमति का कोई कानूनी वजूद (Consent is no consent) नहीं होता।
- BNSS धारा 528 का सीमित दायरा: अदालत ने माना कि भले ही पीड़िता अब बालिग हो चुकी हो और दोनों पक्ष सुलह करना चाहते हों, फिर भी संविधान के अनुच्छेद 226 या BNSS की धारा 528 (पुराने CrPC की धारा 482) के तहत गंभीर यौन अपराधों में केस रद्द करने का अधिकार क्षेत्र लागू नहीं होता।
- सुप्रीम कोर्ट के नज़ीर का हवाला: हाईकोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के ‘Re: Right to Privacy of Adolescents’ फैसले का हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि जघन्य अपराधों और POCSO के मामलों में केवल समझौते के आधार पर अभियोजन खत्म नहीं किया जा सकता।
गंगटोक: सिक्किम हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि ‘यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012’ (POCSO Act) के तहत दर्ज गंभीर यौन उत्पीड़न (Aggravated Sexual Assault) और बलात्कार के मामलों को केवल इसलिए रद्द नहीं किया जा सकता क्योंकि आरोपी और पीड़िता (या उनके परिवारों) के बीच समझौता (Settlement/Compromise) हो गया है।
न्यायमूर्ति भास्कर राज प्रधान की एकल पीठ ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 [पूर्ववर्ती CrPC धारा 482] के तहत दायर याचिका को खारिज करते हुए कहा कि POCSO कानून के तहत 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चे की सहमति कानून की नजर में कोई सहमति नहीं है, इसलिए समझौते के आधार पर आपराधिक मुकदमे को समाप्त नहीं किया जा सकता [निहाल तमांग एवं अन्य बनाम सिक्किम राज्य एवं अन्य]।
उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां
1. BNSS धारा 528 / CrPC धारा 482 की अंतर्निहित शक्तियों की सीमाएं अदालत ने गंभीर प्रकृति के यौन अपराधों में समझौते के आधार पर केस रद्द करने पर रोक लगाते हुए कहा:
- POCSO अधिनियम की धारा 5(j)(ii)/6 और आईपीसी की धारा 376 के तहत आने वाले जघन्य अपराध समाज के खिलाफ माने जाते हैं।
- हाईकोर्ट अपनी अंतर्निहित शक्तियों (Inherent Powers) का प्रयोग ऐसे मामलों में अभियोजन को खत्म करने के लिए नहीं कर सकता, भले ही पीड़िता बालिग होने के बाद खुद समझौते के पक्ष में खड़ी हो।
2. नाबालिग की सहमति का विधिक प्रभाव शून्य सर्वोच्च न्यायालय के फैसले (Re: Right to Privacy of Adolescents) पर भरोसा करते हुए पीठ ने रेखांकित किया: “भले ही आरोपी और पीड़िता—जो अब बालिग हो चुकी है—आपसी समझौते के साथ सामने आएं, फिर भी उच्च न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 226 या CrPC की धारा 482 / BNSS की धारा 528 के तहत अभियोजन को रद्द नहीं कर सकता। POCSO अधिनियम के तहत 18 वर्ष से कम आयु का व्यक्ति बच्चा है, और कानून में बच्चे की सहमति कोई विधिक सहमति नहीं मानी जाती।”
3. माता-पिता के बीच हुआ समझौता विधिक रूप से मान्य नहीं अदालत ने पाया कि मूल समझौता पत्र (Compromise Deed) पीड़िता और आरोपी के माता-पिता के बीच निष्पादित किया गया था। हालांकि बाद में बालिग होने पर पीड़िता ने भी याचिका में शामिल होकर हलफनामा दिया, लेकिन कानूनन ऐसे जघन्य अपराधों को निजी सुलह के जरिए खत्म करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
मामले की पृष्ठभूमि (गंगटोक सदर थाना विवाद)
- घटना और प्राथमिकी (2022-2023): नवंबर 2022 में कथित घटना के समय पीड़िता की आयु लगभग 17 वर्ष (नाबालिग) थी, जबकि आरोपी लगभग 19 वर्ष का था। गंगटोक के सदर पुलिस स्टेशन में FIR No. 113/2023 दर्ज की गई थी।
- लागू धाराएं: मामला आईपीसी की धारा 376 (बलात्कार) तथा पॉक्सो अधिनियम की धारा 5(j)(ii) और धारा 6 (गंभीर प्रवेशन लैंगिक हमला) के तहत दर्ज किया गया था, जिसका ट्रायल विशेष न्यायाधीश (POCSO), गंगटोक के समक्ष लंबित है।
- पारिवारिक समझौता और हाईकोर्ट में याचिका: दोनों पक्षों के परिवारों ने आपसी सहमति से एक समझौता पत्र तैयार किया। पीड़िता के 18 वर्ष (वयस्क) होने के बाद आरोपी, उसके माता-पिता और पीड़िता ने संयुक्त रूप से हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाकर एफआईआर और स्पेशल कोर्ट की ट्रायल कार्यवाही को रद्द करने की मांग की थी।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
- क्वैशिंग याचिका खारिज: हाईकोर्ट ने BNSS की धारा 528 के तहत राहत देने से इनकार करते हुए एफआईआर और ट्रायल रद्द करने की याचिका को खारिज कर दिया।
- स्पेशल POCSO कोर्ट को सूचना: आदेश की प्रति विशेष अदालत (POCSO), गंगटोक को भेजने का निर्देश दिया गया ताकि कानून के अनुसार ट्रायल जारी रह सके।
- सुप्रीम कोर्ट जाने की छूट: अदालत ने टिप्पणी की कि यदि पक्षकार चाहें तो वे संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत असाधारण शक्तियों के उपयोग हेतु उच्चतम न्यायालय का रुख कर सकते हैं।
मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | सिक्किम उच्च न्यायालय (Sikkim High Court) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति भास्कर राज प्रधान (Justice Bhaskar Raj Pradhan) |
| मुख्य धाराएं | POCSO एक्ट की धारा 5(j)(ii) व 6 और IPC की धारा 376 |
| कानूनी मुद्दा | क्या पीड़िता के वयस्क होने और पक्षों में समझौता होने पर POCSO केस रद्द हो सकता है? |
| हाईकोर्ट का रुख | ना (Negative)। याचिका खारिज की गई; केस का ट्रायल जारी रहेगा। |

