हाईकोर्ट के सख्त निष्कर्ष और कानूनी आदेश
- तीन साल तक संवैधानिक अदालत को गुमराह करना: न्यायमूर्ति संजय धर ने नाराजगी जताते हुए टिप्पणी की:“याचिकाकर्ता तसद्दुक हुसैन ने न केवल पुलिस अधिकारियों को गुमराह किया, बल्कि उसमें जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के सर्वोच्च संवैधानिक न्यायालय को तीन साल से अधिक समय तक इस तरह की तुच्छ कार्यवाहियों में उलझाकर गुमराह करने का दुस्साहस था, जिससे अदालत का कीमती न्यायिक समय बर्बाद हुआ।”
- भारतीय न्याय संहिता (BNS, 2023) के तहत कार्रवाई: अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता का यह कृत्य शपथ पर झूठा बयान देने और झूठे सबूत गढ़ने का अपराध है, जो भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 216, 217, 227, 229, 233, 236 और 237 के तहत दंडनीय है।
- आपराधिक मामला दर्ज करने का निर्देश: पीठ ने कहा कि ऐसे तत्वों को सबक सिखाया जाना जरूरी है ताकि भविष्य में कोई न्यायपालिका का इस तरह दुरुपयोग न करे। इसके लिए हाईकोर्ट ने अपने रजिस्ट्रार (जुडीशियल), जम्मू को निर्देश दिया कि वे आरोपी तसद्दुक हुसैन के खिलाफ मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM), जम्मू के समक्ष औपचारिक आपराधिक शिकायत दर्ज कराएं।
जम्मू: न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग, अदालतों में झूठे हलफनामे (Perjury) और बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) जैसी असाधारण संवैधानिक रिट के दुर्भावनापूर्ण इस्तेमाल पर जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है।
न्यायमूर्ति संजय धर की एकल पीठ ने 17 सितंबर 2026 को पारित अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता ने न केवल पुलिस को गुमराह किया, बल्कि उसने केंद्र शासित प्रदेश की शीर्ष संवैधानिक अदालत को भी वर्षों तक धोखे में रखने की धृष्टता की है। अदालत ने व्यवस्था दी कि न्याय प्रशासन को दूषित करने वाले और अदालतों को अपने निजी प्रतिशोध का अखाड़ा बनाने वाले ऐसे तत्वों को कानूनन सबक सिखाया जाना अनिवार्य है। उच्च न्यायालय ने राजौरी निवासी एक व्यक्ति के खिलाफ मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) की अदालत में आपराधिक परिवाद दर्ज करने का सख्त आदेश पारित किया है, जिसने वास्तव में अस्तित्व में ही न होने वाली एक “काल्पनिक बेटी” (Fictitious Daughter) को पुलिस हिरासत में बताकर तीन साल से अधिक समय तक उच्च न्यायालय का कीमती न्यायिक समय बर्बाद किया।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं तीखी टिप्पणियां
1. ‘संवैधानिक अदालत को तीन साल तक झूठे मुकदमे में उलझाए रखने की धृष्टता’
न्यायमूर्ति संजय धर ने याचिकाकर्ता के आचरण पर गंभीर आपत्ति दर्ज करते हुए अपने आदेश में कहा: “याचिकाकर्ता तसद्दुक हुसैन ने न केवल पुलिस अधिकारियों को गुमराह किया, बल्कि उसने जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख संघ राज्य क्षेत्र की शीर्ष संवैधानिक अदालत को तीन साल से अधिक समय तक इन तुच्छ और फर्जी कार्यवाहियों में उलझाए रखकर गुमराह करने की धृष्टता की, जिससे इस न्यायालय का अत्यंत मूल्यवान न्यायिक समय नष्ट हुआ।”
अदालत ने आगे टिप्पणी की: “ऐसे तत्वों को सबक सिखाने की सख्त जरूरत है ताकि भविष्य में कोई भी इस प्रकार के कृत्यों को दोहराने की हिम्मत न करे… वह कानून के अनुसार आपराधिक अभियोजन का पूरी तरह पात्र है।”
2. भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत आपराधिक दायित्व
पीठ ने माना कि याचिकाकर्ता का यह कृत्य लोक सेवकों को झूठी सूचना देने, शपथ पर झूठे बयान दर्ज कराने, और न्यायिक कार्यवाही में झूठे साक्ष्य गढ़ने (Perjury) का गंभीर संज्ञेय अपराध बनता है।
- अदालत ने रेखांकित किया कि यह आचरण भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धाराएं 216, 217, 227, 229, 233, 236 और 237 के तहत दंडनीय अपराधों की श्रेणी में आता है।
- अदालत ने उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार (ज्यूडिशियल), जम्मू को अधिकृत करते हुए निर्देश दिया कि वे संबंधित सभी प्राथमिक साक्ष्यों व जांच रिपोर्टों को संलग्न कर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM), जम्मू के समक्ष तत्काल आपराधिक परिवाद (Criminal Complaint) दायर करें।
CJM राजौरी की जांच रिपोर्ट: ‘अहंकार और हताशा की संतुष्टि का षड्यंत्र’
उच्च न्यायालय के निर्देश पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM), राजौरी द्वारा की गई विस्तृत तथ्यात्मक जांच में पूरे षड्यंत्र का पर्दाफाश हुआ:
- काल्पनिक बेटी का निर्माण: जांच रिपोर्ट में यह चौंकाने वाला निष्कर्ष सामने आया कि तसद्दुक हुसैन की ‘शबीना कौसर’ नाम की कोई बेटी थी ही नहीं।
- परेशान करने का दुर्भावनापूर्ण उद्देश्य: उसने केवल अपने निजी विरोधियों को प्रताड़ित करने, उन पर आपराधिक दबाव बनाने और अपने अहंकार व हताशा (Ego and Frustration) को संतुष्ट करने के उद्देश्य से एक मनगढ़ंत बेटी का चरित्र गढ़ा और पुलिस पर उसे गायब करने का संगीन आरोप मढ़ दिया।
- सबूत देने में पूर्ण विफलता: अदालत द्वारा याचिकाकर्ता को अपनी बेटी के अस्तित्व को साबित करने के कई अवसर दिए गए, लेकिन वह कोई भी वैध प्रमाण पेश करने में असमर्थ रहा।
- कोर्ट से फरार होना: जब जांच की आंच बढ़ने लगी और पोल खुलने लगी, तो याचिकाकर्ता और उसके अधिवक्ता ने अदालत की सुनवाइयों में पेश होना ही बंद कर दिया।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं जांच का कालक्रम (2023 से 2026)
- 2023 की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (HCP No. 61/2023):
- राजौरी निवासी तसद्दुक हुसैन ने वर्ष 2023 में जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की।
- उसने आरोप लगाया कि 21 जून 2023 को पुलिस अधिकारी उसके घर में घुसे और उसके कानूनी विरोधियों के इशारे पर उसकी बेटी ‘शबीना कौसर’ को जबरन उठाकर अज्ञात स्थान पर ले जाकर अवैध रूप से बंधक बना रखा है।
- पुलिस और स्थानीय प्रशासन का रुख:
- पुलिस ने स्पष्ट किया कि वे हुसैन के खिलाफ कुछ बकरियां चोरी होने से संबंधित एक आपराधिक मामले की जांच के सिलसिले में उसके घर गए थे। किसी भी लड़की को हिरासत में लेने से पुलिस ने साफ इनकार किया और रिकॉर्ड पेश किया कि हुसैन की इस नाम की कोई बेटी दर्ज नहीं है।
- व्यापक प्रशासनिक एवं पंचायत स्तरीय सत्यापन:
- उच्च न्यायालय द्वारा पहचान संबंधी दस्तावेज मांगने पर कुछ संदिग्ध कागजात पेश किए गए।
- सरकारी अधिवक्ता भानु जसरौतिया ने कोर्ट को सूचित किया कि पुलिस सत्यापन, ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर (BMO), ग्राम प्रधानों (सरपंचों), और जिला विकास परिषद (DDC) के प्रतिनिधियों की संयुक्त जांच रिपोर्टों ने पुष्टि की है कि तसद्दुक हुसैन की ऐसी कोई संतान कभी नहीं रही।
- उपायुक्त (DC) राजौरी के माध्यम से पहचान पत्र और अन्य आधिकारिक डेटाबेस के सत्यापन में भी उक्त नाम का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला।
- याचिका खारिज और परजरी की कार्यवाही (अप्रैल से सितंबर 2026):
- 9 अप्रैल 2026: उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता के गैर-हाजिर रहने और दावों के झूठे पाए जाने पर मूल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को खारिज कर दिया।
- हालांकि, अदालत ने न्यायिक प्रक्रिया से खिलवाड़ करने वाले व्यक्ति को यूं ही छोड़ने के बजाय झूठी गवाही (Perjury) और धोखाधड़ी के तहत आपराधिक मुकदमा चलाने के लिए पत्रावली को जीवित रखा।
- 17 सितंबर 2026: अंततः अदालत ने आपराधिक परिवाद दर्ज करने का औपचारिक आदेश जारी किया।
विधिक प्रासंगिकता एवं स्थापित न्यायिक सिद्धांत
- बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) रिट की पवित्रता:
- बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा का सबसे शक्तिशाली संवैधानिक अस्त्र है।
- निजी रंजिशों, संपत्ति विवादों या पुलिस को दबाव में लाने के लिए इसका फर्जी इस्तेमाल न्यायपालिका के लिए एक गंभीर खतरे के रूप में देखा जाता है।
- झूठी गवाही और न्यायिक अवमानना (Perjury & Abuse of Process):
- दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 340 / भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 379 के तहत अदालतों का यह वैधानिक कर्तव्य है कि जब कोई व्यक्ति न्यायिक कार्यवाही में झूठी गवाही देता है या फर्जी दस्तावेज दाखिल करता है, तो न्याय के व्यापक हित में उसके खिलाफ संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष औपचारिक परिवाद दाखिल किया जाए।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: शबीना कौसर मार्फत तसद्दुक हुसैन बनाम जम्मू-कश्मीर यूटी व अन्य [HCP संख्या 61/2023 – जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय, जम्मू पीठ]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- जम्मू-कश्मीर यूटी प्रशासन (प्रतिवादी) की ओर से: भानु जसरौतिया, सरकारी अधिवक्ता (Government Advocate)
- याचिकाकर्ता की ओर से: पूर्व में अधिवक्ता उपस्थित; अंतिम चरणों में अनुपस्थित
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 226 (बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट – Habeas Corpus)
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS):
- धारा 216 एवं 217 (लोक सेवक को क्षति पहुंचाने के आशय से झूठी सूचना देना)
- धारा 227 एवं 229 (न्यायिक कार्यवाही में झूठे साक्ष्य देना व गढ़ना / Perjury)
- धारा 233, 236 एवं 237 (न्यायिक प्रक्रिया को बाधित करने हेतु मिथ्या दावे और शपथ पत्र)
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 379 / CrPC की धारा 340 (न्याय प्रशासन के विरुद्ध अपराधों में अदालती परिवाद की प्रक्रिया)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- के.डी. शर्मा बनाम सेल (SAIL) (2008, सुप्रीम कोर्ट) — ‘यदि कोई वादकारी अदालत से तथ्यों को छिपाता है या झूठे साक्ष्य गढ़कर न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करता है, तो अदालत को न केवल उसकी याचिका खारिज करनी चाहिए बल्कि उसके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू करनी चाहिए।’
- मुथु करुप्पन बनाम परिपोर्नम (2010, सुप्रीम कोर्ट) — ‘न्यायपालिका की गरिमा और प्रभावकारिता इस बात पर टिकी है कि लोग अदालतों में सच बोलें; झूठी गवाही (Perjury) देने वालों पर मुकदमा चलाना विधि के शासन की रक्षा के लिए अपरिहार्य है।’
- पीठ: न्यायमूर्ति संजय धर (जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय, जम्मू पीठ)
- अंतिम निर्णय: मूल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज; रजिस्ट्रार (ज्यूडिशियल), जम्मू को आदेश दिया गया कि वह तसद्दुक हुसैन के विरुद्ध सीजेएम जम्मू के समक्ष बीएनएस की सुसंगत धाराओं में तुरंत आपराधिक परिवाद दर्ज कराएं।
Non-Existent Matter: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय (High Court of J&K and Ladakh) |
| पीठ | न्यायमूर्ति संजय धर |
| याचिकाकर्ता (आरोपी) | तसद्दुक हुसैन (निवासी: राजौरी) |
| दावा | पुलिस ने उसकी बेटी “शबीना कौसर” को जबरन अवैध हिरासत में रखा हुआ है। |
| सच्चाई (जांच रिपोर्ट) | शबीना कौसर नाम की कोई बेटी अस्तित्व में ही नहीं है। |
| अदालत का आदेश | BNS, 2023 के तहत झूठी गवाही और कोर्ट को गुमराह करने पर आपराधिक मुकदमा (Criminal Complaint) दर्ज करने का निर्देश। |

