बॉम्बे हाईकोर्ट की तीखी टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने पेटेंट कार्यालय और IIT मुंबई के रवैये पर भारी दुख व्यक्त करते हुए कहा: “यह बेहद दुखद है कि डॉ. पाटिल अमेरिका में एक संरक्षित पेटेंटधारक (Protected Patentee) हैं, लेकिन उनके अपने गृह देश का वैधानिक ढांचा उसी सुरक्षा को प्रदान करने में दुखद परिस्थितियों में उलझा रहा। एक प्रमुख वैज्ञानिक को असाइनमेंट डीड से मिलने वाले अधिकारों के लिए 13 वर्षों की लंबी अवधि तक व्यवस्थित रूप से हताश किया गया।” — न्यायमूर्ति सोमशेखर सुंदरेसन
हाईकोर्ट का अंतिम निर्देश
- IIT मुंबई के अधिकार समाप्त: अदालत ने कहा कि 2017 के समझौते के बाद IITB के पास इस आविष्कार में कोई अधिकार नहीं बचा है। इसलिए पेटेंट प्रक्रिया में IITB की सुनवाई की कोई आवश्यकता नहीं है।
- नए सिरे से सुनवाई: पेटेंट आवेदन को बहाल किया जाता है और डिप्टी कंट्रोलर ऑफ पेटेंट्स को निर्देश दिया जाता है कि वे डॉ. पाटिल को एकमात्र आवेदक मानकर आवेदन पर तेजी से निर्णय लें। यह सुनवाई किसी ऐसे वरिष्ठ अधिकारी द्वारा की जाएगी जिसने पहले इस मामले को न देखा हो।
मुंबई: बॉम्बे हाईकोर्ट ने मानव शरीर के भीतर मेडिकल इम्प्लांट्स को चालू रखने वाली जीवन रक्षक बायोमेडिकल तकनीक (In-Vivo Power Generation) के पेटेंट स्वामित्व को लेकर भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) बॉम्बे और वैज्ञानिक डॉ. तारकेश्वर चंद्रकांत पाटिल के बीच 13 वर्षों से चल रहे कानूनी विवाद का निपटारा कर दिया है।
न्यायमूर्ति सोमशेखर सुंदरेशन की एकल पीठ ने 8 सितंबर 2026 के अपने आदेश में पेटेंट कार्यालय द्वारा पिछले वर्ष खारिज किए गए पेटेंट आवेदन को बहाल (Restore) कर दिया और पेटेंट कार्यालय की 13 साल की लेटलतीफी तथा आईआईटी बॉम्बे के अड़ियल रवैये पर कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने स्पष्ट फैसला सुनाया कि डॉ. पाटिल ही इस आविष्कार के एकमात्र और मूल आविष्कारक व स्वामी हैं। अदालत ने पेटेंट एवं डिजाइन उप-नियंत्रक (Deputy Controller of Patents) को निर्देश दिया कि वे 2013 के पेटेंट आवेदन में डॉ. पाटिल को ही मुख्य आवेदक (Applicant) के रूप में मान्यता दें [तारकेश्वर चंद्रकांत पाटिल बनाम आईआईटी बॉम्बे एवं अन्य]।
उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक व संस्थागत टिप्पणियां
1. भारतीय पेटेंट प्रणाली और संस्थागत सुस्ती पर गहरी चिंता वैज्ञानिक के लंबे संघर्ष पर दुख व्यक्त करते हुए न्यायमूर्ति सोमशेखर सुंदरेशन ने कहा: “यह पूरी तरह स्पष्ट है कि पाटिल ही इस आविष्कार के वास्तविक और मान्यता प्राप्त स्वामी हैं। यह बेहद उल्लेखनीय और दुखद विरोधाभास है कि वे अमेरिका में एक संरक्षित पेटेंट धारक (Protected Patentee in USA) हैं, लेकिन उनके अपने गृह देश (भारत) का वैधानिक ढांचा उन्हें वही कानूनी संरक्षण देने में अत्यंत दुखद परिस्थितियों में उलझा रहा। एक अग्रणी वैज्ञानिक को असाइनमेंट डीड से मिलने वाले उसके वैध अधिकारों से पिछले 13 वर्षों से व्यवस्थित रूप से वंचित और प्रताड़ित (Systematically Frustrated) किया गया।”
2. ‘वर्ल्डवाइड असाइनमेंट डीड’ (Worldwide Assignment Deed) का दायरा
- अदालत ने आईआईटी बॉम्बे के इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया कि जुलाई 2017 में निष्पादित असाइनमेंट डीड केवल संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) के लिए थी, भारत के लिए नहीं।
- हाईकोर्ट ने व्यवस्था दी कि ‘वर्ल्डवाइड’ अनुबंध के तहत आईआईटी बॉम्बे ने इस तकनीक के सभी विशेष बौद्धिक संपदा अधिकार (IP Rights) पूर्ण रूप से डॉ. पाटिल को सौंप दिए थे। इसके बाद आईआईटी बॉम्बे के पास भारत में पेटेंट आवेदन को अपने नाम पर आगे बढ़ाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं बचा था।
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विवाद का तकनीकी और ऐतिहासिक संदर्भ
- आविष्कार का महत्व: विवाद “अपेरेटस एंड मेथड फॉर इन-विवो पावर जनरेशन” (Apparatus and a method for in-vivo power generation) से जुड़ा है। यह एक ऐसी जीवन रक्षक बायोमेडिकल तकनीक है जो मानव शरीर के अंदर लगाए जाने वाले विभिन्न मेडिकल उपकरणों/इम्प्लांट्स को बिना बाहरी बैटरी बदले लगातार ऊर्जा प्रदान करती है।
- 2013 का पेटेंट आवेदन: आईआईटी बॉम्बे ने अगस्त 2013 में इस तकनीक के लिए पेटेंट आवेदन दाखिल किया था, जिसमें डॉ. पाटिल को मुख्य आविष्कारक (Prime Inventor) दर्शाया गया था।
- आंतरिक विवाद और 2017 का असाइनमेंट: पीएचडी गाइड के साथ विवाद उत्पन्न होने पर, मामले को सुलझाने के लिए आईआईटी बॉम्बे ने जुलाई 2017 में एक बाध्यकारी ‘वर्ल्डवाइड असाइनमेंट डीड’ निष्पादित की और सभी अधिकार डॉ. पाटिल को ट्रांसफर कर दिए।
- अमेरिका में 2 पेटेंट मंजूर: इस डीड के आधार पर डॉ. पाटिल को अमेरिका (USPTO) में दो पेटेंट सफलतापूर्वक मिल गए, लेकिन भारत में आईआईटी बॉम्बे ने उनके अधिकारों का विरोध जारी रखा।
- पेटेंट कार्यालय की अस्वीकृति: पिछले साल पेटेंट कंट्रोलर ने इस आधार पर आवेदन खारिज कर दिया था कि आईआईटी बॉम्बे ने डॉ. पाटिल का प्राधिकरण साबित नहीं किया और डॉ. पाटिल के सीधे दावों को भी दरकिनार कर दिया, जिसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा।
बॉम्बे हाईकोर्ट का अंतिम निर्देश
- पेटेंट आवेदन बहाल (Restored): 2013 के पेटेंट आवेदन को तुरंत बहाल करने का आदेश दिया गया।
- डॉ. पाटिल एकमात्र आवेदक: पेटेंट कंट्रोलर को निर्देश दिया गया कि वे डॉ. पाटिल को इस आवेदन के एकमात्र आवेदक के रूप में रिकॉर्ड पर लें और प्रक्रिया को आगे बढ़ाएं।
- आईआईटी बॉम्बे की कोई भूमिका नहीं: अदालत ने स्पष्ट किया कि चूंकि आईआईटी बॉम्बे ने अपने सभी अधिकार सौंप दिए हैं, इसलिए अब पेटेंट कार्यवाही में उसे पक्षकार बनाने या सुनने की कोई आवश्यकता नहीं है।
- नए वरिष्ठ अधिकारी द्वारा सुनवाई: अदालत ने निर्देश दिया कि इस आवेदन की फाइल को किसी अन्य वरिष्ठ पेटेंट नियंत्रक द्वारा तय समयसीमा में निपटाया जाए, जिसने पूर्व में इस मामले को न देखा हो।
विधिक प्रतिनिधित्व
- याचिकाकर्ता (डॉ. तारकेश्वर पाटिल) की ओर से: अधिवक्ता हिरेन कामोद, अनीस पटेल, रवींद्र चिले और प्रशांत नकती।
- आईआईटी बॉम्बे (IIT Bombay) की ओर से: अधिवक्ता काजल गुप्ता, धीर संपत और श्वेता सिंह (एम.वी. किनी एंड कंपनी द्वारा ब्रीफ)।
- पीठ: न्यायमूर्ति सोमशेखर सुंदरेशन।
मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | बॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति सोमशेखर सुंदरेसन |
| याचिकाकर्ता वैज्ञानिक | डॉ. तारकेश्वर चंद्रकांत पाटिल |
| प्रतिवादी | IIT मुंबई (IIT Bombay) और पेटेंट कार्यालय |
| तकनीक/आविष्कार | In-vivo power generation (मानव शरीर के भीतर मेडिकल इम्प्लांट्स को चालू रखने वाला उपकरण और तरीका) |
| मुख्य आदेश | डॉ. पाटिल को पेटेंट का एकमात्र मालिक घोषित किया गया; पेटेंट कार्यालय को नए वरिष्ठ अधिकारी द्वारा आवेदन संसाधित करने का निर्देश। |

