Wednesday, September 23, 2026
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Price Control: ₹2,700 की दवा ₹27,000 में बेचना ‘दिन-दिहाड़े डकैती’; लोग दवा के लिए घर और जेवर बेच देते हैं और नियामक संस्थाएं खामोश बैठी हैं

सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां

  • कैंसर की दवा का उदाहरण: न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने एक उदाहरण देते हुए कहा, “कैंसर की कुछ आवश्यक दवाएं हैं, जिनका MRP ₹27,000 है लेकिन खुदरा विक्रेता को उसकी वास्तविक कीमत (PTR – Price to Retailer) केवल ₹2,700 होती है। यह मरीजों के साथ पूर्ण तबाही और दिन-दिहाड़े डकैती है। जो अधिकारी इस पर निर्णय लेने के लिए जिम्मेदार हैं, वे बिल्कुल चुप हैं।”
  • करदाताओं के पैसे का नुकसान (आयुष्मान भारत): अदालत ने रेखांकित किया कि ‘आयुष्मान भारत’ और अन्य सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के तहत इलाज करा रहे मरीजों के लिए सरकार ₹200 की दवा का ₹2,000 में पुनर्भुगतान (Reimbursement) कॉर्पोरेट अस्पतालों को करती है। यह सीधे तौर पर करदाताओं (Taxpayers) के पैसे का नुकसान और एक बड़ा फर्जीवाड़ा है।

याचिकाओं में उठाए गए मुख्य कानूनी तर्क

  1. DPCO 2013 का दायरा और गैर-अनुसूचित दवाएं:
    • याचिकाकर्ता किशन चंद जैन ने बताया कि दवा मूल्य नियंत्रण आदेश, 2013 (DPCO, 2013) केवल अनुसूची-I की लगभग 1,000 दवाओं (लगभग 17% बाजार) का अधिकतम मूल्य (Ceiling Price) तय करता है।
    • बाजार की लगभग 83% गैर-अनुसूचित दवाएं (Non-scheduled Drugs) इस नियंत्रण से बाहर हैं। निर्माता कंपनियां शुरुआती दिन अपनी मर्जी से कोई भी MRP तय करने के लिए स्वतंत्र हैं, और केवल उसके बाद हर साल 10% से अधिक दाम न बढ़ाने का नियम लागू होता है।
  2. असंगतता का उदाहरण (Statins):
    • एक सामान्य दवा Rasuvas (कोलेस्ट्रॉल के लिए) गैर-अनुसूचित होने के कारण लगभग ₹240 प्रति स्ट्रिप बिकती है।
    • लेकिन जब उसी दवा को एस्पिरिन (Aspirin) के साथ मिलाया (Combination) जाता है, तो वह अनुसूचित श्रेणी में आ जाती है और उसकी कीमत घटकर ₹70 रह जाती है।
  3. कॉर्पोरेट अस्पतालों द्वारा पूरा MRP वसूलना: डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ ने तर्क दिया कि आम केमिस्ट शायद मरीज को कुछ छूट दे भी दें, लेकिन कॉर्पोरेट अस्पताल अपने ही मेडिकल स्टोर से दवाएं खरीदने को मजबूर करते हैं और मरीजों से पूरा MRP वसूलते हैं।
  4. जेनेरिक दवाओं पर चिंताएं: यदि डॉक्टर बिना ब्रांड की केवल साल्ट नाम (Generic Name) से दवा लिखता है, तो किस ब्रांड की दवा देनी है, इसका निर्णय सीधे मेडिकल स्टोर वाले (Pharmacist) के पास चला जाता है, जो अपने व्यावसायिक लाभ (मार्जिन) के हिसाब से महंगी दवा चुन सकता है।

केंद्र सरकार और फार्मास्यूटिकल एसोसिएशन का रुख

  • केंद्र सरकार (ASG के. एम. नटराज): अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि सरकार इसे किसी विरोधी पक्ष के मुकदमे के रूप में नहीं देख रही है और मौजूदा प्रणाली में सुधार के क्षेत्रों पर विचार करेगी। उन्होंने ‘प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि योजना’ का भी उल्लेख किया।
  • इंडियन फार्मास्युटिकल अलायंस (वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल): फार्मा उद्योग का प्रतिनिधित्व करते हुए सिब्बल ने तर्क दिया कि निर्माता अत्यधिक कीमतों पर दवाएं नहीं बेच रहे हैं और सारा लाभ/मार्जिन खुदरा विक्रेता अर्जित कर रहे हैं। हालांकि, पीठ ने तुरंत पलटकर पूछा कि फिर MRP तय कौन करता है?

नई दिल्ली: सर्वोच्च न्यायालय ने देश में जीवन रक्षक व आवश्यक दवाओं की खुदरा कीमतों (MRP), निर्माताओं द्वारा तय की जाने वाली मनमानी प्रारंभिक लागत, रिटेलर को मिलने वाली कीमत (Price to Retailer – PTR) और मुद्रित एमआरपी के बीच 1000% से 1500% तक के अत्यधिक अंतर, तथा ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO, 2013) की विनियामक खामियों पर कड़ा संज्ञान लिया है।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने किशन चंद जैन और डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ द्वारा व्यक्तिगत रूप से (In-person) दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह सख्त टिप्पणियां कीं। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि इस भारी मुनाफे और मनमानी एमआरपी के कारण ‘आयुष्मान भारत’ जैसी सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के माध्यम से अंततः करदाताओं (Taxpayers) की गाढ़ी कमाई की खुली लूट हो रही है। शीर्ष अदालत ने निर्माताओं द्वारा ₹2,700 में दी जाने वाली कैंसर की दवा पर ₹27,000 की एमआरपी छापे जाने को “दिनदहाड़े खुली डकैती” (Broad daylight dacoity) और “जबरन वसूली” (Extortion) करार देते हुए राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) और नीति-निर्माताओं की रहस्यमयी चुप्पी पर तीखा आक्रोश व्यक्त किया है।

सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं तल्ख टिप्पणियां

1. ‘अगर यह जबरन वसूली नहीं है, तो फिर क्या है?’: न्यायमूर्ति संदीप मेहता दवा निर्माताओं और कॉर्पोरेट अस्पतालों के अत्यधिक मुनाफे पर कड़ा प्रहार करते हुए न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने टिप्पणी की: “अगर यह जबरन वसूली (Extortion) नहीं है, तो फिर क्या है? लोग जीवन रक्षक दवाएं खरीदने के लिए अपने घर बेच देते हैं, अपने गहने गिरवी रख देते हैं। कैंसर की ऐसी आवश्यक दवाएं हैं जिनकी रिटेलर कीमत (PTR) ₹2,700 है और उन पर ₹27,000 की एमआरपी छापी गई है। यह पूरी तरह से तांडव और दिनदहाड़े खुली डकैती है! मरीज को उस दवा के लिए कैसे ठगा जा सकता है जिसे निर्माता रिटेलर को 10% दाम पर बेचता है? यह अत्यधिक आश्चर्यजनक है कि जिन प्राधिकारियों को इस पर निर्णय लेना चाहिए था, वे पूरी तरह खामोश बैठे हैं—और हमें इसका कारण स्पष्ट करने की आवश्यकता नहीं है।”

2. गैर-अनुसूचित दवाओं के वर्गीकरण में विसंगति का उदाहरण

  • अदालत ने ‘अनुसूचित’ (Scheduled) और ‘गैर-अनुसूचित’ (Non-scheduled) दवाओं के मूल्य निर्धारण में मौजूद विसंगति को एक व्यावहारिक उदाहरण से समझाया:
    • कोलेस्ट्रॉल कम करने वाली सामान्य दवा ‘रोसुवास’ (Rasuvas) जब अकेले बेची जाती है, तो गैर-अनुसूचित होने के कारण उसका एक पत्ता लगभग ₹240 का बिकता है।
    • परंतु जब वही दवा एस्पिरिन (Aspirin) के साथ संयोजन (Combination) में बेची जाती है, तो वह मूल्य नियंत्रण (Schedule I) के तहत आ जाती है और वही पत्ता मात्र ₹70 में मिलता है।
  • पीठ ने पूछा कि जब संयोजन दवा को अधिक महंगा होना चाहिए, तो वह सस्ती है और मूल दवा तीन गुना महंगी, यह विनियामक तंत्र की गंभीर विफलता है।

3. आयुष्मान भारत और टैक्सपेयर्स के पैसे पर ‘प्रत्यक्ष धोखाधड़ी’ (Fraud on the Face of it) न्यायमूर्ति मेहता ने रेखांकित किया कि इस विसंगति का असर केवल आम नागरिकों की जेब पर ही नहीं पड़ रहा, बल्कि सरकारी खजाने को भी चूना लगाया जा रहा है: “एक और गंभीर पहलू है। आज लाखों गरीब मरीज ‘आयुष्मान भारत’ (PM-JAY) के तहत इलाज करा रहे हैं। जब ₹200 की लागत वाली दवा अस्पताल द्वारा ₹2,000 की एमआरपी पर दी जाती है, तो अस्पताल सरकार से इसका पूरा रीइंबर्समेंट लेता है। सरकार इसका भुगतान करती है, जो अंततः देश के करदाताओं का पैसा है। यह सीधे तौर पर प्रथम दृष्टया धोखाधड़ी (Clear-cut case of fraud on the face of it) का मामला है।”

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याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए प्रमुख विधिक व संरचनात्मक मुद्दे

1. किशन चंद जैन (व्यक्तिगत रूप से पेश याचिकाकर्ता):

  • शुरुआती कीमत निर्धारण पर शून्य नियंत्रण: DPCO 2013 केवल अनुसूची-1 में शामिल लगभग 1,000 दवाओं (Scheduled Drugs) की सीलिंग प्राइस तय करता है। बाजार में मौजूद 82% से 83% दवाएं ‘गैर-अनुसूचित’ हैं, जहां निर्माता पहली बार में कोई भी मनमाना दाम (चाहे ₹1 रखे या ₹1,000) तय करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है; नियम केवल यह है कि वह बाद में इसमें सालाना 10% से अधिक वृद्धि नहीं कर सकता।
  • 2007 के संशोधन की अनदेखी: आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 की धारा 2A में 2007 के संशोधन के बाद सभी दवाओं को ‘आवश्यक वस्तु’ का दर्जा दिया गया है। ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट की धारा 3(b) में भी अनुसूचित और गैर-अनुसूचित का कोई विधिक भेद नहीं है। एक मरीज के लिए वही दवा सबसे आवश्यक है जो उसकी बीमारी का इलाज करती है।
  • मेडिकल डिवाइसेज का नियमन: 1 अप्रैल 2020 से सभी चिकित्सा उपकरणों (Stents, Implants आदि) को दवा के रूप में अधिसूचित किया गया है, परंतु उन पर भी अत्यधिक मार्कअप वसूला जा रहा है।

2. डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ (याचिकाकर्ता 2):

  • DPCO का पैरा 19 (आपातकालीन शक्तियां): सरकार के पास लोकहित में असाधारण परिस्थितियों के तहत किसी भी गैर-अनुसूचित दवा की अधिकतम खुदरा सीमा तय करने की वैधानिक शक्ति मौजूद है, फिर भी इसका उपयोग नहीं किया जा रहा।
  • 1500% तक का मुनाफा और एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस: एंटीबायोटिक ‘TG-BEX’ का उदाहरण देते हुए बताया कि मुद्रित मूल्य और वास्तविक बिक्री मूल्य में 1,500% का अंतर है। भारी मार्जिन के कारण डॉक्टर और अस्पताल गैर-जरूरी एंटीबायोटिक्स को बढ़ावा दे रहे हैं, जिससे देश में एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) का संकट गहरा रहा है।
  • कॉर्पोरेट अस्पतालों की बाध्यता: पारंपरिक केमिस्ट भले ही मरीजों को कुछ छूट दे दें, लेकिन कॉर्पोरेट अस्पताल अपने इन-हाउस मेडिकल स्टोर से पूरी एमआरपी पर दवाएं खरीदने के लिए मरीजों को विवश करते हैं।

केंद्र सरकार, फार्मा उद्योग और अन्य पक्षों की दलीलें

  • अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) के.एम. नटराज (केंद्र सरकार):
    • एएसजी ने प्रस्तुत किया कि केंद्र सरकार इस मामले को ‘प्रतिद्वंद्वी’ (Adversarial) के रूप में नहीं ले रही है और व्यवस्था में सुधार के सभी सुझावों पर सकारात्मक विचार करेगी।
    • उन्होंने ‘प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना’ (PMBJP) का हवाला दिया, जिस पर अदालत ने पूछा कि उन दवाओं का क्या होगा जो जनऔषधि केंद्रों पर उपलब्ध नहीं हैं।
  • वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल (इंडियन फार्मास्युटिकल अलायंस):
    • फार्मा निर्माताओं का प्रतिनिधित्व करते हुए सिब्बल ने दलील दी कि निर्माता खुद भारी मुनाफे पर दवाएं नहीं बेच रहे हैं, बल्कि रिटेलर्स और मध्यवर्ती एजेंसियां भारी मार्जिन कमा रही हैं।
    • इस पर न्यायमूर्ति मेहता ने तीखा पलटवार करते हुए कहा कि दवा के पैकेट पर अत्यधिक एमआरपी छापने का काम रिटेलर नहीं, बल्कि स्वयं निर्माता कंपनी करती है।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: किशन चंद जैन बनाम भारत संघ एवं अन्य (सहपठित: डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ बनाम भारत संघ) [रिट याचिकाएं (सिविल) – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • याचिकाकर्ता: किशन चंद जैन एवं डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ (व्यक्तिगत रूप से उपस्थित)
    • केंद्र सरकार की ओर से: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) के.एम. नटराज
    • इंडियन फार्मास्युटिकल अलायंस की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल
  • प्रासंगिक कानून एवं आदेश:
    • ड्रग्स (प्राइसेस कंट्रोल) ऑर्डर, 2013 (DPCO, 2013) के प्रावधान एवं पैरा 19 (लोकहित में मूल्य नियंत्रण की असाधारण शक्तियां)
    • आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 (Essential Commodities Act, 1955) की धारा 2A एवं 3
    • औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 (Drugs and Cosmetics Act, 1940) की धारा 3(b)
    • भारत का संविधान – अनुच्छेद 21 (स्वास्थ्य और गरिमापूर्ण जीवन का मौलिक अधिकार), अनुच्छेद 39(e) व (f) तथा अनुच्छेद 47 (सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार का राज्य का प्राथमिक कर्तव्य)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक वूमेन्स एसोसिएशन बनाम भारत संघ (सुप्रीम कोर्ट) एवं सिटिजन्स फॉर हेल्दी इंडिया बनाम भारत संघ — ‘सस्ती और जीवन रक्षक दवाओं तक आम नागरिक की पहुंच संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग है; राज्य का यह दायित्व है कि वह अनियंत्रित बाजारी शक्तियों और मुनाफाखोरी से नागरिकों की रक्षा करे।’
  • पीठ: न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता (सर्वोच्च न्यायालय)
  • अगली सुनवाई: मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और भारत संघ की विस्तृत दलीलें सुनने के लिए अगली तारीख 29 सितंबर 2026 तय की गई है।

Price Control: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठ (Judges)न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता
याचिकाकर्ताकिशन चंद जैन और डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ (व्यक्तिगत रूप से)
मुख्य मुद्दागैर-अनुसूचित दवाओं (Non-scheduled Drugs) के शुरुआती मूल्य और MRP पर नियंत्रण न होना
अगली सुनवाई29 सितंबर 2026
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