चुनाव आयोग (ECI) के मुख्य तर्क
- अनुच्छेद 329(b) और कानूनी मिसाल:चुनाव आयोग ने संविधान के अनुच्छेद 329(b) का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी चुनाव के परिणाम को केवल इलेक्शन पिटीशन (Election Petition) के जरिए चुनौती दी जा सकती है, न कि वोटर लिस्ट (मतदाता सूची) में किसी त्रुटि या बदलाव के आधार पर पूरे चुनाव को रद्द किया जा सकता है।
- TMC के दावों का खंडन:ECI ने कहा कि डेरेक ओ’ब्रायन ने सामान्य रूप से हटाए गए अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत और डुप्लीकेट (ASDDO) नामों को न्यायिक रूप से हटाए गए नामों के साथ मिलाकर भ्रामक आंकड़े पेश किए। यदि वास्तविक हटाए गए आंकड़ों को देखा जाए, तो जिन सीटों पर TMC हारी है (जैसे दिनहाटा, खारग्राम, बाली आदि), वहां हटाए गए नामों की संख्या TMC के हार के अंतर (Margin of Defeat) से काफी कम थी।
- उल्टा तर्क:आयोग ने बताया कि TMC द्वारा जीती गई 21 सीटें ऐसी हैं, जहां हटाए गए नामों की संख्या उनकी जीत के अंतर से ज्यादा थी। यदि याचिकाकर्ता का सिद्धांत माना जाए, तो TMC की जीती हुई सीटों पर भी सवाल उठेंगे।
- ट्रिब्यूनल की गति बढ़ाने का प्रस्ताव:अपीलों के त्वरित निपटारे के लिए आयोग ने संसदीय क्षेत्रों की संख्या के आधार पर ट्रिब्यूनलों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव रखा है और वर्चुअल/ऑनलाइन सुनवाई की सुविधा विकसित की है।
नई दिल्ली: भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष दायर अपने ताजा हलफनामे में पश्चिम बंगाल विधानसभा की 31 सीटों पर नए सिरे से चुनाव कराने की तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सांसद डेरेक ओ’ब्रायन की मांग का कड़ा विरोध किया है। आयोग ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) के दौरान हटाए गए नामों से चुनाव परिणामों पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ा है। इसके साथ ही आयोग ने संवैधानिक प्रावधानों का हवाला देते हुए दो-टूक कहा कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 329(b) के तहत किसी भी चुनाव परिणाम को केवल ‘चुनाव याचिका’ (Election Petition) के माध्यम से ही चुनौती दी जा सकती है, न कि मतदाता सूची की कथित त्रुटियों या रिट याचिकाओं के आधार पर।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय विशेष पीठ के निर्देश पर आयोग ने पश्चिम बंगाल के अपीलीय अधिकरणों (Appellate Tribunals) में लंबित अपीलों का आधिकारिक आंकड़ा शीर्ष अदालत में पेश किया।

अपीलीय अधिकरणों (Tribunals) में लंबित अपीलों का आधिकारिक डेटा
निर्वाचन आयोग द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किए गए आंकड़ों के अनुसार राज्य में एसआईआर प्रक्रिया के बाद अपीलों की स्थिति इस प्रकार है:
| श्रेणी / विवरण | कुल संख्या |
| दाखिल की गई कुल अपीलें (Total Appeals Filed) | 38,31,429 |
| • नाम काटे जाने/हटाए जाने के खिलाफ मतदाताओं की अपीलें (Exclusion Appeals) | 22,21,118 (लगभग 58%) |
| • दूसरों के नाम शामिल किए जाने के खिलाफ आपत्तियां (Inclusion Appeals) | 16,10,311 (लगभग 42%) |
| अब तक निर्णीत अपीलें (Decided Appeals) | 1,26,194 (3% से कुछ अधिक) |
| वर्तमान में लंबित अपीलें (Pending Appeals) | 37,05,235 |
- सर्वाधिक प्रभावित जिले: सबसे अधिक अपीलें मुर्शिदाबाद (7,48,216) और मालदा (5,31,617) जिलों से संबंधित हैं। मुर्शिदाबाद में 7.48 लाख अपीलों में से अब तक केवल 595 अपीलों का ही निस्तारण हो सका है।
सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग की प्रमुख दलीलें
1. ‘अनुच्छेद 329(b) का संवैधानिक अवरोध; वोटर लिस्ट की गलती चुनाव रद्द करने का आधार नहीं’
- आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय की स्थापित नजीरों का हवाला देते हुए कहा कि संविधान का अनुच्छेद 329(b) स्पष्ट रूप से यह व्यवस्था देता है कि संसद या राज्य विधानसभा के किसी भी चुनाव को केवल लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत दायर ‘चुनाव याचिका’ (Election Petition) के जरिए ही चुनौती दी जा सकती है।
- स्थापित कानून के अनुसार, मतदाता सूची में किसी भी प्रकार की खामी, प्रविष्टि या विलोपन (Defect in Electoral Roll) के आधार पर सीधे पूरी चुनाव प्रक्रिया या परिणामों को अमान्य घोषित करने का कोई वैधानिक प्रावधान नहीं है।
2. टीएमसी के ‘हार के अंतर’ वाले दावे की विधिक हवा निकाली
- आयोग ने आरोप लगाया कि टीएमसी सांसद ने न्यायिक अधिकारियों द्वारा छांटी गई अपीलों और सामान्य सत्यापन प्रक्रिया के तहत हटाई गई ASDD प्रविष्टियों (अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत और डुप्लीकेट) को जानबूझकर एक साथ मिला दिया (Conflated) ताकि भ्रामक नैरेटिव बनाया जा सके।
- आयोग ने डेटा के साथ साबित किया कि दिनहाटा, खरग्राम, बल्ली और हावड़ा उत्तर जैसी विधानसभा सीटों पर न्यायिक रूप से हटाए गए नामों की संख्या टीएमसी उम्मीदवारों की हार के अंतर (Losing Margin) से भी कम थी।
- विरोधाभास का पर्दाफाश: चुनाव आयोग ने रेखांकित किया कि टीएमसी द्वारा जीती गई 21 ऐसी सीटें हैं जहां हटाए गए नामों की संख्या टीएमसी की जीत के अंतर से कहीं अधिक थी। यदि याचिकाकर्ता का यह ‘मार्जिन बनाम डिलीशन’ का सिद्धांत लागू किया जाए, तो टीएमसी द्वारा जीती गई उन 21 सीटों के परिणामों पर भी स्वतः सवाल खड़ा होगा।
3. पश्चिम बंगाल में मतदाताओं की संख्या में भारी गिरावट
प्रसेनजीत बोस की याचिका में दायर जवाबी हलफनामे में चुनाव आयोग ने बताया कि एसआईआर प्रक्रिया के बाद वोटर लिस्ट का आकार काफी घटा है:
- 27 अक्टूबर 2025 का प्री-ड्राफ्ट रोल: 7,66,37,529 मतदाता
- 28 फरवरी 2026 का अंतिम रोल: 6,44,52,609 मतदाता
- कुल 60,06,675 मतदाता, जो न्यायिक प्रक्रिया/निर्णय के अधीन चिह्नित थे, अंतिम मतदाता सूची का हिस्सा नहीं बन सके।
4. 37 लाख अपीलों के त्वरित निपटारे के लिए ECI का नया खाका
लंबित अपीलों के भारी बोझ को देखते हुए चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्ताव रखा है:
- अधिकरणों की संख्या को बढ़ाकर राज्य के सभी 42 संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों के बराबर किया जाए।
- न्यायिक अधिकारियों को विशेष सॉफ्टवेयर सक्षम एक्सेस दिया जाएगा ताकि वे अपने आवास या किसी भी स्थान से वर्चुअली सुनवाई कर तेजी से अपीलों का निपटारा कर सकें।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: डेरेक ओ’ब्रायन बनाम भारत निर्वाचन आयोग [IA No. 171298/2026 in WP(C) No. 737/2025 – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
- संबद्ध याचिका: मोस्तारी बानू / प्रसेनजीत बोस बनाम भारत निर्वाचन आयोग व अन्य
- प्रासंगिक संवैधानिक व कानूनी प्रावधान:
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 329(b) (निर्वाचन संबंधी मामलों में अदालतों के हस्तक्षेप पर रोक एवं केवल चुनाव याचिका का उपाय)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 324 (चुनाव आयोग में अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण की शक्तियां)
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 80 एवं 100 (चुनाव याचिका और चुनाव शून्य घोषित करने के वैधानिक आधार)
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 एवं निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 (मतदाता सूचियों का सघन पुनरीक्षण व अपीलीय प्रक्रिया)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- एन.पी. पोन्नुस्वामी बनाम रिटर्निंग ऑफिसर (1952, सुप्रीम कोर्ट संविधान पीठ) — ‘चुनाव प्रक्रिया शुरू होने से लेकर परिणाम घोषित होने तक चुनाव में किसी भी हस्तक्षेप का एकमात्र उपाय अनुच्छेद 329(b) के तहत इलेक्शन पिटीशन है।’
- इंदरजीत बरुआ बनाम भारत निर्वाचन आयोग (1985, सुप्रीम कोर्ट) — ‘मतदाता सूची की अपूर्णता या उसमें त्रुटि के आधार पर संपूर्ण आम चुनाव या विधानसभा परिणामों को रिट याचिका के माध्यम से शून्य घोषित नहीं किया जा सकता।’
- लक्ष्मी चरण सेन बनाम ए.के.एम. हसन उज्जामन (1985, सुप्रीम कोर्ट संविधान पीठ) — ‘मतदाता सूची का पुनरीक्षण एक सतत प्रशासनिक प्रक्रिया है; चुनाव हो जाने के बाद परिणाम को केवल सक्षम चुनाव अधिकरण के समक्ष ही चुनौती दी जा सकती है।’
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना (सर्वोच्च न्यायालय)
- वर्तमान स्थिति: चुनाव आयोग का हलफनामा रिकॉर्ड पर लिया गया; सुप्रीम कोर्ट अपीलीय अधिकरणों के त्वरित कामकाज और एसआईआर प्रक्रिया की सतत निगरानी कर रहा है।
West Bengal Poll: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | CJI सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना |
| याचिकाकर्ता | डेरेक ओ’ब्रायन (TMC सांसद) |
| मुख्य विवाद | 31 विधानसभा सीटों पर चुनाव रद्द कर SIR अपीलों के निपटारे के बाद दोबारा चुनाव कराने की मांग। |
| ECI का स्टैंड | मतदाता सूची की खामियों के आधार पर चुनाव रद्द नहीं हो सकते; SIR प्रक्रिया से परिणामों पर असर नहीं पड़ा। |

