दिल्ली हाईकोर्ट की मुख्य टिप्पणियां
- ‘केवल भारतीय कंपनी द्वारा भुगतान होना टैक्स का आधार नहीं’: अदालत ने स्पष्ट किया कि अधिनियम की धारा 5(2)(b) या धारा 9 के तहत यह आय भारत में अर्जित नहीं मानी जा सकती।“एक भारतीय निवासी द्वारा किसी अनिवासी को महज भुगतान करना अपने आप में भारत में अर्जित या उत्पन्न होने वाली आय का गठन नहीं करता है।”
- असेसिंग ऑफिसर (AO) की सीमाएं: आयकर विभाग द्वारा रैनबैक्सी के व्यावसायिक निर्णय पर सवाल उठाने पर पीठ ने टिप्पणी की:“एक असेसिंग ऑफिसर, जो अर्थशास्त्री की टोपी नहीं पहनता, वह किसी व्यवसायी की बुद्धिमत्ता या समझौते के कारणों का फैसला नहीं कर सकता। कोई भी व्यक्ति केवल 30% टैक्स बचाने के लिए ₹1,851 करोड़ का भुगतान नहीं करेगा।”
- अथॉरिटी फॉर एडवांस रूलिंग्स (AAR) के 2019 के आदेश को रद्द किया: अदालत ने AAR के उस फैसले को खारिज कर दिया जिसमें इसे टैक्स बचाने का मिलीभगत वाला समझौता कहा गया था। कोर्ट ने कहा कि AAR ने अपनी सीमा से बाहर जाकर जांच की।
- 10 साल से अधिक समय तक रीफंड रोकना मनमाना: कोर्ट ने आयकर विभाग द्वारा एक दशक से अधिक समय तक रीफंड रोकने को “अत्यंत मनमाना और जब्ती जैसा (Confiscatory)” करार दिया।
नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट की खंडपीठ ने अंतरराष्ट्रीय कराधान (International Taxation), विदेशी कंपनियों को किए जाने वाले सीमा-पार भुगतानों (Cross-Border Payments) पर स्रोत पर कर कटौती (TDS), आयकर अधिनियम की धारा 5(2)(b), धारा 9 एवं धारा 148 के अधिकार क्षेत्र और व्यावसायिक विवेक (Commercial Wisdom) की न्यायिक समीक्षा पर एक ऐतिहासिक और युगांतरकारी फैसला सुनाया है।
इजरायली फार्मास्युटिकल कंपनी टेवा इजरायल के पक्ष में फैसला सुनाया
न्यायमूर्ति दिनेश मेहता और न्यायमूर्ति विनोद कुमार की खंडपीठ ने इजरायली फार्मास्युटिकल कंपनी टेवा इजरायल (Teva Israel) के पक्ष में फैसला सुनाते हुए रैनबैक्सी लेबोरेटरीज (Ranbaxy Laboratories) द्वारा एक अमेरिकी पेटेंट व एक्सक्लूसिविटी सेटलमेंट समझौते के तहत किए गए ₹1,851.07 करोड़ के भुगतान को भारत में पूरी तरह कर-मुक्त घोषित कर दिया है। अदालत ने टेवा यूएसए (Teva USA) के खिलाफ कर निर्धारण वर्ष 2012-13 से 2014-15 के लिए शुरू की गई धारा 148 की पुनर्मूल्यांकन कार्यवाहियों को क्षेत्राधिकार-विहीन करार देकर रद्द कर दिया। इसके साथ ही, अदालत ने एक दशक से अधिक समय से रोके गए लगभग ₹783.83 करोड़ के टीडीएस रिफंड को “मनमाना और जब्ती के समान” बताते हुए गारंटी शर्तों के अधीन वापस करने का आदेश दिया। अदालत ने स्पष्ट व्यवस्था दी है कि केवल इसलिए कि भुगतान किसी भारतीय resident कंपनी द्वारा किया गया है, वह आय भारत में प्रोद्भूत या उपार्जित (Accrue or Arise) नहीं मानी जा सकती जब तक कि आय सृजित करने वाली अंतर्निहित परिसंपत्ति, विनियामक अधिकार या गतिविधि का भारत से कोई पर्याप्त विधिक संबंध (Territorial Nexus) न हो [टेवा फार्मास्युटिकल इंडस्ट्रीज लिमिटेड बनाम भारत संघ एवं अन्य]।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं टिप्पणियां
1. भारतीय कंपनी द्वारा भुगतान स्वतः भारतीय आय नहीं बन जाता आयकर अधिनियम, 1961 के क्षेत्राधिकार के मूलभूत सिद्धांत को दोहराते हुए पीठ ने 15 सितंबर के अपने आदेश में कहा: “किसी भारतीय निवासी द्वारा किसी अनिवासी (Non-resident) को मात्र भुगतान कर देना अपने आप में (Ipso facto) भारत में उपार्जित या प्रोद्भूत होने वाली आय का गठन नहीं करता। यह लेन-देन न तो 1961 के अधिनियम की धारा 5(2)(b) के तहत किसी विशिष्ट डीमिंग प्रावधान में आता है और न ही धारा 9 के दायरे में। इन दोनों की अनुपस्थिति में, धारा 148 के तहत पुनर्मूल्यांकन नोटिस जारी करने की पूरी क्षेत्राधिकार संबंधी नींव (Jurisdictional Foundation) ही ढह जाती है।”
2. ‘आयकर अधिकारी अर्थशास्त्री नहीं हैं जो व्यापारियों के विवेक पर फैसला सुनाएं’
- आयकर विभाग ने तर्क दिया था कि जब रैनबैक्सी को अमेरिकी विनियामक मंजूरी मिल गई थी, तो उसे टेवा को ₹1,851 करोड़ देने का कोई व्यावसायिक औचित्य नहीं था और यह समझौता कर बचाने की मिलीभगत थी।
- इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए खंडपीठ ने सख्त टिप्पणी की:“एक कर निर्धारण अधिकारी (Assessing Officer), जो किसी अर्थशास्त्री की टोपी नहीं पहनता, वह किसी व्यवसायी की बुद्धिमानी और व्यावसायिक विवेक (Prudence of a businessman) का निर्धारण नहीं कर सकता और न ही उसे यह तय करना चाहिए कि किसी उद्यमी ने कोई समझौता क्यों किया और इतनी बड़ी राशि का भुगतान क्यों किया। आख़िरकार, कोई भी व्यक्ति 30% की कथित कर देनदारी बचाने के लिए ₹1,851 करोड़ का भुगतान नहीं करेगा—उसे ₹1,851 करोड़ का भुगतान तो हर हाल में करना ही पड़ा है।”
3. अधिकार, मुकदमा और बाजार—सब कुछ भारत के क्षेत्राधिकार से बाहर था
- अदालत ने तथ्यात्मक रूप से पाया कि फाइजर की दवा ‘लिपिटर’ (Atorvastatin) के जेनेरिक संस्करण के लिए 180 दिनों की विशेष बिक्री का अधिकार (180-day Exclusivity Period) अमेरिकी एफडीए (US FDA) के विनियामक ढांचे के तहत था।
- विवादित नोटिस, अमेरिकी अदालत में दायर मुकदमा, समझौता और मुनाफा पैदा करने वाला पूरा बाजार पूरी तरह संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) में स्थित था।
- केवल इसलिए कि रैनबैक्सी इंडिया ने अपने भारतीय खाते से धन प्रेषित किया, आय का स्रोत भारत नहीं बन सकता। राजस्व विभाग भारत और उस अधिकार के बीच कोई वास्तविक संबंध स्थापित करने में पूरी तरह विफल रहा।
4. AAR के 2019 के फैसले को रद्द किया: ‘अथॉरिटी नो-गो जोन में घुसी’
- उच्च न्यायालय ने अथॉरिटी फॉर एडवांस रूलिंग्स (AAR) के 2019 के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसने टेवा इजरायल की अर्जी पर विचार करने से यह कहते हुए इनकार कर दिया था कि यह व्यवस्था कर अपवंचन (Tax Avoidance) के लिए की गई एक बनावटी योजना थी।
- पीठ ने कहा कि AAR ने उन सवालों पर फैसला सुना दिया जो उसके समक्ष उठाए ही नहीं गए थे, और टेवा यूएसए को सुने बिना उसके खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष दर्ज किए। AAR ने पक्षकारों के वाणिज्यिक समझौते की निरर्थक जांच (Roving Inquiry) करके अपने वैधानिक ‘नो-गो जोन’ (No-go zone) का अतिक्रमण किया।
5. प्रोटेक्टिव असेसमेंट संभव, लेकिन ‘प्रोटेक्टिव रिकवरी’ अवैध
- अदालत ने स्पष्ट किया कि जब कर दायित्व वाले व्यक्ति की पहचान को लेकर अनिश्चितता हो, तो विभाग ‘सुरक्षात्मक कर निर्धारण’ (Protective Assessment) कर सकता है, लेकिन वह ‘सुरक्षात्मक वसूली’ (Protective Recovery) नहीं कर सकता।
- दस वर्षों से अधिक समय तक लगभग ₹783.83 करोड़ का रिफंड रोके रखने को अदालत ने “पूरी तरह से मनमाना और लगभग जब्ती (Confiscatory) की श्रेणी में आने वाला” करार दिया।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (लिपिटर विवाद व ₹1,851 करोड़ का सेटलमेंट)
- दवा का महत्व: यह विवाद फाइजर कंपनी द्वारा ‘लिपिटर’ (Lipitor) ब्रांड नाम से बेची जाने वाली कोलेस्ट्रॉल कम करने वाली प्रसिद्ध दवा ‘एटोरवास्टेटिन’ (Atorvastatin) के जेनेरिक संस्करण से जुड़ा था।
- 180 दिनों की अमेरिकी विशिष्टता (Exclusivity): रैनबैक्सी पहली कंपनी थी जिसने यूएस एफडीए में आवेदन किया था, जिसके कारण वह अमेरिकी कानून (Hatch-Waxman Act) के तहत 6 महीने (180 दिन) तक बिना किसी जेनेरिक प्रतिस्पर्धा के दवा बेचने के विशेष अधिकार की हकदार थी।
- 2010 का समझौता व विवाद: * समय पर विनियामक मंजूरी मिलने में अनिश्चितता के कारण दिसंबर 2010 में रैनबैक्सी (भारत व यूएस) और टेवा यूएसए के बीच अनुबंध हुआ कि यदि रैनबैक्सी समय पर तैयार नहीं हुई, तो वह टेवा के पक्ष में यह अधिकार छोड़ देगी।
- 23 नवंबर 2011 को टेवा यूएसए ने ‘रेडी डेट नोटिस’ जारी किया, जिसे रैनबैक्सी ने चुनौती दी। टेवा ने समझौते के प्रवर्तन के लिए अमेरिकी अदालत में मुकदमा दायर कर दिया।
- 30 नवंबर 2011 का वैश्विक समझौता: * 30 नवंबर 2011 को रैनबैक्सी को यूएस एफडीए की अंतिम मंजूरी मिल गई और उसी दिन दोनों पक्षों ने अमेरिकी मुकदमा वापस लेते हुए समझौता किया।
- रैनबैक्सी ने 6 महीने में अमेरिका में लगभग $700 मिलियन (लगभग ₹3,700 करोड़) का मुनाफा कमाया।
- समझौते की शर्तों के अनुसार, मुनाफे का 50% यानी ₹1,851.07 करोड़ टेवा यूएसए को देय हुआ।
- अधिकार का समनुदेशन (Assignment) और TDS: * टेवा यूएसए ने इस राशि को प्राप्त करने का अधिकार अपनी मूल कंपनी टेवा फार्मास्युटिकल्स इजरायल (Teva Israel) को सौंप दिया।
- रैनबैक्सी इंडिया ने तीन वित्तीय वर्षों में लगभग ₹783.83 करोड़ टीडीएस काटकर शेष राशि टेवा इजरायल को भेज दी।
- टेवा इजरायल ने भारत में अपनी आय शून्य घोषित की क्योंकि भारत में उसका कोई स्थायी प्रतिष्ठान (Permanent Establishment – PE) नहीं था और सारा विवाद व बिक्री अमेरिका में हुई थी। इसके बाद कंपनी ने कटे हुए टीडीएस के रिफंड की मांग की, जिसे विभाग ने टैक्स चोरी का प्रयास बताते हुए रोक लिया था।
उच्च न्यायालय का अंतिम निर्देश
- अग्रिम विनिर्णय (Advance Ruling) स्वीकार: अदालत ने टेवा इजरायल के अग्रिम विनिर्णय आवेदन को स्वीकार करते हुए व्यवस्था दी कि रैनबैक्सी से प्राप्त ₹1,851 करोड़ का भुगतान भारतीय आयकर अधिनियम के तहत कर योग्य नहीं है।
- पुनर्मूल्यांकन नोटिस रद्द: टेवा यूएसए के खिलाफ आयकर अधिनियम की धारा 147/148 के तहत शुरू की गई सभी कार्यवाहियां रद्द की गईं।
- शर्तों के साथ रिफंड की वापसी: अदालत ने निर्देश दिया कि काटा गया टीडीएस (TDS) टेवा इजरायल को वापस लौटाया जाएगा, बशर्ते टेवा यूएसए और टेवा इजरायल अदालत द्वारा निर्देशित आवश्यक वित्तीय/कॉर्पोरेट गारंटियां प्रस्तुत करें।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: टेवा फार्मास्युटिकल इंडस्ट्रीज लिमिटेड बनाम भारत संघ एवं अन्य [W.P.(C) 4410/2021 एवं संबद्ध याचिकाएं – दिल्ली उच्च न्यायालय]
- प्रासंगिक कानून: आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 5(2)(b) (अनिवासियों के लिए भारत में उपार्जित आय का दायरा), धारा 9(1) (भारत में अर्जित समझी जाने वाली आय), धारा 147/148 (आय के पलायन पर पुनर्मूल्यांकन), धारा 195 (अनिवासियों को भुगतान पर टीडीएस) एवं धारा 245R (AAR की प्रक्रिया)
- संबद्ध अंतरराष्ट्रीय न्यायिक नजीरें:
- वोडाफोन इंटरनेशनल होल्डिंग्स बनाम भारत संघ (2012, सुप्रीम कोर्ट) — ‘व्यावसायिक लेनदेन को उसके समग्र रूप में देखा जाना चाहिए (Look at test); केवल भारतीय स्रोत से भुगतान होने से क्षेत्राधिकार नहीं बनता जब तक कि अंतर्निहित संपत्ति भारत में स्थित न हो।’
- यूनियन ऑफ इंडिया बनाम आज़ादी बचाओ आंदोलन (सुप्रीम कोर्ट) — ‘व्यापारियों को अपने व्यावसायिक मामलों को वैध विधिक ढांचे के भीतर व्यवस्थित करने की पूर्ण स्वतंत्रता है।’
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- टेवा फार्मास्युटिकल्स की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश एन. साल्वे, वरिष्ठ अधिवक्ता सचित जॉली (डीएमडी एडवोकेट्स की टीम के साथ)
- आयकर विभाग / भारत संघ की ओर से: विशेष काउंसिल हिमांशु एस. सिन्हा, वरिष्ठ स्थायी काउंसिल सुनील अग्रवाल एवं विपुल अग्रवाल
- पीठ: न्यायमूर्ति दिनेश मेहता और न्यायमूर्ति विनोद कुमार (दिल्ली उच्च न्यायालय)
Commercial Wisdom: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| पीठासीन पीठ | जस्टिस दिनेश मेहता और जस्टिस विनोद कुमार |
| मुख्य पक्ष | टेवा फार्मा / टेवा इजरायल बनाम भारत संघ व आयकर विभाग |
| विवादित राशि | ₹1,851.07 करोड़ (रैनबैक्सी द्वारा भुगतान की गई निपटान राशि) |
| कटौती किया गया TDS | लगभग ₹783.83 करोड़ (जिन्हें अब रीफंड किया जाएगा) |
| संबंधित दवा | एटोरवास्टेटिन (Atorvastatin – कोलेस्ट्रॉल कम करने वाली दवा, ब्रांड: Lipitor) |

