सुप्रीम कोर्ट के मुख्य कानूनी निष्कर्ष
- एस्क्रौ खाता जारी होना धोखाधड़ी से मुक्ति नहीं: अदालत ने माना कि एस्क्रौ राशि (Escrow Amount) को रिलीज करना और PFUTP विनियमों (SEBI Prohibition of Fraudulent and Unfair Trade Practices Regulations) के तहत धोखाधड़ी की जांच करना दो अलग-अलग बातें हैं।“केवल एस्क्रौ खाता जारी (Release) कर दिए जाने से PFUTP विनियमों के तहत कार्रवाई पर खुद-ब-खुद रोक नहीं लग जाती, क्योंकि एस्क्रौ की रिहाई का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि धोखाधड़ी नहीं हुई थी।”
- तथ्यों में विरोधाभास की पुनः जांच: सुप्रीम कोर्ट ने नोट किया कि SEBI की अपनी दो अलग-अलग जांच रिपोर्टों और NSE के डेटा के बीच शेयरों के आंकड़ों को लेकर भारी विसंगतियां (Discrepancies) थीं।
- SAT को विस्तृत जांच के निर्देश: शीर्ष अदालत ने कहा कि इन तथ्यात्मक विसंगतियों को ट्रिब्यूनल (SAT) द्वारा गवाहों को बुलाकर, दस्तावेज मंगाकर और ट्रेडिंग रिकॉर्ड की गहराई से जांच करके सुलझाया जाना चाहिए।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2014 के ₹5,725 करोड़ के शेयर बायबैक मामले में वेदांता लिमिटेड (तत्कालीन केयर्न इंडिया लिमिटेड) के खिलाफ भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) द्वारा शुरू की गई धोखाधड़ी (Fraud) की कार्यवाही को पुनर्जीवित (Revive) कर दिया है [सेबी बनाम वेदांता लिमिटेड एवं अन्य]।
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण (SAT) के अक्टूबर 2023 के उस आदेश के खिलाफ सेबी की अपीलों को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया, जिसके तहत वेदांता और उसके तीन अधिकारियों पर लगाए गए ₹5.70 करोड़ के जुर्माने को रद्द कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने मामले को नए सिरे से तथ्यात्मक जांच और निर्णय के लिए वापस SAT को भेज (Remand) दिया है।
सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख विधिक व्याख्या
1. एस्क्रो खाते की जब्ती और PFUTP फ्रॉड रेगुलेशन दो अलग जांच अदालत ने स्पष्ट किया कि बायबैक रेगुलेशन के तहत एस्क्रो राशि की जब्ती और बाजार में धोखाधड़ी/हेरफेर (PFUTP Regulations) की जांच का क्षेत्राधिकार एक-दूसरे पर निर्भर नहीं करता: “एस्क्रो खाते की राशि जारी होना स्वचालित रूप से PFUTP रेगुलेशन के तहत कार्यवाहियों पर कोई वैधानिक रोक (Statutory Bar) नहीं लगाता। एस्क्रो राशि का जारी किया जाना अनिवार्य रूप से धोखाधड़ी की अनुपस्थिति का प्रमाण नहीं है।”
- दो अलग-अलग बिंदु: एक जांच केवल यह देखती है कि क्या 50% बायबैक कोटा पूरा न होने पर एस्क्रो राशि जब्त (Forfeit) की जानी चाहिए या नहीं। वहीं दूसरी जांच यह देखती है कि क्या कंपनी का समग्र आचरण और बायबैक की घोषणा निवेशकों को गुमराह करने या बाजार में हेरफेर (Market Manipulation) करने की साजिश थी।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा रेखांकित तथ्यात्मक विसंगतियां (Factual Discrepancies)
पीठ ने पाया कि मामले में महत्वपूर्ण तथ्यात्मक विवादों का समाधान किए बिना SAT ने राहत दे दी थी, जिसे सुलझाया जाना आवश्यक है:
- ट्रेडिंग डेटा में भारी अंतर: सेबी की जांच रिपोर्ट और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों में गंभीर विरोधाभास पाया गया। उदाहरण के लिए, 17 फरवरी 2014 के लिए सेबी की रिपोर्ट ने ₹335 या उससे कम कीमत पर 1.31 करोड़ से अधिक शेयर उपलब्ध दिखाए, जबकि एनएसई के डेटा के अनुसार केवल 30 लाख से कुछ अधिक शेयर उपलब्ध थे।
- सेबी की अपनी दो रिपोर्टों में अंतर्विरोध: सेबी की एक प्रारंभिक रिपोर्ट ने शेयर की कीमत या वॉल्यूम पर कोई बड़ा असर नहीं पाया, जबकि बाद की रिपोर्ट में उन्हीं तथ्यों पर धोखाधड़ी का आरोप लगाया गया।
- SAT को विस्तृत अधिकार: सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि SAT एक विशेषज्ञ ट्रिब्यूनल के रूप में गवाहों को समन कर सकता है, संबंधित ट्रेडिंग दस्तावेजों को तलब कर सकता है और डेटा की बारीक जांच के बाद धोखाधड़ी के प्रश्न पर एक नया निष्कर्ष दे सकता है।
मामले की पृष्ठभूमि (2014 केयर्न इंडिया बायबैक विवाद)
- बायबैक प्रस्ताव: जनवरी 2014 में केयर्न इंडिया लिमिटेड (अब वेदांता) ने ₹335 प्रति शेयर के अधिकतम मूल्य पर 17.09 करोड़ शेयरों को वापस खरीदने (Buyback) का प्रस्ताव रखा था, जिसके लिए ₹5,725 करोड़ की राशि निर्धारित की गई थी।
- शर्तों का उल्लंघन: कंपनी ने अंततः केवल लगभग 3.67 करोड़ शेयर (करीब ₹1,225 करोड़) खरीदे और कुल निर्धारित राशि का कम से कम 50% उपयोग करने की अनिवार्य नियामक शर्त को पूरा करने में विफल रही।
- सेबी का जुर्माना: सेबी के न्यायनिर्णायक अधिकारी (Adjudicating Officer) ने पाया कि अनुकूल बाजार स्थितियों के बावजूद कंपनी ने जानबूझकर पर्याप्त खरीद ऑर्डर नहीं लगाए और निवेशकों को गुमराह किया। सेबी ने कंपनी पर ₹5.25 करोड़ और तीन अधिकारियों पर ₹15-15 लाख का जुर्माना लगाया था।
- SAT का हस्तक्षेप (2023): 2023 में SAT ने यह कहते हुए जुर्माना रद्द कर दिया था कि धोखाधड़ी और जानबूझकर किया गया उल्लंघन साबित नहीं हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्देश
- मामला SAT को रिमांड: सुप्रीम कोर्ट ने SAT के 2023 के आदेश को निरस्त करते हुए मामले को पुनः SAT को सौंप दिया ताकि वह ट्रेडिंग रिकॉर्ड्स और दोनों पक्षों के साक्ष्यों का परीक्षण कर धोखाधड़ी के पहलू पर नया फैसला सुनाए।
- समानांतर कार्यवाही की वैधता: सेबी को कानून के अनुसार निष्पक्ष व्यापार विनियमों (PFUTP Regulations) के तहत स्वतंत्र जांच और दलीलें रखने का अधिकार बरकरार रखा गया।
विधिक प्रतिनिधित्व
- सेबी (SEBI) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता नवीन पाहवा, अधिवक्ता अभिषेक सिंह (K Ashar & Co. के निर्देश पर)।
- वेदांता लिमिटेड की ओर से: पूर्व न्यायाधीश व वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव शकधर, साथ में अधिवक्ता अनुराधा दत्त, पवन शर्मा, ऋषभ शर्मा, वैशाली जोशी, करण खेतानी, जोनाथन इवान राजन, बी. विजयलक्ष्मी मेनन (DMD Advocates), अमित अग्रवाल, सुमित अग्रवाल, सना जैन और आकांक्षा चौहान।
- पीठ: न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन।
Escrow Amount: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठासीन पीठ | जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन |
| मूल कंपनी | केयर्न इंडिया लिमिटेड (Cairn India Limited, अब वेदांता लिमिटेड) |
| मुख्य मुद्दा | एस्क्रौ राशि (Escrow Amount) रिलीज होने से क्या SEBI की PFUTP धोखाधड़ी जांच पर रोक लगती है? |
| अदालत का फैसला | एस्क्रौ रिलीज होना धोखाधड़ी से बरी होना नहीं है; SAT मामले की नए सिरे से जांच करे। |

