Friday, September 11, 2026
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Corporal Punishment: शारीरिक दंड अनुचित हो सकता है, यौन इरादे के बिना पीठ व कमर पर मारना POCSO का अपराध नहीं; POCSO केस समझें

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य अवलोकन और सिद्धांत

  • यौन मंशा (Sexual Intent) अनिवार्य शर्त: कोर्ट ने पोक्सो अधिनियम की धारा 7 का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि किसी बच्चे के साथ शारीरिक संपर्क या स्पर्श तभी ‘यौन हमला’ माना जाएगा जब वह यौन मंशा से किया गया हो। छात्राओं के बयानों से यह साफ था कि शिक्षक ने पाठ न सुना पाने पर अनुशासन या सजा देने के रूप में मारा था, न कि यौन मंशा से।
  • पोक्सो मुकदमे का शिक्षक के जीवन पर विनाशकारी प्रभाव: अदालत ने गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि बिना किसी यौन आधार के पोक्सो का कठोर मुकदमा चलाना किसी शिक्षक के जीवन और करियर के लिए ‘मृत्युदंड’ (Death Knell) जैसा है।

“शिक्षक को छात्राओं के साथ व्यवहार करते समय अधिक संवेदनशील होना चाहिए और शारीरिक दंड गलत है, लेकिन इसके आधार पर उस पर पोक्सो जैसे कड़े कानून के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। बाद में बरी होना भी शिक्षक के पूरे जीवन और परिवार को पहुंचे नुकसान की भरपाई नहीं कर सकता।”सुप्रीम कोर्ट

  • कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग: अदालत ने पाया कि शिकायत दर्ज कराने वाले हेडमास्टर और महिला शिक्षकों ने स्वयं घटना नहीं देखी थी और FIR दर्ज करने में देरी भी हुई थी। इस मुकदमे को जारी रखना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने पॉक्सो अधिनियम (POCSO Act) के तहत दर्ज मामलों में यौन मंशा (Sexual Intent) के अनिवार्य तत्व पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत दोहराते हुए भूगोल के एक शिक्षक के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को पूरी तरह रद्द (Quash) कर दिया है।

न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की खंडपीठ ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के 27 अप्रैल के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें अलीपुरद्वार विशेष अदालत में लंबित कार्यवाही को निरस्त करने से इनकार कर दिया गया था। अदालत ने फैसला सुनाया कि कक्षा में पढ़ाई न करने पर छात्राओं की पीठ या कमर पर मारना शारीरिक दंड (Corporal Punishment) की श्रेणी में तो आ सकता है, लेकिन यौन इरादे के अभाव में इसे पॉक्सो कानून के तहत ‘यौन उत्पीड़न’ (Sexual Assault) या ‘गंभीर यौन उत्पीड़न’ (Aggravated Sexual Assault) नहीं माना जा सकता [भास्कर पॉल बनाम पश्चिम बंगाल राज्य]।

सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख विधिक व संस्थागत टिप्पणियां

1. POCSO की धारा 7 एवं 9(f) के लिए ‘यौन इरादा’ (Sexual Intent) अनिवार्य पीठ ने पॉक्सो अधिनियम के वैधानिक प्रावधानों की व्याख्या करते हुए कहा: “पॉक्सो अधिनियम की धारा 7 के तहत किसी बच्चे के साथ शारीरिक संपर्क (Physical Contact) केवल तभी ‘यौन हमला’ (Sexual Assault) बनता है जब उसमें स्पष्ट रूप से यौन इरादा (Sexual Intent) शामिल हो। यदि ऐसा कृत्य किसी शिक्षक द्वारा किया जाता है, तो वह धारा 9(f) के तहत ‘गंभीर यौन हमला’ माना जाता है और धारा 10 के तहत दंडनीय होता है। छात्राओं के बयानों से यह स्पष्ट है कि शिक्षक ने सबक याद न करने पर उन्हें मारा था। यह आचरण शारीरिक दंड का मामला तो हो सकता है, लेकिन इसमें किसी भी प्रकार की यौन मंशा परिलक्षित नहीं होती।”

2. पॉक्सो ट्रायल शिक्षक के लिए ‘मौत की घंटी’ (Death Knell) जैसा पॉक्सो कानून के गंभीर और अपरिवर्तनीय प्रभावों पर चिंता जताते हुए अदालत ने कहा: “बालिकाओं या सह-शिक्षा वाले स्कूलों में पढ़ाने वाले किसी शिक्षक के लिए इस प्रकार के आरोप या ट्रायल न केवल उसके पूरे सेवा करियर बल्कि उसके पूरे जीवन और परिवार को भी बर्बाद कर देते हैं। ऐसे शिक्षक पर यौन हमले का आरोप लगाना उसके लिए ‘मौत की घंटी’ (Death Knell) के समान है। मुकदमे के अंत में मिलने वाला बरी होना (Acquittal) भी उसके जीवन और प्रतिष्ठा को हुए अपूरणीय नुकसान की भरपाई नहीं कर सकता। यद्यपि शिक्षक को कोमल उम्र की छात्राओं से व्यवहार करते समय अधिक संवेदनशील होने की आवश्यकता है, लेकिन इसे POCSO जैसे कठोर कानून के तहत मुकदमा चलाने का आधार नहीं बनाया जा सकता।”

3. प्रक्रिया का दुरुपयोग और एफआईआर में देरी

  • अदालत ने मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज छात्राओं के बयानों (Section 164 CrPC) का विश्लेषण किया, जहां एक छात्रा ने कहा था कि पाठ याद न होने पर शिक्षक ने उसकी पीठ व कमर पर मारा था, जबकि दूसरी ने कहा कि उन्होंने उसका हाथ पकड़ा था।
  • अदालत ने पाया कि शिकायत दर्ज कराने वाले प्रधानाध्यापक और अन्य शिक्षिकाओं ने घटना को अपनी आंखों से नहीं देखा था और एफआईआर दर्ज करने में असामान्य देरी हुई थी।
  • अदालत ने माना कि ऐसी स्थिति में मुकदमा जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग (Abuse of Process of Law) होगा।

Read the story; Court Guidelines: धारा 164 CrPC के बयान की प्रति आरोपी को देना अनिवार्य; POCSO एक्ट पर ट्रायल कोर्ट- पुलिस के लिए जारी की गाइडलाइंस

मामले की पृष्ठभूमि (अलीपुरद्वार का मामला)

  • शिकायत: पश्चिम बंगाल के अलीपुरद्वार स्थित एक स्कूल में भूगोल के शिक्षक भास्कर पॉल के खिलाफ छात्राओं के साथ कथित अनुचित व्यवहार को लेकर बाल संरक्षण इकाई (DCPU) ने काउंसलिंग व जांच रिपोर्ट तैयार की थी।
  • एफआईआर: रिपोर्ट के आधार पर सामुकतला पुलिस स्टेशन ने शिक्षक के खिलाफ POCSO एक्ट की धारा 10 के तहत एफआईआर दर्ज की और मामला अलीपुरद्वार की विशेष अदालत में पहुंचा।
  • कलकत्ता हाईकोर्ट से राहत न मिलना: शिक्षक ने कार्यवाही रद्द कराने के लिए कलकत्ता उच्च न्यायालय में धारा 482 CrPC के तहत याचिका लगाई, जिसे 27 अप्रैल को खारिज कर दिया गया। इसके बाद शिक्षक ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय

  1. कार्यवाही रद्द (Proceedings Quashed): सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश को पलटते हुए अलीपुरद्वार की विशेष अदालत में लंबित संपूर्ण आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया।
  2. संवेदनशीलता की सलाह: अदालत ने स्पष्ट किया कि हालांकि शिक्षक को छात्रों के साथ शारीरिक दंड से बचना चाहिए और संवेदनशील व्यवहार करना चाहिए, लेकिन पॉक्सो का इस्तेमाल गलत संदर्भ में नहीं किया जा सकता।

विधिक प्रतिनिधित्व

  • याचिकाकर्ता (शिक्षक भास्कर पॉल) की ओर से: अधिवक्ता अर्जुन चौधरी, उदय शंकर सरकार, जुनैद अली खान, अहमद नबील रिजवी, सुनीत सिंह, अब्दुल मन्नान, यासिर वली और इरशाद अहमद।
  • प्रतिवादी (राज्य सरकार) की ओर से: अधिवक्ता निशांत अवाना।
  • पीठ: न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर।

Corporal Punishment:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठासीन पीठजस्टिस उज्जल भुयान और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर
मामले का नामभास्कर पॉल बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (Bhaskar Paul v. State of West Bengal)
संबंधित कानून/धाराPOCSO Act की धारा 7, 9(f) और 10 (गंभीर यौन हमला)
अदालत का निर्णयकलकत्ता हाईकोर्ट का फैसला रद्द; शिक्षक के खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही पूरी तरह निरस्त (Quashed)
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