Wednesday, October 28, 2026
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Identity Theft: किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर ईमेल आईडी बनाना पहचान की चोरी का अपराध नहीं; विधायिका ने कानून में ईमेल आईडी शब्द शामिल नहीं किया

इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी तर्क

  • विधायिका के शब्दों की स्पष्टता (Legislative Intent): अदालत ने IT Act की धारा 66C की भाषा की समीक्षा करते हुए स्पष्ट किया कि कानून बनाने वाली विधायिका ने स्पष्ट शब्दों का प्रयोग किया है:“प्रथम दृष्टया शिकायतकर्ता का यह तर्क त्रुटिपूर्ण है। जब विधायिका ने अपनी समझदारी में धारा 66C के तहत ‘इलेक्ट्रॉनिक सिग्नेचर’, ‘पासवर्ड’ या ‘यूनिक आइडेंटिफिकेशन फीचर’ शब्दों का प्रयोग किया है और ‘ईमेल आईडी’ शब्द का प्रयोग नहीं किया है, तो प्रथम दृष्टया यह नहीं कहा जा सकता कि धारा 66C के तहत कोई अपराध हुआ है।” — इलाहाबाद हाईकोर्ट
  • ईमेल ID और पासवर्ड/सिग्नेचर में अंतर: अदालत ने माना कि किसी के नाम से ईमेल आईडी बनाना, उस व्यक्ति के निजी पासवर्ड या डिजिटल हस्ताक्षर का अनधिकृत उपयोग करने से अलग है। जब तक किसी व्यक्ति के अपने खाते, पासवर्ड या डिजिटल क्रेडेंशियल्स में सेंध न लगाई गई हो, तब तक पहचान की चोरी की धारा लागू नहीं होती।
  • FIR पर अंतरिम स्टे (Interim Stay): अदालत ने माना कि मामले में कानूनी हस्तक्षेप का ठोस आधार मौजूद है। इसलिए कोर्ट ने जांच और FIR पर अंतरिम रोक लगाते हुए राज्य सरकार और निजी प्रतिवादी से 4 सप्ताह में जवाब मांगा है।

प्रयागराज/लखनऊ: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (संशोधित 2008) की धारा 66C (पहचान की चोरी / Identity Theft) की व्याख्या करते हुए प्रथम दृष्टया एक महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत प्रतिपादित किया है।

न्यायमूर्ति अब्दुल मोईन और न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 356(2) (मानहानि) और IT एक्ट की धारा 66C के तहत दर्ज प्राथमिकी (FIR) पर अंतरिम रोक (Stay) लगाते हुए याचिकाकर्ताओं के खिलाफ किसी भी दंडात्मक या दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगा दी। अदालत ने माना कि किसी तीसरे व्यक्ति के नाम पर केवल एक ईमेल आईडी (Email ID) बना लेना और उसका उपयोग करना धारा 66C के तहत अपराध नहीं बनता, जब तक कि उस व्यक्ति के इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर (Electronic Signature), पासवर्ड या किसी विशिष्ट पहचान विशेषता (Unique Identification Feature) का कपटपूर्ण उपयोग न किया गया हो।

उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां

1. धारा 66C के दायरे में ‘ईमेल आईडी’ शामिल नहीं निजी प्रतिवादी के इस तर्क को कि किसी अन्य के नाम पर ईमेल बनाना पहचान की चोरी है, खारिज करते हुए खंडपीठ ने कहा: “प्रतिवादी का तर्क प्रथम दृष्टया भ्रामक और गलत है। विधायिका ने अपनी बुद्धिमत्ता में आईटी एक्ट, 2008 की धारा 66C के तहत केवल ‘इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर’, ‘पासवर्ड’ या ‘विशिष्ट पहचान विशेषता’ शब्दों का प्रयोग किया है और इसमें ‘ईमेल आईडी’ शब्द का प्रयोग नहीं किया है। फलस्वरूप, प्रथम दृष्टया यह नहीं कहा जा सकता कि याचिकाकर्ताओं द्वारा धारा 66C के तहत कोई अपराध किया गया है।”

2. मानहानि (Defamation) के लिए एफआईआर दर्ज करने पर कानूनी रोक

  • याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक सुब्रमण्यम स्वामी बनाम भारत संघ (2016) फैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि आपराधिक मानहानि (Defamation) का मुकदमा सीधे पुलिस एफआईआर या CrPC की धारा 156(3) / BNSS के तहत पुलिस जांच से शुरू नहीं किया जा सकता।
  • कानूनन मानहानि की कार्यवाही केवल पीड़ित व्यक्ति द्वारा सक्षम मजिस्ट्रेट के समक्ष दाखिल निजी शिकायत (Private Complaint) के माध्यम से ही चलाई जा सकती है।

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मामले की पृष्ठभूमि (लोकायुक्त को भेजी गई झूठी शिकायतें)

  • प्राथमिकी का आधार: एफआईआर में आरोप लगाया गया था कि याचिकाकर्ताओं ने एक तीसरे व्यक्ति के नाम पर फर्जी ईमेल आईडी बनाई और उस ईमेल खाते का उपयोग करके लोकायुक्त तथा अन्य प्रशासनिक प्राधिकारियों को झूठी और मानहानिकारक शिकायतें भेजीं।
  • दर्ज धाराएं: पुलिस ने BNS की धारा 356(2) (आपराधिक मानहानि) और IT (संशोधन) अधिनियम, 2008 की धारा 66C के तहत एफआईआर दर्ज की थी।
  • हाईकोर्ट में चुनौती: याचिकाकर्ताओं ने इस एफआईआर को रद्द कराने के लिए आपराधिक रिट याचिका दाखिल की।

हाईकोर्ट का अंतिम अंतरिम आदेश

  1. एफआईआर पर रोक: न्यायालय ने पाया कि प्रथम दृष्टया हस्तक्षेप का ठोस आधार बनता है, इसलिए चुनौती दी गई एफआईआर के संचालन पर अगले आदेश तक रोक लगा दी गई।
  2. दंडात्मक कार्रवाई पर प्रतिबंध: प्राधिकारियों को निर्देश दिया गया कि वे विवादित एफआईआर के अनुसरण में याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कोई भी दंडात्मक कार्रवाई न करें।
  3. हलफनामा दाखिल करने का समय: राज्य सरकार और निजी प्रतिवादी को जवाबी हलफनामा (Counter Affidavit) दाखिल करने के लिए 4 सप्ताह और याचिकाकर्ताओं को प्रत्युत्तर (Rejoinder) के लिए उसके बाद 2 सप्ताह का समय दिया गया।

विधिक विवरण

  • केस शीर्षक: आपराधिक रिट याचिका (धारा 356(2) BNS एवं धारा 66C IT एक्ट के तहत FIR को चुनौती)
  • प्रासंगिक कानून: सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66C; भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 356(2); एवं BNSS/CrPC के मानहानि शिकायत प्रावधान
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • याचिकाकर्ताओं की ओर से: अधिवक्ता अनुज दयाल
    • निजी प्रतिवादी की ओर से: अधिवक्ता सुमित कुमार ओझा
  • पीठ: न्यायमूर्ति अब्दुल मोईन और न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार श्रीवास्तव (इलाहाबाद उच्च न्यायालय)

Identity Theft: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतइलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court)
पीठासीन पीठजस्टिस अब्दुल मोईन एवं जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव
मुख्य विषयदूसरे के नाम पर Email ID बनाना IT Act की धारा 66C (Identity Theft) के दायरे में आएगा या नहीं
संबंधित कानूनIT (Amendment) Act, 2008 की धारा 66C, BNS, 2023 की धारा 356(2) (मानहानि)
अदालत का अंतरिम आदेशयाचिका स्वीकार; दर्ज FIR पर रोक लगाई गई और दंडात्मक कार्रवाई से राहत दी गई।
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