सुप्रीम कोर्ट के मुख्य कानूनी निष्कर्ष
- आयोग (Commission) और अदालत (Court) के दो अलग तंत्र:पीठ ने स्पष्ट किया कि 1993 का अधिनियम मानवाधिकारों की सुरक्षा के लिए दो अलग-अलग संस्थागत व्यवस्थाएं प्रदान करता है:
- मानवाधिकार आयोग (धारा 12-18): इसका कार्य जांच करना (Inquisitorial) और सिफारिशें (Recommendatory) देना है।
- मानव अधिकार अदालत (धारा 30): यह सीधे न्यायिक शक्ति (Judicial Power) का प्रयोग करती है।
- आयोग की सिफारिश अनिवार्य शर्त नहीं:अदालत ने कहा कि 1993 अधिनियम में ऐसा कहीं नहीं लिखा है कि मुकदमा चलाने के लिए मानवाधिकार आयोग की पूर्व सिफारिश जरूरी है। आयोग की जांच को कोर्ट जाने के लिए अनिवार्य शर्त मानना कानून में संसद द्वारा न जोड़ी गई शर्त को जबरन शामिल करने जैसा होगा।
- प्रक्रियात्मक नियम (Procedural Rule):नियम 6 कोई नया अपराध नहीं बनाता और न ही कोई नई सजा तय करता है; यह केवल धारा 30 के तहत मानवाधिकार अदालत के अधिकार क्षेत्र का उपयोग करने की प्रक्रियात्मक विधि (Procedural Mechanism) प्रदान करता है।
- दोहरे खतरे (Double Jeopardy) का उल्लंघन नहीं:पीठ ने स्पष्ट किया कि मानवाधिकार आयोग द्वारा की जाने वाली जांच या सिफारिश को ‘अभियोजन या सजा’ नहीं माना जा सकता, इसलिए दो समानांतर रास्ते अपनाने से दोहरे खतरे का सिद्धांत बाधित नहीं होता।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में व्यवस्था दी है कि मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में पीड़ित मानवाधिकार आयोग (Human Rights Commission) के पास जाए बिना भी सीधे मानवाधिकार अदालत (Human Rights Court) का दरवाजा खटखटा सकता है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने कर्नाटक उच्च न्यायालय के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें नियम 6 को असंवैधानिक और मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के मूल ढांचे के विपरीत बताकर पुलिस अधिकारियों के खिलाफ दर्ज आपराधिक शिकायत को रद्द कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस अधिकारियों के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही को पुनर्स्थापित कर दिया है। शीर्ष अदालत ने ‘कर्नाटक राज्य मानवाधिकार न्यायालय नियम, 2006’ के नियम 6 (Rule 6) की संवैधानिक वैधता को पूरी तरह बरकरार रखा है।
सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख विधिक व्याख्या और टिप्पणियां
1. आयोग और मानवाधिकार न्यायालय: दो अलग-अलग संस्थागत तंत्र
1993 के अधिनियम के तहत स्थापित दोहरी व्यवस्था को स्पष्ट करते हुए पीठ ने कहा:
- मानवाधिकार आयोग (धारा 12 से 18): आयोग की भूमिका केवल जांचपरक और अनुशंसात्मक (Inquisitorial & Recommendatory) है।
- मानवाधिकार न्यायालय (धारा 30): यह मानवाधिकार उल्लंघनों के अपराधों में न्यायिक शक्तियों (Judicial Power) का प्रयोग करता है।
- अदालत ने रेखांकित किया
- “1993 के अधिनियम की धारा 12 से 18 में ऐसा कुछ भी नहीं है जो यह अनिवार्य बनाता हो कि मानवाधिकार उल्लंघन से संबंधित हर अभियोजन आयोग की सिफारिश से ही शुरू होना चाहिए। इसी प्रकार, धारा 30 मानवाधिकार न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को आयोग के समक्ष पूर्व कार्यवाही के पूरा होने पर निर्भर नहीं बनाती। कानून में ऐसी शर्त जोड़ना संसद द्वारा न बनाई गई शर्त को थोपने जैसा होगा। आयोग की सिफारिश कोई अनिवार्य पूर्व-शर्त (Mandatory Precondition) नहीं है।”
2. नियम 6 केवल प्रक्रियात्मक ढांचा है, मूल कानून का उल्लंघन नहीं
अदालत ने स्पष्ट किया
- नियम 6 कोई नया अपराध नहीं बनाता, कोई नई सजा निर्धारित नहीं करता और न ही मानवाधिकारों की परिभाषा को बदलता है।
- यह केवल धारा 30 के तहत मानवाधिकार न्यायालय के पहले से मौजूद क्षेत्राधिकार का उपयोग करने के लिए प्रक्रियात्मक तंत्र (Procedural Machinery) प्रदान करता है।
3. राज्य सरकार की नियम बनाने की शक्ति (धारा 41)
पीठ ने ‘सेंट जॉन्स टीचर्स ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट’ मामले की नजीर देते हुए कहा कि अधीनस्थ नियम (Delegated Rules) मूल अधिनियम का स्थान नहीं ले सकते, लेकिन अधिनियम के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए प्रक्रियात्मक व्यवस्था जोड़कर उसे ‘पूरक’ (Supplement) बना सकते हैं। 1993 के अधिनियम की धारा 41(1) के तहत राज्य सरकार को अधिनियम के प्रावधानों को लागू करने के लिए नियम बनाने का व्यापक अधिकार प्राप्त है।
4. दोहरे खतरे (Double Jeopardy) का कोई उल्लंघन नहीं
परमवीर सिंह सैनी बनाम बलजीत सिंह फैसले का संदर्भ देते हुए पीठ ने स्पष्ट किया कि पुलिस हिरासत में बल प्रयोग की शिकायतें राज्य मानवाधिकार आयोग और मानवाधिकार अदालत दोनों के समक्ष की जा सकती हैं। आयोग द्वारा की गई जांच या सिफारिश कोई ‘अभियोजन या सजा’ नहीं है, इसलिए समानांतर कानूनी रास्ते दोहरे खतरे के नियम का उल्लंघन नहीं करते।
कर्नाटक नियम 6 क्या प्रावधान करता है?
कर्नाटक राज्य मानवाधिकार न्यायालय नियम, 2006 का नियम 6 मानवाधिकार अदालत में शिकायत दर्ज कराने की विस्तृत प्रक्रिया निर्धारित करता है:
- शिकायत का अधिकार: मानवाधिकार उल्लंघन का शिकार कोई भी पीड़ित, उसका कानूनी प्रतिनिधि, पंजीकृत गैर-सरकारी संगठन (NGO) या कोई आम नागरिक उस लोक सेवक के खिलाफ सीधे अदालत में शिकायत दाखिल कर सकता है जिसने अपने पद का दुरुपयोग कर अपराध किया हो या उकसाया हो।
- जांच और संज्ञान: अदालत शिकायत मिलने पर पुलिस अधीक्षक (SP) स्तर के अधिकारी से जांच कराने या CrPC / BNSS के तहत निजी शिकायत की तरह पूछताछ करने का आदेश दे सकती है।
- सत्र अदालत की तरह ट्रायल: जांच रिपोर्ट और अभियोजन स्वीकृति (Sanction) पर विचार करने के बाद सत्र न्यायालय (Court of Session) की तरह ट्रायल चलाया जाता है।
मामले की पृष्ठभूमि (विजयपुर हिरासत प्रताड़ना मामला)
- कस्टडी में प्रताड़ना का आरोप: अपीलकर्ता (सैयद आसिफुल्ला) ने विजयपुर (बीजापुर) के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश तथा विशेष न्यायाधीश (मानवाधिकार न्यायालय) के समक्ष शिकायत दर्ज कराई थी कि पुलिस हिरासत के दौरान अधिकारियों द्वारा उनके मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन किया गया।
- SP जांच और FIR: मानवाधिकार अदालत ने मामले को CrPC की धारा 156(3) [अब BNSS धारा 175(3)] के तहत एसपी को जांच के लिए भेजा, जिसके बाद संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ प्राथमिकी (Crime No. 15 of 2024) दर्ज की गई।
- हाईकोर्ट द्वारा नियम 6 को रद्द किया जाना: आरोपी पुलिस अधिकारियों ने हाईकोर्ट में इसे चुनौती दी। कर्नाटक हाईकोर्ट ने माना कि पीड़ित आयोग को दरकिनार कर सीधे कोर्ट नहीं आ सकता और नियम 6 को असंवैधानिक ठहराते हुए पुलिसकर्मियों के खिलाफ केस रद्द कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश
- कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला निरस्त: सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए नियम 6 को पूर्णतः वैध (Intra Vires) घोषित किया।
- पुलिसकर्मियों के खिलाफ केस बहाल: विजयपुर के जालानगर थाने में दर्ज प्राथमिकी और मानवाधिकार अदालत की कार्यवाहियों को बहाल करते हुए निर्देश दिया गया कि मामला कानून के अनुसार आगे बढ़ेगा।
- मेरिट पर कोई टिप्पणी नहीं: अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने मामले के गुणा-अवगुण (Merits) पर कोई राय व्यक्त नहीं की है और सभी कानूनी बचाव ट्रायल कोर्ट के समक्ष उठाने के लिए खुले हैं।
Human Rights Court: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठासीन पीठ | जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता |
| मामला / केस | Sayad Asifulla v. State of Karnataka & Ors. (2026) |
| मुख्य निर्णय | नियम 6 संवैधानिक है; मानवाधिकार आयोग की सिफारिश के बिना भी पीड़ित सीधे स्पेशल मानवाधिकार कोर्ट जा सकते हैं। |
| प्रभाव | कर्नाटक हाईकोर्ट का पिछला आदेश रद्द; आरोपी पुलिस अधिकारियों पर केस की कार्यवाही बहाल। |

