हाईकोर्ट का मुख्य निर्देश
- शत-प्रतिशत अनिवार्य सत्यापन: पीठ ने आदेश दिया कि जब तक अदालत अगला निर्देश न दे, तब तक देश की सभी जीएसटी अथॉरिटीज बिना बायोमेट्रिक आधार सत्यापन के कोई भी नया पंजीकरण जारी न करें।
- सख्त चेतावनी: कोर्ट ने कहा कि यदि अधिकारियों को इसे लागू करने में कोई व्यावहारिक कठिनाई (Practical Difficulty) आती है तो वे अदालत को सूचित कर सकते हैं, लेकिन इस विषय को पूरी गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
नई दिल्ली: दिल्ली उच्च न्यायालय ने देश भर में फर्जी दस्तावेजों के सहारे गैरकानूनी जीएसटी (GST) पंजीकरण लेने और करोड़ों रुपये की टैक्स चोरी/धोखाधड़ी पर कड़ा प्रहार किया है। अदालत ने अंतरिम आदेश पारित करते हुए देश भर के सभी जीएसटी प्राधिकारियों को निर्देश दिया है कि अब से बायोमेट्रिक-आधारित आधार प्रमाणीकरण (Biometric-based Aadhaar Authentication) के बिना किसी भी व्यक्ति या संस्था को नया जीएसटी पंजीकरण (GST Registration) जारी न किया जाए [नेहा बनाम भारत संघ एवं अन्य]।
न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल और न्यायमूर्ति शैल जैन की खंडपीठ ने 8 सितंबर 2026 के अपने आदेश में कहा कि आम और अनजान नागरिकों के पैन (PAN) तथा आधार कार्ड विवरणों का दुरुपयोग कर फर्जी इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) और बैंक खातों से अवैध वसूली का जो नेटवर्क चल रहा है, उसे रोकने के लिए यह सख्त कदम आवश्यक है।
उच्च न्यायालय का राष्ट्रव्यापी निर्देश और टिप्पणियां
1. पूरे देश में बिना बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण के जीएसटी नहीं खंडपीठ ने अपने अंतरिम आदेश में स्पष्ट व्यवस्था दी: “फिलहाल के लिए, देश भर के सभी प्राधिकारियों को निर्देश जारी किए जाते हैं कि वे अब से बायोमेट्रिक-आधारित आधार सत्यापन (Biometric-based Aadhaar Authentication) के बिना किसी भी जीएसटी पंजीकरण की अनुमति न दें।” अदालत ने यह भी जोड़ा कि यदि केंद्र सरकार या प्राधिकारियों को इसे पूरे देश में लागू करने में कोई व्यावहारिक कठिनाई आती है, तो वे अदालत को इससे अवगत कराने के लिए स्वतंत्र हैं।
2. केवल ‘रिस्की’ मामलों तक सीमित रखना नाकाफी
- सरकार की दलील: केंद्र और जीएसटी विभाग ने तर्क दिया था कि सिस्टम वर्तमान में केवल डेटा एनालिटिक्स और जोखिम मापदंडों (Risk Parameters) के आधार पर ‘संदिग्ध/जोखिमपूर्ण’ (Risky) चिह्नित किए गए आवेदनों में ही बायोमेट्रिक आधार सत्यापन करता है।
- अदालत का रुख: हाईकोर्ट ने इस व्यवस्था को अपर्याप्त मानते हुए निर्देश दिया कि बायोमेट्रिक सत्यापन केवल चुनिंदा मामलों में नहीं, बल्कि प्रत्येक नए जीएसटी पंजीकरण आवेदन के लिए अनिवार्य रूप से लागू किया जाए।
3. संसद में दिए गए आश्वासन के बावजूद ढिलाई पर असंतोष अदालत ने गहरी नाराजगी जताई कि राज्यसभा में केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री द्वारा फर्जी रजिस्ट्रेशन और कर चोरी पर चिंता जताए जाने और बायोमेट्रिक अनिवार्य करने का बयान दिए जाने के एक वर्ष से अधिक समय बाद भी इसे पूरी तरह जमीन पर लागू नहीं किया गया।
फर्जी जीएसटी रजिस्ट्रेशन के चौंकाने वाले आधिकारिक आंकड़े
सुनवाई के दौरान राज्यसभा के पटल पर रखे गए आधिकारिक आंकड़े रिकॉर्ड पर लिए गए:
- वर्ष 2023-24: चोरी/फ्रीज किए गए पैन व आधार विवरणों का दुरुपयोग कर 2,800 फर्जी जीएसटी पंजीकरण पकड़े गए, जिनसे लगभग ₹15,085 करोड़ की कर चोरी हुई।
- वर्ष 2024-25: ऐसे फर्जी पंजीकरणों की संख्या 1,654 रही, जिनसे ₹13,109 करोड़ की टैक्स चोरी का खुलासा हुआ।
मामले की पृष्ठभूमि (नेहा का ₹4.46 करोड़ का मामला)
- पहचान की चोरी (Identity Theft): याचिकाकर्ता नेहा नामक महिला के पैन और आधार विवरणों का उनकी जानकारी व सहमति के बिना दुरुपयोग कर जालसाजों ने दो फर्जी जीएसटी पंजीकरण हासिल कर लिए। याचिकाकर्ता नेहा के पैन और आधार कार्ड के चोरी/जालसाजी किए गए ब्योरे का इस्तेमाल करके उनकी जानकारी के बिना दो फर्जी जीएसटी नंबर हासिल कर लिए गए। इसके आधार पर उनके पंजाब नेशनल बैंक (PNB) खाते से ₹4.46 करोड़ की धोखाधड़ी/रिकवरी का नोटिस जारी कर दिया गया।
- बैंक खाते से वसूली: पंजाब नेशनल बैंक (PNB) में स्थित उनके बचत खाते से फर्जी जीएसटी बकाए के नाम पर जारी एक नोटिस के आधार पर ₹4.46 करोड़ की हेराफेरी/निकासी कर ली गई।
- संसद में दिया गया बयान लागू न होना: हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया कि केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री ने राज्यसभा में बताया था कि वर्ष 2023-24 में 2,800 फर्जी जीएसटी पंजीकरण पकड़े गए थे, जिनसे ₹15,085 करोड़ की कर चोरी हुई। वहीं 2024-25 में 1,654 फर्जी पंजीकरणों के जरिए ₹13,109 करोड़ की जीएसटी चोरी हुई।
- जांच में विफलता पर हाईकोर्ट का रुख: मार्च 2026 में जीएसटी अधिकारियों से शिकायत करने के बाद भी जब कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो पीड़िता ने प्रभावी जांच और खाते की सुरक्षा के लिए दिल्ली हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की।
- हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: कोर्ट ने कहा कि राज्यसभा के पटल पर बायोमेट्रिक आधार सत्यापन अनिवार्य करने का बयान दिए जाने के एक साल बाद भी इसे पूरी तरह लागू नहीं किया गया। वर्तमान में एजेंसियां केवल डेटा एनालिटिक्स द्वारा ‘जोखिम भरे’ (Risky) पाए गए मामलों में ही बायोमेट्रिक जांच कर रही थीं, जिससे जालसाज आसानी से आम नागरिकों के दस्तावेजों का दुरुपयोग कर रहे थे।
विधिक प्रतिनिधित्व
- याचिकाकर्ता (नेहा) की ओर से: अधिवक्ता मनोज कुमार, अंकित सिंह, वैभव भारद्वाज, चंद्रपाल, निखिल प्रमोद, अनिमेश गौर और सत्य श्रुति।
- प्रतिवादी प्राधिकारियों की ओर से: अधिवक्ता सुमित के. बत्रा, प्रियंका जिंदल, राधिका अरोड़ा, दिशा चौधरी, अंकित राज, सौरभ मिश्रा, दिग्विजय सिंह, राधिका बिस्वजीत दुबे, गुरलीन कौर वराइच, कृतार्थ उपाध्याय, विवेक शर्मा, अमूल्य देव मिश्रा, सक्षम शर्मा, शुभम त्यागी, नवरूति ओझा, गौरव गुप्ता, शिवेंद्र सिंह, योजित पारीक, सूर्या जिंदल और प्रदीप भाटिया।
- एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae): वरिष्ठ अधिवक्ता तरुण गुलाटी।
- पीठ: न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल और न्यायमूर्ति शैल जैन।
GST Registration: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| पीठासीन पीठ | न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल और न्यायमूर्ति शैल जैन |
| मुख्य याचिकाकर्ता | नेहा (पीड़ित महिला जिनके PAN/Aadhaar से फर्जी GST रजिस्ट्रेशन बना) |
| मुख्य आदेश | देश भर में बिना बायोमेट्रिक आधार सत्यापन के GST रजिस्ट्रेशन देने पर तत्काल रोक। |
| पूर्व स्थिति | केवल रिस्की (Risky) मामलों में ही बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन किया जाता था। |

