Tuesday, October 27, 2026
HomeDelhi High CourtTravesty of Justice: लड़की की छाती पर आरोपी के नाम का टैटू...

Travesty of Justice: लड़की की छाती पर आरोपी के नाम का टैटू और वह स्वेच्छा से मनाली गई; 17 साल बाद उसे दोबारा जेल भेजना न्याय का मखौल, जानें

हाईकोर्ट के मुख्य अवलोकन और आधार

  • प्रेम संबंध और टैटू का साक्ष्य: अदालत ने पाया कि लड़की अपनी छाती पर आरोपी का नाम टैटू करवाने और मनाली यात्रा का कोई स्पष्टीकरण नहीं दे सकी। दोषी के हाथ पर भी लड़की के नाम का टैटू था। सफर के दौरान उसने कोई शोर नहीं मचाया था।
  • रोमियो-जूलियट क्लॉज (Romeo-Juliet Clause): अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के उस हालिया रुख का उल्लेख किया जिसमें कम उम्र के जोड़ों (कम आयु अंतर वाले किशोरों) के बीच सहमति से बने संबंधों को बाल संरक्षण कानूनों की सख्त सजा से बचाने के लिए ‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ पर विचार करने की बात कही गई है।
  • समान कानूनी स्थिति और समय बीतना: न्यायालय ने इस बात को ध्यान में रखा कि घटना को 17 साल बीत चुके हैं, दोनों अब अन्य व्यक्तियों से शादी करके अपना जीवन बिता रहे हैं और दोषी का कोई पुराना आपराधिक इतिहास (Criminal Antecedents) नहीं रहा है।

“गहराई में कहीं न कहीं, पीड़िता भी टैटू और मनाली यात्रा के जवाब तलाश रही होगी… इस मोड़ पर दोषी को वापस जेल भेजना न्याय का उपहास होगा।” — न्यायमूर्ति विमल कुमार यादव

नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने वर्ष 2009 में एक 14 वर्षीय किशोरी के कथित अपहरण और बलात्कार (Rape & Kidnapping) के मामले में दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति की सजा को घटाकर उसके द्वारा हिरासत में पहले ही काटी जा चुकी 2 वर्ष और लगभग 4 महीने की अवधि तक सीमित (Sentence reduced to period already undergone) कर दिया है।

न्यायमूर्ति विमल कुमार यादव की एकल पीठ ने अपील पर सुनवाई करते हुए कहा कि दोनों पक्ष अब अपने-अपने जीवन में आगे बढ़ चुके हैं और अन्य व्यक्तियों से विवाहित हैं। ऐसे में घटना के 17 वर्ष बीत जाने के बाद व्यक्ति को दोबारा जेल भेजना न्याय का मखौल (Travesty of Justice) होगा। अदालत ने पाया कि यह मामला किशोरावस्था के एक प्रेम संबंध (Amorous Relationship) से जुड़ा था, जहां लड़की ने अपनी छाती पर आरोपी के नाम का टैटू बनवाया हुआ था और वह स्वेच्छा से उसके साथ मनाली घूमने गई थी [वकुल कपूर बनाम राज्य]।

उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक व तथ्यात्मक टिप्पणियां

1. टैटू और आचरण से प्रेम संबंध का संकेत लड़की के आचरण और शारीरिक साक्ष्यों का विश्लेषण करते हुए न्यायमूर्ति यादव ने कहा: “परिस्थितियां यह स्पष्ट संकेत देती हैं कि दोनों के बीच एक प्रेम प्रसंग (Amorous Relationship) था, यद्यपि लड़की की कम उम्र के कारण कानूनन सहमति का अभाव था और इस संबंध को विधिक मान्यता नहीं दी जा सकती थी। कहीं न कहीं गहराई में, लड़की को भी अपनी छाती पर बने टैटू और मनाली यात्रा के औचित्य का उत्तर खोजना होगा।”

अदालत ने यह भी नोट किया कि लड़की की छाती पर दोषी का नाम गुदा हुआ था, जबकि दोषी के हाथ पर भी लड़की के नाम का टैटू था। यात्रा के दौरान लड़की ने कहीं भी कोई शोर नहीं मचाया या विरोध दर्ज नहीं कराया था।

2. चिकित्सकीय जांच और प्रारंभिक बयानों में विरोधाभास

  • वापसी के तुरंत बाद की गई चिकित्सीय जांच (Medical Examination) और अपनी मां की उपस्थिति में पुलिस को दिए गए बयान में लड़की ने दोषी के अनुकूल बातें कही थीं।
  • हालांकि, बाद में मजिस्ट्रेट के समक्ष धारा 164 CrPC के बयान और ट्रायल के दौरान उसने आरोप लगाए।
  • अदालत ने माना कि लड़की की कम उम्र (14 वर्ष) ही एकमात्र ऐसा कारक था जिसके कारण आरोपी आपराधिक दायित्व के दायरे में आया।

3. ‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ (Romeo-Juliet Clause) और 17 साल का अंतराल

  • बचाव पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट की उन हालिया टिप्पणियों पर भी भरोसा जताया जिनमें मामूली आयु अंतर वाले वास्तविक किशोर प्रेम संबंधों को सख्त बाल संरक्षण कानूनों से बचाने के लिए ‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ पर विचार करने की बात कही गई है।
  • अदालत ने दर्ज किया कि दोषी का कोई पूर्व आपराधिक इतिहास नहीं है, दोनों अब अलग-अलग शादियां कर चुके हैं और मुकदमा पिछले 17 वर्षों से चल रहा है।

Read this Story; Corporal Punishment: शारीरिक दंड अनुचित हो सकता है, यौन इरादे के बिना पीठ व कमर पर मारना POCSO का अपराध नहीं; POCSO केस समझें

मामले की पृष्ठभूमि (जून 2009 की घटना)

  • घटना: जून 2009 में लगभग 14 वर्षीय किशोरी अपने घर से निकली और लगभग 18 वर्षीय वकुल कपूर के साथ पहले कनॉट प्लेस और फिर मनाली गई। दोनों दो दिन बाद दिल्ली लौटे।
  • ट्रायल कोर्ट का फैसला (2011): ट्रायल कोर्ट ने 2011 में आरोपी को आईपीसी की धारा 363 (अपहरण), धारा 366 (विवाह के लिए विवश करने हेतु अपहरण) और धारा 376 (बलात्कार) के तहत दोषी ठहराया था।
  • हाईकोर्ट में अपील: हाईकोर्ट में अपीलकर्ता ने केवल अपनी सजा की अवधि (Quantum of Sentence) को चुनौती दी और दोषसिद्धि को चुनौती न देते हुए हिरासत अवधि में राहत मांगी।

हाईकोर्ट का अंतिम आदेश

  1. सजा घटाकर पीरियड अंडरगोन: अदालत ने दोषी की मुख्य कारावास की सजा को घटाकर उसके द्वारा पूर्व में जेल में बिताई गई वास्तविक अवधि (लगभग 2 वर्ष और 4 महीने) तक सीमित कर दिया।
  2. जुर्माना बरकरार: ट्रायल कोर्ट द्वारा लगाया गया आर्थिक जुर्माना यथावत रहेगा।

विधिक प्रतिनिधित्व

  • दोषी (वकुल कपूर) की ओर से: अधिवक्ता साहिला लांबा।
  • राज्य सरकार की ओर से: अतिरिक्त लोक अभियोजक (APP) राज कुमार।
  • अभियोजक/पीड़िता की ओर से: अधिवक्ता आस्था और मेघा सिंह।
  • पीठ: न्यायमूर्ति विमल कुमार यादव।

Travesty of Justice:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतदिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court)
पीठासीन न्यायाधीशन्यायमूर्ति विमल कुमार यादव
मामले का नामवाकुल कपूर बनाम राज्य (Vakul Kapoor v. State)
घटना वर्ष और धाराएं2009; IPC की धारा 363 (अपहरण), 366 और 376 (रेप)
हाईकोर्ट का निर्णयदोषसिद्धि बरकरार; सजा घटाकर पहले काटी जा चुकी जेल अवधि (2 वर्ष 4 महीने) तक सीमित की गई।
RELATED ARTICLES

Most Popular

Patna
light rain
31.1 ° C
31.1 °
31.1 °
40 %
1.2kmh
78 %
Tue
30 °
Wed
30 °
Thu
22 °
Fri
23 °
Sat
30 °

Recent Comments