इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निष्कर्ष और टिप्पणी
- प्रक्रियात्मक आदेश: हाईकोर्ट ने आगरा CJM के समन आदेश को निरस्त (Set Aside) कर दिया और निर्देश दिया कि इस मामले को अब एक परिवाद या ‘शिकायत केस’ (Complaint Case) के रूप में कानून के अनुसार आगे बढ़ाया जाए।
- प्रबंधन को सख्त चेतावनी: अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेज स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि ‘वी बाजार’ के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा कर्मचारियों पर सांता क्लॉज़ कैप पहनने के लिए दबाव बनाया गया था, जो अलग-अलग विश्वास और आस्था रखने वाले कर्मचारियों की भावनाओं को आहत करता है।अदालत ने टिप्पणी की: “याचिकाकर्ता और उनके वरिष्ठ अधिकारियों को चेतावनी दी जाती है कि वे कार्यस्थल पर अपने कर्मचारियों के बीच शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण माहौल को बिगड़ने वाले इस प्रकार के निर्देशों को दोबारा न दोहराएं।”
प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कार्यस्थल पर धार्मिक स्वतंत्रता, संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत अंतःकरण के अधिकार, वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों द्वारा कर्मचारियों पर सांस्कृतिक/धार्मिक प्रतीकों को थोपने की सीमाओं, और गैर-संज्ञेय (Non-cognizable) अपराधों में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 2(d) के प्रक्रियात्मक अनुपालन पर एक महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है।
न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव की एकल पीठ ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM), आगरा द्वारा भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 298 और 504 के तहत दायर पुलिस चार्जशीट पर संज्ञान लेने और समन जारी करने के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका (धारा 482 CrPC / धारा 528 BNSS) पर आंशिक राहत देते हुए यह टिप्पणी की। अदालत ने रिटेल स्टोर चेन ‘वी बाज़ार’ (V Bazar) के उच्चाधिकारियों को कड़े शब्दों में चेतावनी दी है कि वे कर्मचारियों को सांता क्लॉज़ (Santa Claus) की लाल टोपी पहनने के लिए मजबूर न करें, क्योंकि ऐसी जबरदस्ती अन्य धर्मों और आस्थाओं के लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचा सकती है।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं अवलोकन
1. ‘लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी पर कोई आस्था थोपना स्वीकार्य नहीं’: न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव कार्यस्थल पर जबरन ड्रेस कोड के रूप में धार्मिक/सांस्कृतिक प्रतीकों के उपयोग पर अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा: “याचिका के समर्थन में संलग्न शपथपत्र और दस्तावेजों से यह शीशे की तरह साफ (Crystal Clear) है कि ‘वी बाज़ार’ के उच्चाधिकारियों द्वारा सांता क्लॉज़ की लाल टोपी पहनने के लिए विवशता (Compulsion) पैदा की गई थी, जो किसी न किसी रूप में भिन्न धर्मों और मान्यताओं से जुड़े लोगों की भावनाओं को आहत करती है। इस प्रकार के कृत्य की देश की उस लोकतांत्रिक व्यवस्था में अनुमति नहीं दी जा सकती जहां प्रत्येक नागरिक अपनी आस्था और विश्वास का पालन करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।”
2. कार्यस्थल के सौहार्दपूर्ण वातावरण को बिगाड़ने के खिलाफ चेतावनी
- अदालत ने स्टोर प्रबंधन और संबंधित अधिकारियों को सख्त ताकीद की:“आवेदक के साथ-साथ उसके उच्चाधिकारियों को एतद्द्वारा चेतावनी दी जाती है कि वे अपने कर्मचारियों के बीच कार्यस्थल के शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण माहौल को बिगाड़ने वाले इस प्रकार के निर्देशों को भविष्य में कभी न दोहराएं।”
3. प्रक्रियात्मक त्रुटि: असंज्ञेय अपराधों में चार्जशीट को ‘परिवाद’ (Complaint) माना जाए
- मजिस्ट्रेट की विधिक त्रुटि: अदालत ने रेखांकित किया कि आईपीसी की धारा 298 (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से शब्द बोलना आदि) और धारा 504 (शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान) दोनों असंज्ञेय (Non-cognizable) अपराध हैं।
- धारा 2(d) CrPC का स्पष्टीकरण: दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 2(d) के स्पष्टीकरण (Explanation to Section 2(d)) के तहत यदि कोई पुलिस अधिकारी ऐसे मामले की जांच के बाद रिपोर्ट दाखिल करता है जिसमें केवल असंज्ञेय अपराध प्रकट होते हैं, तो उस पुलिस रिपोर्ट/चार्जशीट को राज्य द्वारा संचालित पुलिस केस नहीं, बल्कि एक ‘परिवाद’ (Complaint Case) के रूप में माना जाना चाहिए और जांच अधिकारी को ‘परिवादी’ (Complainant) माना जाएगा।
- सीजेएम आगरा ने इसे नियमित पुलिस केस मानते हुए सीधे संज्ञान और समन आदेश जारी कर प्रक्रियात्मक विधिक भूल की थी।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं विधिक विवाद
- क्रिसमस पर लाल टोपी पहनने की अनिवार्यता: आगरा स्थित ‘वी बाज़ार’ स्टोर में क्रिसमस के अवसर पर वरिष्ठ प्रबंधन द्वारा सभी कर्मचारियों के लिए सांता क्लॉज़ की लाल टोपी पहनकर काम करना अनिवार्य कर दिया गया था।
- कर्मचारियों का विरोध और एफआईआर: कुछ कर्मचारियों ने अपनी धार्मिक आस्था के आधार पर इसे पहनने से मना किया, जिसके बाद विवाद बढ़ा। आरोप लगा कि प्रबंधन ने दबाव बनाया और अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया। मामले में आईपीसी की धारा 298 और 504 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई।
- सीजेएम का समन आदेश: जांच अधिकारी (IO) ने मामले की जांच पूरी कर अदालत में चार्जशीट पेश की, जिस पर सीजेएम आगरा ने संज्ञान लेते हुए आवेदक को समन जारी कर दिया था।
- हाईकोर्ट में चुनौती: आवेदक ने धारा 482 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और तर्क दिया कि चूंकि दोनों अपराध असंज्ञेय हैं, इसलिए पुलिस की चार्जशीट के आधार पर राज्य केस के रूप में संज्ञान नहीं लिया जा सकता था; इसे परिवाद के रूप में प्रक्रियाबद्ध किया जाना चाहिए था।
Santa Claus Dress: उच्च न्यायालय का अंतिम आदेश
- समन आदेश निरस्त: उच्च न्यायालय ने सीजेएम आगरा द्वारा पारित संज्ञान और समन आदेश को निरस्त (Set aside) कर दिया।
- परिवाद के रूप में विचार करने का निर्देश: मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया गया कि वे धारा 2(d) CrPC के अनिवार्य कानूनी प्रावधानों के तहत उक्त पुलिस रिपोर्ट को एक ‘शिकायत/परिवाद’ (Complaint) मानकर नियमानुसार आगे की कार्यवाही करें।
- प्रबंधन को सख्त ताकीद: प्रबंधन को कर्मचारियों की अंतःकरण व धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान करने और ऐसे फरमान दोबारा न जारी करने की चेतावनी के साथ आवेदन को आंशिक रूप से स्वीकार कर निस्तारित कर दिया गया।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: स्टोर प्रबंधक/आवेदक (‘वी बाज़ार’) बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य [धारा 482 CrPC आवेदन – इलाहाबाद उच्च न्यायालय]
- प्रासंगिक विधायी प्रावधान:
- दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 2(d) (परिवाद की परिभाषा एवं असंज्ञेय पुलिस रिपोर्ट का परिवाद माना जाना) / BNSS 2023 की समतुल्य धारा
- भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 298 (धार्मिक भावनाओं को आहत करने का विमर्श) एवं धारा 504 (शांति भंग हेतु जानबूझकर अपमान) / BNS 2023 के समतुल्य प्रावधान
- प्रासंगिक संवैधानिक प्रावधान: भारत का संविधान – अनुच्छेद 25(1) (अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म के अबाध रूप से मानने व आचरण का अधिकार) एवं अनुच्छेद 21
- पीठ: न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव (इलाहाबाद उच्च न्यायालय)
Santa Claus Dress: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव |
| पक्षकार | वी बाजार (V Bazar) के वरिष्ठ अधिकारी/आवेदक |
| संबंधित धाराएं | भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 298 और 504 |
| निचली अदालत का आदेश | मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM), आगरा का समन आदेश रद्द किया गया |

