Sunday, September 27, 2026
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Har Ghar Tiranga: केरल में हर घर तिरंगा अभियान में फोटो खिंचवाते समय केसरिया पट्टी नीचे हो जाने पर दर्ज केस रद्द; हालांकि व्हाट्सएप ग्रुप को माना ‘सार्वजनिक दृश्य’ का दायरा

हाईकोर्ट के मुख्य कानूनी निष्कर्ष और सिद्धांत

  1. अपराध के लिए ‘आपराधिक मंशा’ (Mens Rea) अनिवार्य: अदालत ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 की धारा 2 के तहत कोई कृत्य तभी दंडनीय अपराध बनता है जब व्यक्ति ने जानबूझकर तिरंगे का अपमान करने के उद्देश्य से उसे नीचा दिखाया, जलाया, कुचला या उल्टा प्रदर्शित किया हो। बिना किसी दुर्भावना के गलती से हुआ कृत्य अपराध की श्रेणी में नहीं आता।
  2. ‘हर घर तिरंगा’ का संदर्भ: न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ता ‘हर घर तिरंगा’ अभियान में भाग ले रहा था, जिसका उद्देश्य ही राष्ट्रध्वज का सम्मान करना और देशभक्ति प्रकट करना था। ऐसे में उसका इरादा तिरंगे का अपमान करने का नहीं हो सकता।
  3. व्हाट्सएप ग्रुप और ‘पब्लिक व्यू’ (Public View): याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया था कि फोटो केवल एक प्राइवेट व्हाट्सएप ग्रुप में शेयर हुई थी, इसलिए यह सार्वजनिक स्थान नहीं है। हालांकि अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए माना कि व्हाट्सएप ग्रुप भले ही प्राइवेट हो, लेकिन उसमें कई सदस्य होते हैं, इसलिए कानूनी तौर पर यह “सार्वजनिक दृष्टि में” (Public View) की परिभाषा में आ सकता है।
  4. अंतिम निर्णय: चूंकि कासिम द्वारा तिरंगे को नीचा दिखाने का कोई इरादा साबित नहीं हुआ, इसलिए अदालत ने माना कि उसके खिलाफ कोई अपराध नहीं बनता और न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट में लंबित आपराधिक मामले को रद्द कर दिया।

कोच्चि: केरल हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान और राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 (Prevention of Insults to National Honour Act, 1971) की धारा 2 के तहत आपराधिक दायित्व (Criminal Liability) के निर्धारण पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संतुलित विधिक व्यवस्था दी है।

न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन की एकल पीठ ने ‘हर घर तिरंगा’ अभियान के दौरान उल्टा झंडा पकड़े जाने की तस्वीर सामने आने पर दर्ज आपराधिक मामले को पूरी तरह रद्द (Quashed) कर दिया। हालांकि, अदालत ने विधिक रूप से यह भी स्पष्ट किया कि भले ही कोई व्हाट्सएप ग्रुप निजी (Private) हो, लेकिन कई सदस्यों की मौजूदगी के कारण उस पर साझा की गई तस्वीर कानूनन “सार्वजनिक दृश्य के भीतर” (Within Public View) की श्रेणी में आती है। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी व्यक्ति द्वारा असावधानी, भूलवश (Mistake) या अनजाने में राष्ट्रीय ध्वज (तिरंगे) को उल्टा—यानी केसरिया रंग को नीचे की ओर—प्रदर्शित कर दिया जाता है, तो जब तक कि ऐसा करने के पीछे राष्ट्रीय ध्वज का जानबूझकर अपमान करने का दुर्भावनापूर्ण इरादा (Mens Rea) साबित न हो, तब तक इसे आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता।

उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं अवलोकन

1. ‘इरादतन अपमान और भूलवश हुई चूक में स्पष्ट विधिक अंतर’ न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन ने 1971 के अधिनियम की धारा 2 और इसके स्पष्टीकरण 4(l) की कानूनी व्याख्या करते हुए कहा: “राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 की धारा 2 के तहत अपराध केवल तभी आकर्षित होगा जब कोई व्यक्ति जानबूझकर (Deliberately) और राष्ट्रीय ध्वज का अपमान करने के स्पष्ट इरादे (Intent to Insult) के साथ केसरिया रंग को नीचे की ओर प्रदर्शित करता है। इसके विपरीत, बिना किसी आपराधिक मंशा (Mens Rea) के भूलवश, असावधानी से या अनजाने में किया गया ऐसा कृत्य इस धारा के अंतर्गत दंडनीय अपराध का गठन नहीं करता है।”

2. व्हाट्सएप ग्रुप ‘सार्वजनिक दृश्य’ (Within Public View) के दायरे में अदालत ने याचिकाकर्ता के उस तकनीकी तर्क को खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि चूंकि फोटो एक निजी व्हाट्सएप ग्रुप में डाली गई थी, इसलिए यह ‘सार्वजनिक स्थान’ या ‘सार्वजनिक दृश्य’ में नहीं है:

  • पीठ ने व्यवस्था दी कि भले ही कोई व्हाट्सएप ग्रुप बंद या निजी प्रकृति का हो, लेकिन उसमें कई सदस्य (Multiple Members) जुड़े होते हैं।
  • सूचना प्रौद्योगिकी के युग में ऐसे समूहों में साझा की गई सामग्री को धारा 2 के प्रयोजन हेतु “किसी अन्य स्थान पर सार्वजनिक दृश्य के भीतर” (Any other place within public view) माना जाएगा।

3. अभियोजन के साक्ष्यों में ही ‘आपराधिक मंशा’ का अभाव

  • उच्च न्यायालय ने पुलिस की चार्जशीट और अंतिम रिपोर्ट का अवलोकन कर पाया कि स्वयं जांच एजेंसी ने यह आरोप नहीं लगाया था कि आरोपी ने तिरंगे का जानबूझकर अपमान किया था।
  • अदालत ने इस तथ्य का विशेष संज्ञान लिया कि यह तस्वीर केंद्र सरकार के ‘हर घर तिरंगा’ (Har Ghar Tiranga) कार्यक्रम के तहत ली गई थी, जिसका मूल उद्देश्य ही राष्ट्रीय ध्वज को सम्मान देना और देशभक्ति प्रदर्शित करना था। अतः केवल गलती से झंडा उल्टा पकड़ लेने से अपराध नहीं बनता।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं विधिक कालक्रम

  • अगस्त 2022 का हर घर तिरंगा अभियान:
    • लक्षद्वीप निवासी मोहम्मद कासिम एच.के. ने अगस्त 2022 में ‘हर घर तिरंगा’ अभियान के तहत कोझिकोड (केरल) स्थित अपने आवास पर अपनी पत्नी के साथ राष्ट्रीय ध्वज हाथ में लेकर एक तस्वीर खिंचवाई थी।
    • फोटो खिंचवाते समय अनजाने में तिरंगा उल्टा पकड़ा गया, जिससे केसरिया पट्टी नीचे और हरी पट्टी ऊपर दिखाई दे रही थी।
  • व्हाट्सएप ग्रुप और सुओ-मोटो FIR:
    • यह तस्वीर लक्षद्वीप के भाजपा सदस्यों के एक निजी व्हाट्सएप ग्रुप में साझा की गई।
    • वहां से यह तस्वीर कवरत्ती (लक्षद्वीप) पुलिस के एक अधिकारी के पास पहुंची, जिसके बाद पुलिस ने बिना किसी औपचारिक शिकायत के अगस्त 2022 में आरोपी के खिलाफ स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेते हुए 1971 के अधिनियम की धारा 2 के तहत प्राथमिकी दर्ज कर ली।
  • चार्जशीट और ट्रायल कोर्ट में मामला: जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने आरोपी के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया, जिसका संज्ञान लक्षद्वीप स्थित न्यायिक प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट (JFCM) अदालत ने ले लिया था।
  • हाईकोर्ट में चुनौती: कासिम ने अधिवक्ता अजीत जी. अंजर्लेकर के माध्यम से उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर दलील दी कि यह एक अनजानी मानवीय भूल थी और उनका तिरंगे का अपमान करने का कोई इरादा नहीं था। हाईकोर्ट ने दलीलों से सहमति जताते हुए ट्रायल कोर्ट में लंबित पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।

विधिक प्रावधान एवं दंड की रूपरेखा

  • राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 की धारा 2:
    • जो कोई भी किसी सार्वजनिक स्थान पर या जनता के सामने राष्ट्रीय ध्वज या भारत के संविधान को जलाता है, विकृत करता है, अपवित्र करता है या अन्यथा अनादर (Disrespect) प्रदर्शित करता है, उसे तीन वर्ष तक के कारावास या जुर्माना या दोनों से दंडित किया जा सकता है।
  • स्पष्टीकरण 4(l) (Explanation 4(l)):
    • यह उप-प्रावधान स्पष्ट रूप से कहता है कि जानबूझकर (Intentionally) राष्ट्रीय ध्वज को केसरिया रंग नीचे की ओर रखकर फहराना या प्रदर्शित करना ध्वज का अनादर माना जाएगा।
    • न्यायालय ने इसी शब्द “Intentionally” को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया कि जब तक जानबूझकर किया गया कृत्य साबित न हो, तब तक यह दंडात्मक उपबंध लागू नहीं हो सकता।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: मोहम्मद कासिम एच.के. बनाम केंद्र शासित प्रदेश लक्षद्वीप व अन्य [आपराधिक विविध याचिका (Crl.MC) – केरल उच्च न्यायालय, कोच्चि]
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • याचिकाकर्ता (आरोपी) की ओर से: अधिवक्ता अजीत जी. अंजर्लेकर, जी.पी. शिनोद, गोविंद पद्मनाभन, अतुल मैथ्यूज एवं गायत्री एस.बी.
    • प्रतिवादी (UT लक्षद्वीप) की ओर से: स्थायी वकील (Standing Counsel) आर.वी. श्रीजीत
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
    • राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 की धारा 2 सहपठित स्पष्टीकरण 4(l) (राष्ट्रीय ध्वज और संविधान का अपमान)
    • भारतीय ध्वज संहिता, 2002 (Flag Code of India, 2002) के दिशानिर्देश
    • दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 482 / BNSS की धारा 528 (उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियां)
    • आपराधिक विधि का मूल सिद्धांत: Actus non facit reum nisi mens sit rea (बिना आपराधिक मंशा के केवल कोई कृत्य अपराध नहीं बन जाता)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
    • नवीन जिंदल बनाम भारत संघ (2004, सुप्रीम कोर्ट 3-जज पीठ) — ‘राष्ट्रीय ध्वज को सम्मानपूर्वक फहराना प्रत्येक नागरिक के लिए संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है; ध्वज संहिता का उल्लंघन स्वतः आपराधिक कानून के तहत दंडनीय तब तक नहीं होता जब तक दुर्भावनापूर्ण इरादा न हो।’
    • संजय दलमिया बनाम राज्य (इलाहाबाद हाईकोर्ट) — ‘राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम की धारा 2 के तहत अपराध का सार मानसिक तत्त्व (Mens Rea) और ध्वज के प्रति स्पष्ट अनादर की भावना में निहित है।’
  • पीठ: न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन (केरल उच्च न्यायालय)
  • अंतिम निर्णय: मोहम्मद कासिम एच.के. के खिलाफ दर्ज एफआईआर, चार्जशीट और लक्षद्वीप मजिस्ट्रेट अदालत में लंबित आपराधिक कार्यवाही पूरी तरह निरस्त (Quashed)।

Har Ghar Tiranga: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतकेरल उच्च न्यायालय (Kerala High Court)
न्यायाधीशन्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन (Justice A. Badharudeen)
मामलामोहम्मद कासिम एच.के. बनाम केंद्र शासित प्रदेश लक्षद्वीप एवं अन्य
घटना‘हर घर तिरंगा’ कार्यक्रम (अगस्त 2022) के दौरान अनजाने में तिरंगा उल्टा पकड़कर फोटो खिंचवाना।
लागू कानूनराष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 की धारा 2 (Section 2 of Prevention of Insults to National Honour Act, 1971)
अदालत का फैसलाबिना अपमान की मंशा (Intent/Mens Rea) के अनजाने में हुई गलती अपराध नहीं है; मामला खारिज।
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