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मामले की पृष्ठभूमि: 2009 से जारी कानूनी लड़ाई और पुनः अवैध कब्जा
- 2009 का बेदखली मुकदमा और 2018 की डिक्री:विवाद की शुरुआत 2009 में हुई जब मकान मालिक ओंकार सिंह कालरा ने स्मॉल कॉज कोर्ट के समक्ष किराएदार तरलोक सिंह ठुकराल के कानूनी वारिसों के खिलाफ बेदखली का मुकदमा दायर किया। निचली अदालत ने जुलाई 2018 में किराएदारों को संपत्ति खाली करने का आदेश दिया।
- अपीलों का खारिज होना और डिक्री का निष्पादन:किराएदारों ने इस आदेश को विभिन्न पीठों में चुनौती दी, लेकिन अक्टूबर 2021 में उनकी अपील खारिज कर दी गई। इसके बाद जुलाई 2024 में सिविल रिवीजन याचिका और अक्टूबर 2024 में पुनर्विचार याचिका (Review Petition) भी हाईकोर्ट से खारिज हो गई। औपचारिक रूप से 17 अप्रैल 2025 को कोर्ट द्वारा बेदखली की डिक्री को निष्पादित (Execute) कर मकान मालिक को कब्जा दिला दिया गया।
- कब्जा वापस हथियाना और अवमानना का कृत्य:कानूनी प्रक्रिया से बेदखल किए जाने के बावजूद, प्रतिवादियों ने गुंडागर्दी के बल पर विवादित संपत्ति पर फिर से घुसकर अवैध कब्जा कर लिया। जब मकान मालिक ने इसके खिलाफ अवमानना याचिका दायर की, तो सुनवाई के दौरान प्रतिवादी महिला (मिंदर गुरमीत सिंह ठुकराल) और हरप्रीत सिंह गुरमीत सिंह ठुकराल ने जज के सामने उग्र रूप धारण कर लिया और पर्स फेंकने का प्रयास किया।
हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और ऐतिहासिक प्रसंग
1. “डिक्री मिलने के बाद शुरू होती है भारत में वादकारियों की असली मुश्किल”:
न्यायमूर्ति माधव जामदार ने इस मामले में प्रिवी काउंसिल (Privy Council) के 150 साल पुराने उस प्रसिद्ध ऐतिहासिक कथन को उद्धृत किया जो पहले के आदेश में भी संदर्भित किया गया था: “भारत में वादकारियों की असली कठिनाई कोर्ट से डिक्री (फैसला) हासिल करने के बाद शुरू होती है।”
जज ने टिप्पणी की कि यह मामला उस ऐतिहासिक कथन से भी एक कदम आगे निकल गया है, क्योंकि यहाँ मकान मालिक को अदालत द्वारा डिक्री निष्पादित कराकर कब्जा दिलवाए जाने के बाद भी विपक्षी द्वारा दोबारा अवैध रूप से बेदखल कर दिया गया।
2. “न्याय प्रशासन में सीधे हस्तक्षेप का मामला”:
हाईकोर्ट ने माना कि कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद फिर से कब्जा कर लेना और अदालत के भीतर जज पर हमला करने की कोशिश करना सीधे तौर पर न्याय प्रशासन (Administration of Justice) में बाधा डालना और उसे पंगु बनाना है।
मुंबई: भारत का संविधान के अनुच्छेद 215 (अभिलेख न्यायालय के रूप में उच्च न्यायालय की अवमानना हेतु दंडित करने की अंतर्निहित शक्ति), अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) की धारा 2(c) (आपराधिक अवमानना—अदालत कक्ष में प्रत्यक्ष अशोभनीय आचरण, न्यायिक पीठ पर हमला/वस्तुएं फेंकना व न्याय प्रशासन में बाधा), सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) का आदेश XXI (बेदखली डिक्री का निष्पादन), तथा आदेश XL नियम 1 (संपत्ति के संरक्षण हेतु कोर्ट रिसीवर की नियुक्ति) के विधिक मानकों पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक अभूतपूर्व घटना का संज्ञान लेते हुए कठोर आदेश पारित किया है।
बॉम्बे हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति माधव जामदार (Justice Madhav Jamdar) की एकल पीठ के समक्ष बेदखली विवाद (Eviction Dispute) से जुड़ी अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान एक महिला वादकारी (प्रतिवादी संख्या 4—मिंदर गुरमीत सिंह ठुकराल) ने न्यायिक डायस पर बैठे न्यायाधीश की ओर अपना पर्स फेंकने का प्रयास किया। साथ ही प्रतिवादी हरप्रीत सिंह गुरमीत सिंह ठुकराल द्वारा भी अदालत कक्ष में घोर अनुचित व्यवहार किया गया, जिसके बाद न्यायाधीश को सुरक्षाकर्मियों को बुलाकर उन्हें अदालत कक्ष से बाहर निकलवाना पड़ा।
न्यायमूर्ति माधव जामदार ने 27 अक्टूबर 2026 के अपने आदेश में इस अशोभनीय कृत्य को औपचारिक रूप से दर्ज करते हुए इसे प्रथम दृष्टया आपराधिक अवमानना माना और सभी प्रतिवादियों को 30 अक्टूबर 2026 को व्यक्तिगत रूप से अदालत में हाजिर होने का निर्देश दिया। अदालत ने 150 वर्ष पुरानी प्रिवी काउंसिल की प्रसिद्ध नजीर का उल्लेख करते हुए हैरानी जताई कि वर्ष 2018 में बेदखली डिक्री पारित होने और 17 अप्रैल 2025 को औपचारिक निष्पादन होने के बावजूद किरायेदारों ने विवादित परिसर पर दोबारा अवैध कब्जा कर लिया। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने विवादित संपत्ति का सांकेतिक कब्जा लेने के लिए कोर्ट रिसीवर (Court Receiver) नियुक्त कर दिया है।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां
1. ‘पर्स फेंकने का प्रयास और अशोभनीय व्यवहार स्पष्ट अवमानना है’
न्यायमूर्ति माधव जामदार ने अदालत कक्ष में घटित घटना को आदेश में दर्ज करते हुए कड़ा रुख अपनाया: “यह दर्ज किया जाना आवश्यक है कि इस न्यायालय के समक्ष प्रतिवादी संख्या 4 (मिंदर गुरमीत सिंह ठुकराल) ने पूरी तरह से अनुचित और अशोभनीय आचरण किया है, जो सीधे तौर पर अदालत की अवमानना (Contempt of Court) का गठन करता है। प्रतिवादी हरप्रीत सिंह गुरमीत सिंह ठुकराल का आचरण भी न्यायिक मर्यादा के प्रतिकूल रहा। अदालत की सुरक्षा को बुलाकर इन अनियंत्रित वादकारियों को कोर्ट रूम से बाहर ले जाना पड़ा।”
2. ‘150 वर्ष पूर्व प्रिवी काउंसिल ने कहा था—भारत में डिक्री के बाद असली परेशानी शुरू होती है’:
- पीठ ने निष्पादन प्रक्रिया की लाचारी और किरायेदारों की धृष्टता पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए ऐतिहासिक नजीर का उल्लेख किया:*”प्रिवी काउंसिल ने लगभग 150 वर्ष पूर्व एक ऐतिहासिक टिप्पणी में कहा था कि ‘भारत में वादकारियों की असली कठिनाई अदालत से डिक्री (Decree) प्राप्त करने के बाद शुरू होती है’ (The difficulty of the litigants in India starts after getting the decree)।किंतु वर्तमान मामला उस ऐतिहासिक टिप्पणी से भी एक कदम आगे निकल गया है। यहाँ डिक्री-धारक को न केवल डिक्री पाने के बाद, बल्कि डिक्री का औपचारिक निष्पादन (Execution) संपन्न हो जाने के बाद भी अड़चनों और अवैध पुनः-कब्जे का सामना करना पड़ रहा है।”
3. ‘न्याय प्रशासन में खुला हस्तक्षेप; कोर्ट रिसीवर का गठन’:
- अदालत ने कहा कि न्यायिक आदेशों के तहत बेदखल किए जाने के बाद संपत्ति पर जबरन फिर से कब्जा कर लेना कानून के शासन का खुला मखौल उड़ाना है:“प्रथम दृष्टया मेरा यह पूर्ण समाधान है कि इन प्रतिवादियों का आचरण न्याय प्रशासन (Administration of Justice) में सीधा हस्तक्षेप है।”
- संपत्ति को और अधिक नुकसान से बचाने के लिए अदालत ने तुरंत ‘कोर्ट रिसीवर’ नियुक्त किया और उसे 28 अक्टूबर 2026 तक विवादित संपत्ति का सांकेतिक कब्जा (Symbolic Possession) अपने हाथ में लेने का आदेश दिया।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2009–2026)
| चरण / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| याचिकाकर्ता (डिक्री-धारक / मकान मालिक) | हरजीत कौर ओंकार सिंह कालरा व अन्य (मूल मकान मालिक ओंकार सिंह कालरा के कानूनी वारिस)। |
| प्रतिवादी पक्ष (किरायेदार के वारिस) | रोज़ वेंकटेशन वी उर्फ रोज़ कुमार, मिंदर गुरमीत सिंह ठुकराल (प्रतिवादी 4), हरप्रीत सिंह गुरमीत सिंह ठुकराल व अन्य (मूल किरायेदार तरलोक सिंह ठुकराल के वारिस)। |
| विवाद का मूल उद्गम | वर्ष 2009 में मुंबई की स्मॉल कॉज कोर्ट (Small Causes Court) में दायर किया गया बेदखली का मुकदमा। |
| ट्रायल कोर्ट का फैसला (जुलाई 2018) | निचली अदालत ने मकान मालिक के पक्ष में बेदखली की औपचारिक डिक्री पारित की और किरायेदारों को परिसर खाली करने का आदेश दिया। |
| अपीलीय अदालतों का रुख | • अक्टूबर 2021: अपीलीय अदालत ने किरायेदारों की अपील खारिज की। • जुलाई 2024: बॉम्बे हाईकोर्ट ने सिविल रिवीजन आवेदन (CRA) खारिज किया। • अक्टूबर 2024: बॉम्बे हाईकोर्ट ने पुनर्विचार याचिका (Review Petition) भी खारिज कर दी। |
| निष्पादन और पुनः अवैध कब्जा | 17 अप्रैल 2025 को कोर्ट कमिश्नर/बेलीफ की उपस्थिति में डिक्री का निष्पादन हुआ और कब्जा मकान मालिक को सौंपा गया। इसके बावजूद प्रतिवादियों ने परिसर में अनधिकृत रूप से दोबारा प्रवेश कर लिया। |
| 27 अक्टूबर 2026 की घटना | अवमानना सुनवाई के दौरान प्रतिवादी महिला (मिंदर गुरमीत सिंह ठुकराल) ने जज पर पर्स फेंकने का प्रयास किया; सुरक्षाकर्मियों ने बाहर निकाला। |
| हाईकोर्ट का अंतरिम आदेश | 28 अक्टूबर तक सांकेतिक कब्जा लेने हेतु कोर्ट रिसीवर नियुक्त; अवमानना कार्यवाही में सभी प्रतिवादियों को 30 अक्टूबर 2026 को सशरीर उपस्थित रहने का आदेश। |
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘कोर्ट में हिंसा, आपराधिक अवमानना और प्रिवी काउंसिल नजीर’
- अदालत के समक्ष अवमानना (Contempt in the Face of the Court):
- अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 14 के तहत, जब उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय की उपस्थिति या उसके समक्ष (In the presence or hearing of the Court) कोई अवमाननापूर्ण आचरण, आक्रामकता या हमला किया जाता है, तो न्यायालय को यह विशेषाधिकार प्राप्त है कि वह अवमाननाकर्ता को उसी समय हिरासत में ले सकता है और बिना किसी लंबी प्रक्रिया के तत्काल आरोप तय कर कार्यवाही कर सकता है।
- पीठासीन न्यायाधीश की ओर पर्स, फाइलें या जूता फेंकने का प्रयास न केवल न्यायाधीश की व्यक्तिगत सुरक्षा पर हमला है, बल्कि यह न्यायपालिका की संप्रभु गरिमा को खुलेआम चुनौती देने का कृत्य है।
- प्रिवी काउंसिल की ऐतिहासिक नजीर (General Manager of Raj Durbhunga v. Maharajah Coomar Ramaput Sing, 1872):
- वर्ष 1872 में प्रिवी काउंसिल ने भारतीय सिविल मुकदमों की जमीनी हकीकत पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि एक वादी के लिए मुकदमा जीतना जितना कठिन है, उससे कहीं अधिक कठिन उस फैसले के बाद निष्पादन हासिल करना है।
- बॉम्बे हाईकोर्ट का यह अवलोकन इस बात को रेखांकित करता है कि जब कानून के सभी मंचों (ट्रायल कोर्ट, अपीलीय कोर्ट, रिवीजन और रिव्यू) पर हारने के बाद भी किरायेदार बाहुबल से संपत्ति पर दोबारा कब्जा कर लेते हैं और अदालतों में जजों पर हमले का प्रयास करते हैं, तो यह सीधे तौर पर कानून के शासन (Rule of Law) के पतन को दर्शाता है।
विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता
- न्यायालय: बॉम्बे उच्च न्यायालय (मूल दीवानी अवमानना क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: हरजीत कौर ओंकार सिंह कालरा व अन्य बनाम रोज़ वेंकटेशन वी उर्फ रोज़ कुमार व अन्य [Contempt Petition No. … / 2026]
- पीठासीन न्यायाधीश: न्यायमूर्ति माधव जामदार (एकल पीठ)
- आदेश की तिथि: 27 अक्टूबर 2026
- आगामी निर्णायक सुनवाई: 30 अक्टूबर 2026 (सभी प्रतिवादियों की व्यक्तिगत उपस्थिति अनिवार्य)
विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ताओं (मकान मालिक / डिक्री-धारक) की ओर से: अधिवक्ता प्रथमेश सेठ (Advocate Prathmesh Seth), अधिवक्ता तृप्ति गोसावी एवं अधिवक्ता हर्षित वाजे।
- प्रतिवादियों (मूल किरायेदारों के वारिस) की ओर से: अधिवक्ता ओमप्रकाश पांडे (Advocate Omprakash Pandey) एवं अधिवक्ता प्रमिला प्रजापति (Advocate Pramila Prajapati)।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 215 (अभिलेख न्यायालय के रूप में उच्च न्यायालय की अंतर्निहित अवमानना शक्तियां)
- अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 — धारा 2(c) (आपराधिक अवमानना—अदालत को भयभीत करना व न्याय प्रशासन में बाधा), धारा 12 (दंड) एवं धारा 14 (न्यायालय के समक्ष अवमानना पर त्वरित प्रक्रिया)
- सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC):
- आदेश XXI नियम 98 व 102 — बेदखली निष्पादन में बाधा डालने वालों के विरुद्ध दंडात्मक प्रावधान
- आदेश XL नियम 1 — संपत्ति की सुरक्षा व अवैध कब्जे को रोकने हेतु कोर्ट रिसीवर की नियुक्ति
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- अदालत कक्ष की सुरक्षा और निष्पादन की शुचिता का विधिक मानक: ‘न्यायिक कार्यवाही के दौरान न्यायाधीश पर कोई वस्तु फेंकने का प्रयास करना न्याय के मंदिर की गरिमा का घोर उल्लंघन और अक्षम्य आपराधिक अवमानना है; सिविल मुकदमों में सभी अपीलों के निस्तारण और निष्पादन के बाद डिक्रीशुदा संपत्ति पर दोबारा बलपूर्वक कब्जा कर लेना न्यायिक आदेशों की खुली अवज्ञा है; ऐसे मामलों में अदालतें मूकदर्शक नहीं रह सकतीं और संपत्ति को तुरंत कोर्ट रिसीवर के संरक्षण में लेकर अवमाननाकर्ताओं के विरुद्ध कठोर दंडात्मक कदम उठाने के लिए पूर्णतः सशक्त हैं।’
- वर्तमान स्थिति व अनुपालन निर्देश: बॉम्बे हाईकोर्ट ने विवादित संपत्ति का तुरंत सांकेतिक कब्जा लेने के लिए कोर्ट रिसीवर नियुक्त कर दिया है; जज पर पर्स फेंकने का प्रयास करने वाली महिला वादकारी मिंदर गुरमीत सिंह ठुकराल और हरप्रीत सिंह ठुकराल सहित सभी प्रतिवादियों को 30 अक्टूबर 2026 को व्यक्तिगत रूप से अदालत में हाजिर होने का सख्त आदेश दिया गया है, जहां उनके खिलाफ औपचारिक आपराधिक अवमानना के आरोप तय किए जाएंगे।
Court Contempt:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | बॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court), मुंबई |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति माधव जामदार (Justice Madhav Jamdar) |
| मामला/साइटेशन | हरजीत कौर ओंकार सिंह कालरा व अन्य बनाम रोज वेंकटेशन वी. उर्फ रोज कुमार व अन्य (Harjit Kaur Onkar Singh Kalra & Ors v. Rose Venkateshan V Alias Rose Kumar & Ors) |
| याचिकाकर्ता (मकान मालिक) | हरजीत कौर ओंकार सिंह कालरा व अन्य | प्रतिनिधित्व: अधिवक्ता प्रथमेश सेठ, तृप्ति गोसावी और हर्षित वाजे |
| प्रतिवादी (किराएदार पक्ष) | हरप्रीत सिंह गुरमीत सिंह ठुकराल, मिंदर गुरमीत सिंह ठुकराल व अन्य | प्रतिनिधित्व: अधिवक्ता ओमप्रकाश पांडे और प्रमिला प्रजापति |
| मूल विवाद | 2009 से लंबित मकान बेदखली का मुकदमा; बेदखली वारंट तामील (निष्पादित) होने के बाद भी संपत्ति पर अवैध रूप से पुनः कब्जा करना और कोर्ट रूम में हंगामा। |
| अदालत का फैसला | 1. सुरक्षाकर्मियों द्वारा बाहर निकाला गया: जज पर पर्स फेंकने की कोशिश करने वाली महिला को सुरक्षा बुलाकर कोर्ट रूम से बाहर करवाया गया। 2. आपराधिक अवमानना: सभी प्रतिवादियों के खिलाफ अवमानना प्रक्रिया शुरू की गई और 30 अक्टूबर 2026 को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया गया। 3. संपत्ति का कब्जा: कोर्ट रिसीवर को 28 अक्टूबर तक प्रतीकात्मक कब्जा (Symbolic Possession) लेने का आदेश। |

