Tuesday, September 29, 2026
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CEC Power: क्या आयोग में शक्तियों का प्रगतिशील केंद्रीकरण हो रहा है?; अन्य दोनों चुनाव आयुक्तों की 14 लिखित आपत्तियों के बावजूद एकतरफा फैसले कैसे लिए गए?

याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई प्रमुख राहतें (Reliefs Sought)

  • कुओ वारंटो (Quo Warranto) की रिट: CEC ज्ञानेश कुमार से स्पष्टीकरण मांगा जाए कि उन्होंने किस अधिकार से सामूहिक शक्तियों का एकतरफा प्रयोग किया।
  • CEC का अंतरिम निलंबन: सुप्रीम कोर्ट में अंतिम सुनवाई तक CEC को कामकाज से अलग रखा जाए और आयोग का संचालन दोनों चुनाव आयुक्तों की सर्वसम्मति से कराया जाए।
  • फैसलों को अमान्य (Void ab initio) घोषित करना: विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े सभी एकतरफा फैसलों और कार्यवाहियों को गैर-कानूनी घोषित कर रद्द किया जाए।
  • प्राथमिक रिकॉर्ड की जब्ती और जांच: ECI के डिजिटल लॉग, मिनट्स ऑफ मीटिंग, फाइलों के नोटिंग्स और सर्वर लॉग्स को सुरक्षित रखवाया जाए और किसी सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट जज की अध्यक्षता में SIT/न्यायिक आयोग गठित कर जांच कराई जाए।

नई दिल्ली: भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के आंतरिक निर्णय-प्रक्रिया तंत्र, बहु-सदस्यीय संस्थागत संतुलन और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के विधिक अधिकार क्षेत्र को लेकर देश की शीर्ष अदालत में एक अभूतपूर्व संवैधानिक संकट पहुंच गया है।

याचिका में ‘क्वो वारंटो’ (Quo Warranto – अधिकार पृच्छा) की रिट जारी करने की मांग की गई है, जिसके तहत सीईसी ज्ञानेश कुमार से यह पूछा जाए कि वे किस कानूनी प्राधिकार (Authority of Law) के तहत यह मानकर कार्य कर रहे हैं कि वे व्यक्तिगत रूप से उस सामूहिक शक्ति का प्रयोग करने के हकदार हैं जो संविधान के अनुच्छेद 324 द्वारा पूर्ण आयोग (Commission as a body) में निहित की गई है। सर्वोच्च न्यायालय में संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत एक रिट याचिका दायर कर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार द्वारा साथी चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—की सहमति के बिना एकतरफा (Unilateral) निर्णय लेने का आरोप लगाया गया है।

अधिवक्ता सुदीप चंद्रा द्वारा तैयार और एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड (AoR) मुदित गुप्ता के माध्यम से दायर इस जनहित याचिका में अंतरिम राहत के रूप में सीईसी ज्ञानेश कुमार को अंतिम सुनवाई तक कार्य करने से निलंबित (Suspend) करने, आयोग के प्राथमिक डिजिटल व भौतिक रिकॉर्ड तलब करने, सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट जज की अध्यक्षता में न्यायिक जांच आयोग/SIT गठित करने और विशेष सघन पुनरीक्षण (SIR) की संपूर्ण प्रक्रिया को प्रारंभ से ही शून्य (Void ab initio) घोषित करने की मांग की गई है।

जनहित याचिका (PIL) के मुख्य संवैधानिक एवं विधिक आधार

1. अनुच्छेद 324(1) बनाम अनुच्छेद 324(3): ‘चेयरमैन’ पूरी संस्था नहीं होता

याचिका में इस बुनियादी संवैधानिक सिद्धांत पर बल दिया गया है:

  • सामूहिक निकाय में शक्तियां: भारत के संविधान का अनुच्छेद 324(1) निर्वाचनों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति किसी एक व्यक्ति में नहीं, बल्कि “एक आयोग” (A Commission) में निहित करता है।
  • चेयरमैन का पद: यद्यपि अनुच्छेद 324(3) मुख्य चुनाव आयुक्त को आयोग का ‘अध्यक्ष’ (Chairman) बनाता है, परंतु संस्था के अध्यक्ष पद को स्वयं पूरी संस्था के बराबर नहीं माना जा सकता। वे आयोग के अन्य सदस्यों के बीच ‘समानों में प्रथम’ (First Among Equals) हैं, उन्हें कोई विशेषाधिकार या वीटो पावर प्राप्त नहीं है।

2. 2023 के अधिनियम की धारा 18 का उल्लंघन और ‘बहुमत का नियम’

  • याचिका में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 की धारा 18 का हवाला दिया गया है:
    • धारा 18 यह स्पष्ट रूप से विहित करती है कि निर्वाचन आयोग का कार्यभार, जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति (Unanimously) से निपटाया जाएगा।
    • जहां सीईसी और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच किसी विषय पर मतभेद हो, वहां निर्णय बहुमत की राय (Opinion of the Majority) के अनुसार ही लिया जाएगा।
  • याचिकाकर्ता का तर्क है कि जब दो आयुक्त (संधू और जोशी) किसी कदम पर औपचारिक रूप से असहमत थे, तो बहुमत का नियम उन दोनों के पक्ष में था। इसके विपरीत, उनकी आपत्तियों को दरकिनार कर आदेश जारी करना विधायी प्रावधानों का सीधा उल्लंघन है।

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दो चुनाव आयुक्तों की 14 समकालीन आपत्तियां (Contemporaneous Objections)

याचिका में उल्लेख किया गया है कि अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच दोनों चुनाव आयुक्तों ने आयोग के नाम पर लिए गए उन निर्णयों पर कम से कम 14 विशिष्ट आपत्तियां आधिकारिक फाइलों पर दर्ज कराईं, जो बिना आयोग की बैठक या पूर्ण अनुमोदन के लागू कर दिए गए थे:

  1. फॉर्म-6 (Form 6) में अनधिकृत डिजिटल बदलाव:
    • जुलाई 2026 में निर्वाचकों का रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 के तहत वैधानिक फॉर्म-6 में ECINet पोर्टल पर यह शर्त जोड़ दी गई कि नए मतदाता यह बताएं कि क्या वे, उनके माता-पिता या दादा-दादी पिछली एसआईआर की सूची में मौजूद थे।
    • 16 मई 2026: आयुक्त विवेक जोशी ने फाइल पर आपत्ति दर्ज की कि नियमों में औपचारिक संशोधन किए बिना फॉर्म-6 को बदला नहीं जा सकता।
    • 19 मई 2026: आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने इस आपत्ति का औपचारिक समर्थन किया।
    • 13 अगस्त 2026: आपत्तियों के बावजूद फॉर्म लागू होने पर आयुक्त संधू ने एक कड़ा नोट दर्ज कर इसे “अनधिकृत एवं अवैध” (Unauthorised and illegal) करार दिया और इसे तुरंत वापस लेने का निर्देश दिया।
  2. डेटाबेस का ‘प्रगतिशील केंद्रीकरण’ (Centralisation of Database):
    • 29 मई 2026: आयुक्त जोशी ने मतदाता सूची डेटाबेस के धीरे-धीरे हो रहे केंद्रीकरण पर चिंता जताई और तीसरे पक्ष के अनधिकृत क्रेडेंशियल्स की जांच हेतु तकनीकी ऑडिट की मांग की।
    • 14 अगस्त 2026: आयुक्त संधू ने रिकॉर्ड किया कि राज्य स्तरीय वैधानिक निर्वाचन अधिकारियों को ERONet पोर्टल की पूरी पहुंच नहीं दी जा रही है। उन्होंने दर्ज किया कि आईटी महानिदेशक (DG-IT) के पास वैधानिक अधिकारियों की पहुंच को सीमित करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
  3. पश्चिम बंगाल अपीलीय अधिकरणों में 16.10 लाख अपीलें:
    • पश्चिम बंगाल में न्यायिक अधिकारियों द्वारा मतदाता सूची में शामिल करने के आदेशों के विरुद्ध चुनाव आयोग के नाम पर लगभग 16.10 लाख अपीलें दायर की गईं।
    • 12 अगस्त 2026: आयुक्त संधू ने फाइल पर सवाल उठाया: “चुनाव आयोग की ओर से इन अपीलों को दायर करने के लिए किसने और किसके द्वारा प्राधिकृत किया गया था?” (Who was authorised to file these appeals on behalf of ECI, and by whom?)।

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याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई प्रमुख कानूनी राहतें (Reliefs Sought)

  • क्वो वारंटो (Quo Warranto) की रिट: सीईसी ज्ञानेश कुमार से यह स्पष्टीकरण मांगा जाए कि वे किस कानूनी अधिकार के तहत अनुच्छेद 324 की सामूहिक शक्तियों का व्यक्तिगत रूप से प्रयोग कर रहे हैं।
  • एकतरफा आदेशों की अमान्यता: यह घोषित किया जाए कि निर्वाचन आयोग का कोई भी आदेश, निर्देश, पत्र या अपील तब तक मान्य नहीं है जब तक कि वह धारा 18 के अनुसार सर्वसम्मति या बहुमत के निर्णय द्वारा समर्थित न हो।
  • अंतरिम निलंबन: मुकदमे के अंतिम निस्तारण तक ज्ञानेश कुमार को सीईसी के रूप में कार्य करने से रोका जाए और उस अवधि में आयोग का कार्य दोनों चुनाव आयुक्तों (संधू और जोशी) के सर्वसम्मत निर्णयों से संचालित कराया जाए।
  • अभिलेखों का संरक्षण: आयोग के भौतिक और डिजिटल रिकॉर्ड—जिनमें कार्यसूची (Agendas), कार्यवृत्त (Minutes), फाइल नोटिंग्स, अनुमोदन पत्रक, सर्वर लॉग्स और ऑडिट ट्रेल्स शामिल हैं—को तुरंत सुरक्षित और अदालत में प्रस्तुत करने का निर्देश दिया जाए।
  • SIR प्रक्रिया को शून्य घोषित करना: विशेष सघन पुनरीक्षण (SIR) और इसके तहत की गई सभी कार्यवाहियों को विधिक अधिकारिता के अभाव में प्रारंभ से ही अमान्य (Void ab initio) घोषित किया जाए।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: राकेश कुमार सिंह बनाम भारत संघ, भारत निर्वाचन आयोग व अन्य [रिट याचिका (सिविल) – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
  • याचिका का प्रारूप व प्रस्तुति:
    • याचिका का आलेखन: अधिवक्ता सुदीप चंद्रा
    • एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड (AoR): मुदित गुप्ता
  • प्रासंगिक संवैधानिक एवं सांविधिक प्रावधान:
    • भारत का संविधान – अनुच्छेद 32 (मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु रिट क्षेत्राधिकार)
    • भारत का संविधान – अनुच्छेद 324(1) से 324(3) (निर्वाचन आयोग का गठन, अधीक्षण, निर्देशन व नियंत्रण की शक्तियां)
    • मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 की धारा 18 (कार्य संचालन, सर्वसम्मति एवं बहुमत का नियम)
    • निर्वाचकों का रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 (Registration of Electors Rules, 1960) के नियम व प्रपत्र (फॉर्म-6)
  • संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
    • टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ (1995, सुप्रीम कोर्ट 5-जज संविधान पीठ) — ‘निर्वाचन आयोग एक बहु-सदस्यीय संस्था है; मुख्य चुनाव आयुक्त को अन्य चुनाव आयुक्तों पर कोई वीटो या वरिष्ठ न्यायिक दर्जा प्राप्त नहीं है; आयोग के सभी फैसले विचार-विमर्श और बहुमत से ही लिए जाने चाहिए।’
    • एस.एस. धनोआ बनाम भारत संघ (1991, सुप्रीम कोर्ट) — ‘बहु-सदस्यीय निर्वाचन आयोग में शक्तियों का संकेंद्रण किसी एक पद में नहीं हो सकता; सामूहिक उत्तरदायित्व ही स्वतंत्र चुनाव तंत्र की नींव है।’
    • मोहिंदर सिंह गिल बनाम मुख्य चुनाव आयुक्त (1978, सुप्रीम कोर्ट) — ‘अनुच्छेद 324 की शक्तियां विधि के शासन (Rule of Law) और प्राकृतिक न्याय के अधीन हैं, वे किसी पदाधिकारी की व्यक्तिगत मर्जी से संचालित नहीं हो सकतीं।’
  • वर्तमान स्थिति: याचिका सर्वोच्च न्यायालय में दायर; शीर्ष अदालत द्वारा रजिस्ट्री जांच के उपरांत इसे प्रारंभिक सुनवाई और औपचारिक नोटिस हेतु सूचीबद्ध किया जाना प्रतीक्षित है।

CEC Power:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
याचिकाकर्ताराकेश कुमार सिंह (संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत याचिका)
प्रतिवादीकेंद्र सरकार, भारत निर्वाचन आयोग एवं मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार
मुख्य आरोपदोनों चुनाव आयुक्तों की असहमति के बावजूद ECI के नाम पर 14 से अधिक एकतरफा फैसले लेना।
मांगी गई मुख्य राहतQuo Warranto की रिट जारी करना; फैसले रद्द करना; CEC का निलंबन; और SIT/न्यायिक जांच आयोग का गठन।
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