मामले की पृष्ठभूमि और याचिकाओं के मुख्य बिंदु
1. पहली याचिका: सिस-पुरुषों के फिटनेस मानदंडों का विरोध
- सितंबर 2022 की भर्ती अधिसूचना को चुनौती: याचिकाकर्ताओं ने 2022 की सशस्त्र पुलिस कांस्टेबल भर्ती में भाग लिया था। उन्होंने लिखित परीक्षा पास कर ली थी, लेकिन शारीरिक मानक परीक्षण (PST) और शारीरिक दक्षता परीक्षण (PET) में उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया गया।
- अव्यावहारिक मापदंड: याचिकाकर्ताओं को 6 मिनट 30 सेकंड में 1,600 मीटर की दौड़, लंबी कूद/ऊंची कूद और शॉट-पुट जैसे कठोर मानकों को पूरा करने को कहा गया, जो सिस-पुरुषों के लिए तय किए गए हैं।
- नियम 9(1D) का उल्लंघन: 2021 के संशोधन के तहत कर्नाटक सिविल सेवा नियमों के नियम 9(1D) में ट्रांसजेंडरों के लिए 1% क्षैतिज आरक्षण (Horizontal Reservation) और आवेदनों में ‘Others’ (अन्य) श्रेणी का प्रावधान किया गया था। लेकिन भर्ती में उन्हें ‘Male Transgender’ श्रेणी में प्रतिस्पर्धा करने पर मजबूर किया गया।
- KSAT के फैसले को चुनौती: कर्नाटक राज्य प्रशासनिक न्यायाधिकरण (KSAT) ने 2 जून 2026 को याचिकाकर्ताओं की अर्जी खारिज करते हुए कहा था कि ट्रांसजेंडर होने के आधार पर शारीरिक मापदंडों में ढील नहीं दी जा सकती। याचियों का तर्क है कि बिना उचित समायोजन (Reasonable Accommodation) के आरक्षण का लाभ अर्थहीन हो जाता है।
2. दूसरी याचिका: विशेष पुलिस बलों से पूर्ण निष्कासन
- 10 अक्टूबर 2025 का सरकारी निर्देश: याचिकाकर्ताओं ने राज्य सरकार के उस निर्देश को चुनौती दी है, जिसके तहत ट्रांसजेंडरों को कर्नाटक राज्य रिजर्व पुलिस (KSRP), इंडियन रिजर्व बटालियन (IRB), सशस्त्र रिजर्व (KARP) और कर्नाटक राज्य औद्योगिक सुरक्षा बल (KSISF) की भर्तियों से पूरी तरह बाहर कर दिया गया।
- जून व जुलाई 2026 की अधिसूचनाएं रद्द करने की मांग: याचियों का कहना है कि एक तरफ नियम 1% आरक्षण प्रदान करते हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार ऐसी शर्तें या पूर्ण प्रतिबंध लगा देती है जिससे पद हासिल करना व्यावहारिक रूप से असंभव हो जाता है।
अदालत के समक्ष मुख्य तर्क
- याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व कर रही समता लॉ (Samata Law) की वकील अवनी चोकशी, शिल्पा प्रसाद, सय्यदा सबा व अन्य ने तर्क दिया कि यदि ट्रांसजेंडरों को केवल आवेदन करने की अनुमति दी जाती है, लेकिन उन्हें सिस-पुरुषों के लिए डिज़ाइन किए गए परीक्षणों से गुजरना पड़ता है, तो यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समता का अधिकार), 19 और 21 का उल्लंघन है।
- सरकार उन पदों के लिए आरक्षण की घोषणा करके साथ ही ऐसी अव्यवहारिक शर्तें लागू नहीं कर सकती जो प्रवेश को रोकती हों।
बेंगलुरु: कर्नाटक सिविल सेवा (सामान्य भर्ती) नियम, 1977 के नियम 9(1D) (2021 संशोधन द्वारा ट्रांसजेंडर व्यक्तियों हेतु प्रदत्त 1% क्षैतिज/हॉरिजॉन्टल आरक्षण), ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 (Transgender Persons Act, 2019), भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता एवं गैर-मनमानापन), अनुच्छेद 16 (सार्वजनिक नियोजन में समान अवसर) व अनुच्छेद 21 (लैंगिक पहचान व मानवीय गरिमा का अधिकार), उचित अनुकूलन का सिद्धांत (Doctrine of Reasonable Accommodation), तथा राज्य रिजर्व पुलिस (KSRP) व औद्योगिक सुरक्षा बल (KSISF) से ट्रांस समुदाय के पूर्ण बहिष्कार की वैधानिकता पर कर्नाटक हाईकोर्ट में एक अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक वाद प्रारंभ हुआ है।
सात ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (विकाश जे., जगदीश उदय बोडकी, गिरीश सी.एम., दिलीप के., शिवराज एम. नायकौडी, शशिकुमार एवं देविंद्रप्पा) ने कर्नाटक प्रशासनिक न्यायाधिकरण (KSAT) के 2 जून 2026 के प्रतिकूल आदेश को चुनौती देते हुए तथा राज्य पुलिस भर्ती प्राधिकरण द्वारा जारी भेदभावपूर्ण अधिसूचनाओं के विरुद्ध कर्नाटक उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि राज्य सरकार एक तरफ कानून बनाकर ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को 1% आरक्षण देने का दावा करती है, किंतु भर्ती प्रक्रिया में ट्रांस-पुरुषों (Transmen) पर जन्मजात पुरुषों (Cisgender Males) के लिए बने कठोरतम शारीरिक मानदंड (जैसे 6 मिनट 30 सेकंड में 1600 मीटर दौड़, शॉटपुट, लंबी/ऊंची कूद) लागू कर उन्हें चयन से बाहर कर देती है। साथ ही, 10 अक्टूबर 2025 के एक सरकारी आदेश द्वारा उन्हें सशस्त्र बलों के पूरे संवर्गों से ही प्रतिबंधित कर दिया गया है।
दोनों रिट याचिकाओं के मुख्य विधिक आधार एवं उठाई गई मांगें
1. ‘उचित अनुकूलन (Reasonable Accommodation) के बिना आरक्षण मात्र छलावा’
याचिकाकर्ताओं की ओर से ‘समता लॉ’ (Samata Law) के अधिवक्ताओं ने पहली याचिका में 12 सितंबर 2022 की अधिसूचना संख्या 445 (सशस्त्र पुलिस कांस्टेबल भर्ती) को चुनौती देते हुए तर्क प्रस्तुत किया है:
- लिखित परीक्षा में सफलता, शारीरिक परीक्षण में अयोग्यता: सातों याचिकाकर्ताओं ने “पुरुष ट्रांसजेंडर” (Male Transgender) श्रेणी में आवेदन किया था, लिखित परीक्षा उत्तीर्ण की, किंतु बाद में उन्हें सिजेंडर पुरुषों के कठोर शारीरिक मानकों के आधार पर अयोग्य घोषित कर दिया गया।
- असंगत मानक: याचिकाकर्ताओं पर सामान्य पुरुषों के मानदंड थोपे गए—जैसे न्यूनतम ऊंचाई, सीने का फुलाव, और 6 मिनट 30 सेकंड में 1,600 मीटर दौड़, ऊंची कूद/लंबी कूद और शॉटपुट।
- सार्थक प्रतिनिधित्व का अभाव:“ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों को केवल आवेदन करने की अनुमति देना 1% आरक्षण का वास्तविक या सार्थक क्रियान्वयन नहीं है, यदि उन्हें बिना किसी शारीरिक छूट या विशेष अध्ययन के सिजेंडर पुरुषों के लिए तैयार किए गए पैमानों पर मापा जाए। सरकार एक हाथ से आरक्षण का लाभ देकर दूसरे हाथ से ऐसी शर्तें नहीं थोप सकती जो उस पद तक पहुंच को व्यावहारिक रूप से असंभव (Practically Unattainable) बना दें।”
2. नियम 9(1D) का उल्लंघन: “अन्य” (Others) के बजाय “पुरुष ट्रांसजेंडर” श्रेणी बनाना:
- याचिकाकर्ताओं का कहना है कि 2021 के संशोधन द्वारा KCSR के नियम 9(1D) में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए सामान्य योग्यता (GM), अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की सभी श्रेणियों में 1% क्षैतिज आरक्षण और आवेदन पत्रों में एक अलग “अन्य” (Others) श्रेणी का स्पष्ट अधिदेश दिया गया था।
- भर्ती अधिकारियों ने “अन्य” श्रेणी प्रदान करने के बजाय मनमाने ढंग से “पुरुष ट्रांसजेंडर” श्रेणी बनाकर उन्हें सिजेंडर पुरुषों के समूह में धकेल दिया, जो मूल नियम की भावना के विपरीत है।
3. KSRP, IRB और KSISF से ट्रांसजेंडर व्यक्तियों का पूर्ण बहिष्कार अवैध:
दूसरी याचिका में याचिकाकर्ताओं ने राज्य सरकार के 10 अक्टूबर 2025 के उस कार्यकारी निर्देश और जून व जुलाई 2026 की परिणामी भर्ती अधिसूचनाओं को चुनौती दी है, जिसके तहत ट्रांसजेंडर समुदाय को निम्नलिखित प्रमुख सुरक्षा बलों से पूरी तरह बाहर कर दिया गया:
- कर्नाटक राज्य रिजर्व पुलिस (KSRP)
- इंडियन रिजर्व बटालियन (IRB)
- कर्नाटक सशस्त्र रिजर्व (KARP)
- कर्नाटक राज्य औद्योगिक सुरक्षा बल (KSISF)
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि किसी भी कार्यकारी आदेश (Executive Order) द्वारा वैधानिक नियमों (KCSR Rule 9(1D)) के तहत प्रदत्त आरक्षण को छीना नहीं जा सकता और न ही पूरे संवर्ग से किसी विशेष लैंगिक वर्ग को वंचित किया जा सकता है।
KSAT का आदेश बनाम उच्च न्यायालय में संवैधानिक चुनौती
| चरण / मंच | तथ्यात्मक स्थिति एवं विधिक तर्क |
| कर्नाटक राज्य प्रशासनिक न्यायाधिकरण (KSAT) | KSAT ने 2 जून 2026 के अपने सामान्य आदेश में याचिकाकर्ताओं की अर्जियां यह कहते हुए खारिज कर दी थीं कि पुलिस बल में अनुशासन और कार्यकुशलता के लिए तय किए गए शारीरिक मानकों में केवल इसलिए ढील नहीं दी जा सकती क्योंकि अभ्यर्थी ट्रांसजेंडर समुदाय से संबंध रखते हैं। |
| उच्च न्यायालय में अपील का आधार | याचिकाकर्ताओं का कहना है कि KSAT यह समझने में विफल रहा कि ट्रांस-पुरुषों और सिजेंडर पुरुषों की जैविक व शारीरिक संरचना में अंतर होता है। जिस प्रकार महिला अभ्यर्थियों को पुरुषों की तुलना में कम दौड़ और अलग शारीरिक मानक दिए जाते हैं, उसी प्रकार ट्रांसजेंडर अभ्यर्थियों के लिए वैज्ञानिक व उचित मानदंड निर्धारित करना ‘उचित अनुकूलन’ (Reasonable Accommodation) का संवैधानिक दायित्व है। |
| प्रशासनिक प्रतिनिधित्व की उपेक्षा | याचिकाकर्ताओं ने भर्ती से पूर्व गृह विभाग और पुलिस महानिदेशक को विस्तृत ज्ञापन दिए थे कि उनके लिए विशेष शारीरिक मापदंड तय किए जाएं, किंतु उन पर कोई संज्ञान नहीं लिया गया। |
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- नालसा बनाम भारत संघ [(2014) 5 SCC 438] (NALSA Judgment):
- सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट व्यवस्था दी थी कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अपनी स्व-पहचानी गई लैंगिक पहचान (Self-identified Gender) का पूरा अधिकार है और राज्य का यह सकारात्मक दायित्व है कि वह उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए सार्वजनिक रोजगार में आरक्षण और रियायतें प्रदान करे।
- विकास कुमार बनाम संघ लोक सेवा आयोग [(2021) 5 SCC 370] — ‘उचित अनुकूलन’:
- न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ ने रेखांकित किया था कि वास्तविक समानता (Substantive Equality) प्राप्त करने के लिए राज्य को बाधाओं को दूर करना होगा।
- यदि राज्य दिव्यांगों या लैंगिक अल्पसंख्यकों को आरक्षण देता है, किंतु चयन की कसौटी सामान्य वर्ग के शारीरिक रूप से सक्षम या सिजेंडर व्यक्तियों के समान रखता है, तो यह ‘अप्रत्यक्ष भेदभाव’ (Indirect Discrimination) है। ट्रांस-व्यक्तियों को सिजेंडर मानकों पर आंकना उन्हें प्रक्रियात्मक रूप से बाहर करने का एक तंत्र बन जाता है।
- सशस्त्र बलों से पूर्ण निष्कासन और अनुच्छेद 16:
- KSRP, IRB और KSISF जैसी संपूर्ण शाखाओं से ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को बाहर रखना संविधान के अनुच्छेद 16(2) (केवल लिंग के आधार पर रोजगार में भेदभाव का निषेध) का उल्लंघन है। यदि महिला बटालियनों और महिलाओं को इन बलों में शामिल किया जा सकता है, तो ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए अवसर पूरी तरह बंद करना मनमाना और असंवैधानिक है।
विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता
- केस संदर्भ: विकाश जे. व 6 अन्य बनाम कर्नाटक राज्य, पुलिस महानिदेशक (DGP) व अन्य [रिट याचिकाओं का बैच – कर्नाटक उच्च न्यायालय]
- याचिकाकर्ताओं के नाम: विकाश जे., जगदीश उदय बोडकी, गिरीश सी.एम., दिलीप के., शिवराज एम. नायकौडी, शशिकुमार एवं देविंद्रप्पा (सात ट्रांसजेंडर अभ्यर्थी)
- चुनौतीपूर्ण आदेश/अधिसूचनाएं:
- कर्नाटक प्रशासनिक न्यायाधिकरण (KSAT) का आदेश दिनांक 02.06.2026
- पुलिस भर्ती अधिसूचना संख्या 445 दिनांक 12.09.2022 (सशस्त्र पुलिस कांस्टेबल)
- कर्नाटक सरकार का निर्देश दिनांक 10.10.2025 (KSRP, IRB, KARP, KSISF से बहिष्कार)
- अनुवर्ती भर्ती अधिसूचनाएं दिनांक 19.06.2026 एवं जुलाई 2026
विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ताओं की ओर से: समता लॉ (Samata Law) — अधिवक्ता अवनी चोकशी, शिल्पा प्रसाद, लालरोत फेली, शसोजा पटेल, संप्रीथा एस., सैयदा सबा, सहला नाचियल्ली, उषा आर.वी., मृदुला एवं हरिकृष्णन आर.
- प्रतिवादी (कर्नाटक राज्य व पुलिस भर्ती बोर्ड) की ओर से: महाधिवक्ता कार्यालय / शासकीय अधिवक्ता
- प्रासंगिक कानून एवं संवैधानिक प्रावधान:
- कर्नाटक सिविल सेवा (सामान्य भर्ती) नियम, 1977 — नियम 9(1D) (2021 संशोधन – ट्रांसजेंडर समुदाय हेतु 1% क्षैतिज आरक्षण)
- ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 — धारा 3 व धारा 9 (रोजगार में भेदभाव का प्रतिषेध)
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 14 (समता का अधिकार), अनुच्छेद 15 व अनुच्छेद 16 (भेदभाव का प्रतिषेध व अवसर की समानता), एवं अनुच्छेद 21
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- सारभूत समानता और शारीरिक अनुकूलन: ‘ट्रांसजेंडर आरक्षण को प्रभावी बनाने के लिए शारीरिक मानकों और सहनशक्ति परीक्षणों में उचित अनुकूलन और रियायतें देना अनिवार्य है; ट्रांस-पुरुषों पर सिजेंडर पुरुषों के कठोर मापदंड थोपना या उन्हें विशेष सुरक्षा बलों से पूरी तरह बाहर रखना वैधानिक आरक्षण को निरर्थक बनाना है।’
- वर्तमान स्थिति: कर्नाटक उच्च न्यायालय के समक्ष रिट याचिकाएं पंजीकृत; नोटिस जारी किए जाने और अंतरिम राहत पर विचार हेतु मामला शीघ्र ही रोस्टर पीठ के समक्ष सूचीबद्ध होगा।
Cisgender Men:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | कर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court) |
| याचिकाकर्ता | 7 ट्रांसजेंडर उम्मीदवार (समता लॉ के वकीलों द्वारा प्रतिनिधित्व) |
| प्रतिवादी | कर्नाटक राज्य सरकार एवं पुलिस भर्ती प्राधिकरण |
| संबंधित नियम | कर्नाटक सिविल सेवा (सामान्य भर्ती) नियम, 1977 का नियम 9(1D) (ट्रांसजेंडरों के लिए 1% क्षैतिज आरक्षण) |
| चुनौती का विषय | 1. ‘सशस्त्र पुलिस कांस्टेबल’ भर्ती में ट्रांसजेंडरों के लिए सिस-पुरुषों जैसे शारीरिक मापदंड थोपकर अयोग्य घोषित करना। 2. KSRP, IRB, KARP और KSISF जैसी पुलिस इकाइयों से ट्रांसजेंडरों को भर्ती से बाहर रखना। |
| मूल कानूनी प्रश्न | क्या उचित छूट/उचित समायोजन (Reasonable Accommodation) के बिना केवल आरक्षण देने से ट्रांसजेंडरों को समान अवसर का अधिकार मिलता है? |

