Sunday, November 1, 2026
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Misusing Name: चीफ जस्टिस के सचिवालय में काम करने का अर्थ अवैध आदेश जारी करने का लाइसेंस नहीं; पूर्व CJ के नाम का दुरुपयोग गंभीर कदाचार

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मामले की पृष्ठभूमि: क्या था पूरा विवाद?

  1. ईमेल निर्देश और चयन पर रोक:12 मार्च 2026 को इंटरव्यू प्रक्रिया पूरी होने के बाद नासिक के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने ‘श्री सप्तश्रृंग निवासिनी देवी ट्रस्ट’ के लिए 5 अनुशंसित ट्रस्टियों की सूची को अंतिम रूप दिया था। इसके तुरंत बाद, 14 मार्च 2026 को मुख्य न्यायाधीश की विशेष अधिकारी अंजू शेंडे ने नासिक के जिला जज को एक ईमेल भेजा। ईमेल में दावा किया गया कि राज्य सरकार के एक नए अध्यादेश के मद्देनजर तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर के मौखिक निर्देशों पर इस सूची को तुरंत वापस लिया जाए।
  2. हाईकोर्ट प्रशासन का खुलासा:चयन प्रक्रिया में शामिल प्रतिभागियों ने इस ईमेल और उसके बाद नासिक जिला जज द्वारा जारी स्थगनादेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के दौरान बॉम्बे हाईकोर्ट प्रशासन और जिला जज की ओर से पेश वकीलों ने स्वीकार किया कि इस संबंध में मुख्य न्यायाधीश के समक्ष कोई भी आधिकारिक प्रस्ताव या फ़ाइल पेश ही नहीं की गई थी और न ही रजिस्ट्री में इसका कोई रिकॉर्ड उपलब्ध था।

उच्च न्यायालय के मुख्य विधिक निष्कर्ष

1. “सचिवालय में पद होना अवैध काम का लाइसेंस नहीं”:

अदालत ने अधिकारी के इस बचाव को सिरे से खारिज कर दिया कि उसने मुख्य न्यायाधीश के निर्देशों पर काम किया। पीठ ने चेतावनी दी कि मुख्य न्यायाधीश के सचिवालय के साथ काम करने का मतलब यह नहीं है कि किसी को इस तरह के अवैध और अनधिकृत संचार जारी करने का लाइसेंस मिल जाता है।

2. आधिकारिक रिकॉर्ड का अभाव:

हाईकोर्ट ने पाया कि विशेष अधिकारी द्वारा मुख्य न्यायाधीश का नाम इस्तेमाल कर भेजा गया पत्र रजिस्ट्री के किसी भी आधिकारिक रिकॉर्ड से समर्थित नहीं था। बिना आधिकारिक फाइल और प्रशासनिक मंजूरी के पूर्व मुख्य न्यायाधीश का नाम इस्तेमाल करना एक गंभीर अधिकार-क्षेत्र का उल्लंघन (Jurisdictional Violation) है।

मुंबई: भारत का संविधान के अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार—प्रशासनिक मनमानेपन पर नियंत्रण), महाराष्ट्र लोक न्यास अधिनियम, 1950 (Maharashtra Public Trusts Act, 1950) के तहत धार्मिक ट्रस्टों में ट्रस्टियों की नियुक्ति प्रक्रिया, उच्च न्यायालय के प्रशासनिक पदानुक्रम में मुख्य न्यायाधीश के विशेष अधिकारियों (Special Officers / Secretariat Staff) की विधिक सीमाएं, ‘रजिस्ट्री रिकॉर्ड और फाइल नोटिंग’ के बिना मौखिक निर्देशों के नाम पर समानांतर आदेश पारित करने की वैधता, तथा ‘अधिकार क्षेत्र से बाहर कार्य’ (Gross Impropriety & Action Ultra Vires) के विधिक मानकों पर बॉम्बे उच्च न्यायालय ने एक अत्यंत गंभीर और सख्त फैसला सुनाया है।

बॉम्बे उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जी.एस. कुलकर्णी (Justice GS Kulkarni) और न्यायमूर्ति नीला गोखले (Justice Neela Gokhale) की खंडपीठ ने नासिक स्थित सुप्रसिद्ध श्री सप्तशृंग निवासिनी देवी ट्रस्ट (Shree Saptashrung Nivasini Devi Trust, Nashik) में पांच नए ट्रस्टियों की चयन प्रक्रिया को रोकने वाले प्रशासनिक निर्देश को पूरी तरह रद्द कर दिया।

अदालत ने पाया कि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश की विशेष अधिकारी अंजू शेंडे (Anju Shende) ने मुख्य न्यायाधीश के नाम पर नासिक के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश को ई-मेल भेजकर विधिवत साक्षात्कार प्रक्रिया के बाद तय की गई 5 ट्रस्टियों की सिफारिश सूची को तुरंत वापस लेने का आदेश दिया था। हाईकोर्ट प्रशासन और जिला जज के वकीलों ने सुनवाई के दौरान स्वीकार किया कि ऐसी कोई फाइल या प्रस्ताव कभी मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत ही नहीं किया गया था। पीठ ने दो-टूक व्यवस्था दी कि अधिकारी ने पद की मर्यादा का घोर उल्लंघन करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस के नाम का खुला दुरुपयोग (Misused the name of the Chief Justice) किया है, जो गंभीर कदाचार (Serious Misconduct) की श्रेणी में आता है।

उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. ‘चीफ जस्टिस के नाम का सीधा दुरुपयोग; रिकॉर्ड पर कोई आधिकारिक प्रस्ताव नहीं’

न्यायमूर्ति जी.एस. कुलकर्णी और न्यायमूर्ति नीला गोखले की पीठ ने प्रशासनिक रिकॉर्ड की पड़ताल करते हुए अपने निर्णय में दर्ज किया: “आक्षेपित पत्र जैसा कि जारी किया गया है और जिसे माननीय मुख्य न्यायाधीश से जोड़ा गया है, रजिस्ट्री के रिकॉर्ड द्वारा तनिक भी समर्थित नहीं है। हम आश्चर्यचकित हैं कि माननीय मुख्य न्यायाधीश की विशेष अधिकारी (प्रतिवादी संख्या 4) को प्रशासनिक स्तर पर तत्कालीन माननीय मुख्य न्यायाधीश के निर्देशों के अनुसार कार्य करने के बहाने ऐसा पत्र जारी करने के लिए किस बात ने प्रेरित किया होगा। वास्तव में, हमारे विचार में, यह एक स्पष्ट मामला है जहां माननीय मुख्य न्यायाधीश की विशेष अधिकारी ने उन कारणों से बॉम्बे उच्च न्यायालय के माननीय मुख्य न्यायाधीश के नाम का दुरुपयोग (Misused the name of the Hon’ble Chief Justice) किया है, जो रिकॉर्ड पर सामने नहीं आ रहे हैं।”

2. ‘सचिवालय में काम करना अवैध आदेश जारी करने का लाइसेंस नहीं देता’:

  • खंडपीठ ने स्पष्ट विधिक चेतावनी दी कि मुख्य न्यायाधीश के सचिवालय का अंग होने से किसी अधिकारी को कानूनी उन्मुक्ति (Immunity) प्राप्त नहीं हो जाती:“हमारी राय में, ऐसा आचरण घोर अनुचित होने के अलावा, प्रतिवादी संख्या 4 की ओर से आक्षेपित पत्र जारी करने में संभावित रूप से एक गंभीर कदाचार (Serious Misconduct) के समान है।माननीय मुख्य न्यायाधीश के सचिवालय में मात्र कार्य करने का अर्थ यह नहीं है कि किसी को इस प्रकार का अवैध पत्र जारी करने में लिप्त होने का लाइसेंस (Licence to indulge in issuance of such illegal communication) मिल गया है।”

3. नासिक जिला जज का परिणामी स्थगनादेश भी अवैध करार:

  • अदालत ने न केवल 14 मार्च 2026 के विशेष अधिकारी के ई-मेल को निरस्त किया, बल्कि उस ई-मेल के दबाव में आकर नासिक के प्रधान जिला न्यायाधीश द्वारा जारी किए गए परिणामी स्थगन आदेश (Consequential Stay Order) को भी पूरी तरह रद्द (Quashed) कर दिया, जिससे ट्रस्टियों की नियुक्ति का रास्ता साफ हो गया।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (मार्च–अक्टूबर 2026)

चरण / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
ट्रस्ट का नामश्री सप्तशृंग निवासिनी देवी ट्रस्ट, नासिक (महाराष्ट्र) — एक प्रमुख सार्वजनिक धार्मिक न्यास।
याचिकाकर्ताविष्णु त्रिंबक वारुंगसे व अन्य — चयन प्रक्रिया में भाग लेने वाले अनुशंसित ट्रस्टी उम्मीदवार।
प्रतिवादी पक्ष1. महाराष्ट्र राज्य。
2. नासिक के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश。
3. बॉम्बे हाईकोर्ट प्रशासन。
4. अंजू शेंडे (तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश की विशेष अधिकारी / Respondent No. 4)।
विवादित घटना (12 मार्च 2026)निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत साक्षात्कार पूरे होने के बाद 5 योग्य ट्रस्टियों की एक अंतिम सिफारिशी सूची जिला अदालत द्वारा तैयार की गई।
अवैध प्रशासनिक हस्तक्षेप (14 मार्च 2026)मुख्य न्यायाधीश की विशेष अधिकारी अंजू शेंडे ने नासिक जिला जज को एक आधिकारिक ई-मेल भेजा, जिसमें दावा किया गया कि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर (Chief Justice Shree Chandrashekhar) ने राज्य के नए अध्यादेश के मद्देनजर ट्रस्टियों की इस अनुशंसित सूची को तुरंत वापस लेने (Withdrawal) के मौखिक निर्देश दिए हैं।
जिला जज का कदममुख्य न्यायाधीश का नाम सुनकर जिला जज ने सिफारिशी सूची को वापस ले लिया और नियुक्ति प्रक्रिया पर रोक लगा दी।
अदालत में खुला सचबॉम्बे हाईकोर्ट प्रशासन और जिला जज की ओर से पेश वकीलों ने अदालत में स्वीकार किया कि रजिस्ट्री के रिकॉर्ड में ऐसी कोई नोटिंग, पत्रावली या प्रस्ताव मौजूद नहीं था जो मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा गया हो।
हाईकोर्ट का अंतिम निर्णयविशेष अधिकारी का 14 मार्च का ई-मेल और जिला जज का स्थगन आदेश शून्य व निरस्त घोषित।

विधिक एवं प्रशासनिक विश्लेषण: ‘न्यायिक सचिवालय की सीमाएं और प्राकृतिक न्याय’

  • प्रशासनिक फाइलों और लिखित अनुमोदन की अनिवार्यता (Requirement of Official Record):
    • भारत के प्रशासनिक कानून में यह सुस्थापित नियम है कि संवैधानिक न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश द्वारा प्रशासनिक स्तर पर पारित प्रत्येक आदेश विधिवत रूप से रजिस्ट्री की फाइल नोटिंग (File Note-sheet) पर दर्ज होना चाहिए।
    • किसी विशेष अधिकारी, निजी सचिव या रजिस्ट्रार को यह अधिकार नहीं है कि वह बिना किसी लिखित पत्रावली के अपने स्तर पर जिला न्यायपालिका को ‘चीफ जस्टिस के मौखिक निर्देश’ बताकर बाध्यकारी आदेश जारी करे। ऐसा कृत्य कानून की दृष्टि में Ultra Vires (अधिकार क्षेत्र से परे) और शून्य (Void Ab Initio) होता है।
  • संस्थागत प्रतिष्ठा और अनुशासनात्मक दायित्व:
    • पीठ ने कठोर शब्दों में यह रेखांकित किया कि मुख्य न्यायाधीश का कार्यालय न्यायपालिका का सर्वोच्च पद है।
    • यदि उस कार्यालय से संबद्ध अधिकारी निजी कारणों या अज्ञात प्रेरणाओं से जिला जजों को प्रभावित करने लगेंगे, तो संपूर्ण न्यायिक प्रणाली की निष्पक्षता संदिग्ध हो जाएगी। अदालत की यह टिप्पणी कि यह “संभावित रूप से गंभीर कदाचार” है, भविष्य में प्रशासनिक कर्मचारियों द्वारा शक्तियों के दुरुपयोग पर एक कड़ा अवरोधक (Deterrent) स्थापित करती है।

विधिक विवरण एवं उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता

  • न्यायालय: बॉम्बे उच्च न्यायालय (मूल रिट क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: विष्णु त्रिंबक वारुंगसे व अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य व अन्य [W.P. No. … / 2026]
  • पीठ: न्यायमूर्ति जी.एस. कुलकर्णी एवं न्यायमूर्ति नीला गोखले (खंडपीठ)
  • निर्णय की तिथि: अक्टूबर 2026
  • कार्यवाही का परिणाम: याचिका स्वीकार; 14 मार्च 2026 का अवैध ई-मेल और जिला जज का परिणामी स्थगन आदेश पूरी तरह निरस्त; ट्रस्टी नियुक्ति प्रक्रिया बहाल।

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • याचिकाकर्ताओं की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता ए.वाई. साखरे (Senior Advocate AY Sakhare), जिन्हें अधिवक्ता रामेश्वर गीते, प्रवीण थोराट एवं तेजस्विनी पाठवे ने सहयोग दिया।
  • महाराष्ट्र राज्य की ओर से: महाधिवक्ता मिलिंद साठे (Advocate General Milind Sathe), सरकारी वकील एन.एस. भिडे, अतिरिक्त सरकारी वकील ओ.ए. चंदुरकर एवं जी.आर. रघुवंशी।
  • प्रतिवादियों (हाईकोर्ट प्रशासन व अन्य) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता शरण जगतियानी (Senior Advocate Sharan Jagtiani), अधिवक्ता आर.एस. दातार एवं निखिल अदकीने।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार) एवं अनुच्छेद 235 (अधीनस्थ न्यायालयों पर उच्च न्यायालय का प्रशासनिक नियंत्रण)
    • महाराष्ट्र लोक न्यास अधिनियम, 1950 (Maharashtra Public Trusts Act, 1950) — सार्वजनिक ट्रस्टों में ट्रस्टियों के चयन एवं अनुमोदन की प्रक्रिया
    • उच्च न्यायालय सेवा नियमावली (High Court Service Rules) — प्रशासनिक कर्मचारियों की आचार संहिता एवं कदाचार
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • न्यायिक प्रशासन में शक्तियों के प्रयोग का विधिक मानक: ‘मुख्य न्यायाधीश के सचिवालय में कार्यरत किसी भी अधिकारी को यह वैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है कि वह बिना आधिकारिक फाइल अनुमोदन और रजिस्ट्री रिकॉर्ड के मुख्य न्यायाधीश के नाम पर कोई निर्देश जारी करे; ऐसा मनमाना कार्य मुख्य न्यायाधीश के पद का दुरुपयोग और गंभीर कदाचार है; मुख्य न्यायाधीश के सचिवालय से संबद्ध होना किसी गैर-कानूनी प्रशासनिक हस्तक्षेप का औचित्य या कानूनी सुरक्षा कवच नहीं बन सकता।’
  • वर्तमान स्थिति व विधिक प्रभाव: बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा अवैध ई-मेल और स्थगन आदेश को निरस्त किए जाने के बाद, नासिक के प्रधान जिला जज द्वारा 12 मार्च 2026 को अनुशंसित पांचों ट्रस्टियों की नियुक्ति प्रक्रिया बिना किसी प्रशासनिक बाधा के विधिवत आगे बढ़ेगी।

Misusing Name:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतबॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court), मुंबई
पीठन्यायमूर्ति जी.एस. कुलकर्णी एवं न्यायमूर्ति नीला गोखले
मामला/साइटेशनविष्णु त्रिंबक वारुंगसे व अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य व अन्य (Vishnu Trimbak Warungase & Ors v. State of Maharashtra & Ors)
याचिकाकर्ताट्रस्टी चयन प्रक्रिया के प्रतिभागी | प्रतिनिधित्व: वरिष्ठ अधिवक्ता ए.वाई. साखरे व अन्य
प्रतिवादी पक्षमहाराष्ट्र राज्य व मुख्य न्यायाधीश की विशेष अधिकारी (अंजू शेंडे) | प्रतिनिधित्व: एडवोकेट जनरल मिलिंद साठे व अन्य
मूल विवादनासिक जिला जज को पूर्व CJ के नाम से फर्जी प्रशासनिक ईमेल भेजकर 5 ट्रस्टियों की अंतिम चयन सूची को तुरंत वापस लेने का अवैध आदेश जारी करना।
अदालत का निर्णयनिर्देश व स्थगनादेश रद्द: विशेष अधिकारी के ईमेल और नासिक जिला जज के रोक आदेश को निरस्त किया गया। अधिकारी के कृत्य को गंभीर कदाचार करार दिया।

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