विवाद के मुख्य कारण और कानूनी बारीकियां
1. जिस फॉर्म को सुप्रीम कोर्ट ने देखा, वह मौजूदा फॉर्म से अलग था
- बिहार मामला (Annexure D): सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई 2026 के अपने फैसले में जिस घोषणा पत्र का संज्ञान लिया था, वह जून 2025 में बिहार SIR के लिए जारी ‘Annexure D’ था। उसमें मुख्य रूप से आयु, सामान्य निवास स्थान और नागरिकता की बुनियादी पुष्टि मांगी गई थी।
- मौजूदा नया बदलाव: ECI ने बाद के चरणों (जैसे जुलाई-अगस्त 2026) में फॉर्म 6 घोषणा पत्र को और कड़ा बना दिया, जिसमें आवेदकों को अपने या अपने माता-पिता के पिछले SIR (समीक्षा) के विधानसभा क्षेत्र, पोलिंग बूथ और सीरियल नंबर जैसे विवरण देना अनिवार्य कर दिया गया।
- अंतर: कोर्ट ने इस नए और जटिल स्वरूप की वैधता पर कभी प्रत्यक्ष रूप से विचार ही नहीं किया था।
2. सुप्रीम कोर्ट का अधिकार क्षेत्र: “सीमित अधिकार” (Unbounded Discretion)
- सुप्रीम COURT ने स्वीकार किया था कि SIR प्रक्रिया के लिए आवश्यक दस्तावेज तय करने में ECI के पास कुछ अवशिष्ट शक्तियां (Residual Powers) हैं।
- हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि ECI की यह शक्ति असीमित नहीं है। किसी भी नए नियम का मौजूदा वैधानिक ढांचे (Statutory Framework) के साथ सीधा संबंध (Rational Nexus) होना अनिवार्य है।
3. चुनाव आयोग के भीतर ही उठे आंतरिक विरोध के स्वर
- विवेक जोशी (Election Commissioner): मई 2026 में ही (कोर्ट के फैसले से ठीक पहले) आपत्ति जताई थी कि नियम 1960 (Registration of Electors Rules, 1960) में केंद्र सरकार द्वारा संशोधन किए बिना ‘फॉर्म 6’ का मूल स्वरूप खुद ECI नहीं बदल सकता।
- सुखबीर सिंह संधू (Election Commissioner): 13 अगस्त 2026 को फैसले के बाद भी अपनी असहमति दर्ज कराई और इस बदलाव को “अनधिकृत और अवैध” (Unauthorised & Illegal) बताते हुए तुरंत हटाने की मांग की।
नई दिल्ली: नए मतदाताओं के पंजीकरण हेतु फॉर्म 6 (Form 6) के साथ विशेष सघन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) से जुड़ी अतिरिक्त घोषणा (Declaration) संलग्न करने के मुद्दे पर भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के रुख और सर्वोच्च न्यायालय के 27 मई 2026 के फैसले के बीच गहरा विधिक विरोधाभास सामने आया है।
शीर्ष अदालत ने बिहार मतदाता सूची पुनरीक्षण मामले में यद्यपि यह माना था कि आयोग के पास मतदाता सूचियों को अधिक सुदृढ़ बनाने हेतु आवश्यक दस्तावेजों के निर्धारण का कुछ प्रशासनिक विवेक (Administrative Discretion) है, परंतु अदालत ने यह स्पष्ट चेतावनी भी दी थी कि यह शक्ति “असीमित” (Not Unbounded) नहीं है और इसे मौजूदा सांविधिक ढांचे के भीतर ही संचालित होना चाहिए। अदालत ने फॉर्म 6 में संशोधन अथवा अनिवार्य घोषणा पत्र की संवैधानिक व विधिक वैधता की प्रत्यक्ष जांच कभी नहीं की थी। चुनाव आयोग द्वारा यह दावा किया गया कि सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म 6 के साथ घोषणा पत्र एकत्र करने के उसके निर्णय का समर्थन किया है, परंतु शीर्ष अदालत की टिप्पणियों और कानूनी ढांचे के सूक्ष्म परीक्षण से यह दावा विधिक रूप से पूरी तरह असमर्थनीय (Untenable) प्रतीत होता है।
आयोग के भीतर मतभेद और विधिक आपत्ति का कालक्रम (Internal Objections)
इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि चुनाव आयोग के पूर्ण पैनल (Full Commission) के भीतर ही दो वरिष्ठ चुनाव आयुक्तों ने इस प्रक्रियात्मक बदलाव को वैधानिक नियमों के विपरीत बताया था:
- चुनाव आयुक्त विवेक जोशी की पूर्व आपत्ति (16 मई 2026)
- सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से पहले ही, 16 मई 2026 को चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने फाइल पर आधिकारिक आपत्ति दर्ज कराई थी।
- उन्होंने स्पष्ट लिखा कि फॉर्म 6 और फॉर्म 8 निर्वाचकों का रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 (Registration of Electors Rules, 1960) के तहत सांविधिक रूप से विहित (Statutorily Prescribed) प्रपत्र हैं।
- किसी प्रशासनिक आदेश या एसआईआर दिशा-निर्देश के जरिए सांविधिक फॉर्म को नहीं बदला जा सकता; ऐसा कोई भी बदलाव केवल केंद्र सरकार (विधि एवं न्याय मंत्रालय) द्वारा नियमों में विधिवत संशोधन और संसदीय संवीक्षा (Parliamentary Scrutiny) के माध्यम से ही संभव है।
- 19 मई 2026 को चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने भी इस विधिक आपत्ति का लिखित समर्थन किया था।
- सुप्रीम कोर्ट का फैसला (27 मई 2026) और उसके बाद का घटनाक्रम
- 27 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने बिहार एसआईआर मामले में फैसला सुनाया।
- इसके बावजूद आयोग के आईटी विंग द्वारा ECINet पोर्टल पर ऑनलाइन फॉर्म 6 में अतिरिक्त घोषणा पत्र जोड़ दिया गया, जिसमें नए मतदाताओं से यह अनिवार्य रूप से पूछा जाने लगा कि क्या उनका, उनके माता-पिता या दादा-दादी का नाम 2000 के दशक के पूर्ववर्ती एसआईआर की मतदाता सूची में दर्ज था या नहीं।
- चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू का कड़ा विरोध (13 अगस्त 2026)
- फैसले के बाद जब ऑनलाइन पोर्टल पर यह बदलाव नहीं हटाया गया, तो चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने 13 अगस्त 2026 को आधिकारिक नोट जारी किया।
- उन्होंने पोर्टल पर किए गए इस बदलाव को “अनधिकृत एवं अवैध” (Unauthorised and Illegal) करार देते हुए तुरंत हटाने की मांग की, ताकि 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले पात्र युवा और पहली बार पंजीकरण कराने वाले मतदाता किसी अनावश्यक प्रशासनिक उत्पीड़न या मताधिकार से वंचित होने के जोखिम से बच सकें।
Election Form:सुप्रीम कोर्ट का वास्तविक फैसला: विवेकाधिकार ‘असीमित नहीं’
चुनाव आयोग अपनी स्थिति के समर्थन में जिस फैसले का हवाला दे रहा है, उसमें सर्वोच्च न्यायालय ने अत्यंत संतुलित और सतर्क दृष्टिकोण अपनाया था:
- सांविधिक सीमाओं के अधीन विवेक:न्यायालय ने रेखांकित किया था कि विशेष सघन पुनरीक्षण (SIR) की आवश्यकताओं के अनुरूप प्रलेखन ढांचा (Documentation Framework) तैयार करने का कुछ अधिकार आयोग के पास है, परंतु यह अधिकार “असीमित” (Not Unbounded) नहीं है।
- दस्तावेजी संतुलन का सिद्धांत:अदालत ने कहा था:“प्रलेखन व्यवस्था के निर्माण में सांविधिक ढांचे (Statutory Framework) से सामंजस्य का एक नपा-तुला संतुलन प्रतिबिंबित होना चाहिए, ताकि मतदाता सूची की सटीकता और अखंडता सुनिश्चित करने के उद्देश्य की पूर्ति के साथ-साथ कानून के दायरे का उल्लंघन न हो।”
- घोषणा पत्र की वैधता अनिर्णीत:सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष मुख्य विचारणीय प्रश्न यह था कि क्या मतदाता सूची के पुनरीक्षण में पहचान सत्यापन हेतु आधार (Aadhaar) या अन्य विशिष्ट सरकारी दस्तावेजों को स्वीकार किया जा सकता है। अदालत ने फॉर्म 6 के विधिक स्वरूप में बदलाव करने अथवा उसके साथ पूर्वजों की प्रविष्टि संबंधी घोषणा पत्र थोपने की वैधानिक वैधता पर कोई अंतिम मोहर नहीं लगाई थी।
सांविधिक ढांचा: संसद और नियम बनाने की शक्ति (Rule-Making Power)
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 28
- मतदाता सूचियों के निर्माण और प्रपत्रों के निर्धारण हेतु नियम बनाने की अनन्य शक्ति केंद्र सरकार (विधि एवं न्याय मंत्रालय) के पास है, जो निर्वाचन आयोग के परामर्श से और संसद के दोनों सदनों की संवीक्षा के अधीन बनाई जाती है।
- निर्वाचकों का रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 (Registration of Electors Rules, 1960)
- फॉर्म 6 इन नियमों का एक वैधानिक अंग है।
- जब वर्ष 2021-22 में स्वैच्छिक आधार पर पहचान सत्यापन हेतु आधार संख्या एकत्र करने का प्रावधान लाया गया था, तब भी आयोग ने इसे सीधे नहीं जोड़ा था, बल्कि विधि मंत्रालय की आधिकारिक अधिसूचना (17 जून 2022) के माध्यम से नियमों और फॉर्म 6 में औपचारिक संशोधन किया गया था।
- अनुच्छेद 324 की अंतर्निहित सीमाएं
- संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की व्यापक शक्तियां प्रदान करता है।
- हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठों (मोहिंदर सिंह गिल, ए.सी. जोस) ने बार-बार स्पष्ट किया है कि अनुच्छेद 324 कोई निरंकुश या अनियंत्रित शक्ति नहीं है। जहां संसद द्वारा बनाया गया कानून या वैधानिक नियम पहले से मौजूद हैं, वहां आयोग इन नियमों को दरकिनार कर अपने प्रशासनिक आदेशों से समानांतर वैधानिक प्रपत्र नहीं बना सकता।
विधिक एवं प्रशासनिक सारांश
- आयोग की स्थिति: आयोग का दावा है कि एसआईआर अवधि के लिए यह घोषणा पत्र मतदाता सूची की प्रामाणिकता जांचने के लिए है और गैर-एसआईआर अवधि में सामान्य फॉर्म 6 ही लागू रहेगा।
- विधिक स्थिति: यह द्विभाजन (Bifurcation) वैधानिक नियमों में मौजूद नहीं है। जब तक केंद्र सरकार निर्वाचकों का रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 में औपचारिक संशोधन नहीं करती, तब तक फॉर्म 6 में किसी भी नए घोषणा पत्र की अनिवार्यता प्रशासनिक सीमाओं का अतिक्रमण और न्यायिक निर्णय की त्रुटिपूर्ण व्याख्या मानी जाएगी।
Election Form: फॉर्म 6 में क्या बदलाव हुए? (तुलनात्मक विवरण)
| बिंदु | वैधानिक फॉर्म 6 (1960 नियम) | बिहार SIR घोषणा पत्र (2025) | नया विवादित घोषणा पत्र (2026) |
| नियम का आधार | केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित नियम | ECI द्वारा जारी प्रशासनिक आदेश (Annexure D) | ECI ऑनलाइन पोर्टल (ECINet) में जोड़ा गया फॉर्म |
| मांगी गई जानकारी | नाम, जन्मतिथि, पता, नागरिकता | जन्म अवधि ब्रैकेट, माता-पिता की नागरिकता प्रमाण | पिछले SIR का बूथ संख्या, क्रमिक संख्या और रिश्तेदार का विवरण |
| सुप्रीम कोर्ट की स्थिति | कानूनी रूप से मान्य | मई 2026 में सशर्त सहमति दी गई | अदालत के समक्ष कभी प्रस्तुत ही नहीं हुआ |

