Friday, November 6, 2026
HomeBNS & BNSS LawIP Cases: दिल्ली से नगण्य संबंध वाले IP मुकदमों पर हाईकोर्ट का...

IP Cases: दिल्ली से नगण्य संबंध वाले IP मुकदमों पर हाईकोर्ट का आत्ममंथन; 246 पन्नों के ऐतिहासिक फैसले में 17 वाणिज्यिक वाद खारिज

FOLLOW US FOR MORE LEGAL UPDATES ON WhatsApp

मामले की पृष्ठभूमि और अदालती निष्कर्ष

  1. 17 वाणिज्यिक IP मुकदमों को सुनने से इनकार:न्यायामूर्ति कौरव ने 17 वाणिज्यिक मुकदमों पर विचार करने से इनकार कर दिया जिनमें वादी और प्रतिवादी दोनों ही दिल्ली से बाहर के थे और मामले का दिल्ली से कोई सीधा संबंध नहीं था। कोर्ट ने कहा कि जबरन दिल्ली में मुकदमे लाने से प्राकृतिक क्षेत्राधिकार वाली अन्य अदालतों का अधिकार छिन जाता है।
  2. ऑनलाइन खरीदारी और जासूसों (Investigators) का दुरुपयोग:अदालत ने माना कि दिल्ली में किसी वेबसाइट की मात्र उपलब्धता या रणनीतिक रूप से ऑनलाइन ऑर्डर देकर दिल्ली के पते पर डिलीवरी करवा लेना (या प्राइवेट इन्वेस्टिगेटर से जानबूझकर दिल्ली में खरीदारी करवाना) दिल्ली हाईकोर्ट का क्षेत्राधिकार बनाने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। यह क्षेत्राधिकार का कृत्रिम निर्माण (Concocting Jurisdiction) है।

टेरिटोरियल ज्यूरिस्डिक्शन (Territorial Jurisdiction) पर तय किए गए 9 मुख्य सिद्धांत

  1. उल्लंघन (Infringement) और पासिंग ऑफ (Passing Off):दोनों अलग-अलग कारण (Causes of Action) हैं। यदि संयुक्त मुकदमा (Composite Suit) दायर किया गया है, तो वादी को दोनों के लिए अलग से क्षेत्राधिकार साबित करना होगा।
  2. ‘व्यापार संचालन’ का अर्थ (Carries on Business):कंपनी को सामान्यतः उसके पंजीकृत कार्यालय (Registered Office) पर ही सुआ (Sue) किया जा सकता है। अधीनस्थ/शाखा कार्यालय (Subordinate Office) पर मुकदमा केवल तभी हो सकता है जब विवाद का कारण भी उसी स्थान पर उत्पन्न हुआ हो।
  3. क्विआ टाइमेट एक्शन (Quia Timet Actions):निवारक मुकदमों (Preventive Suits) में अपूरणीय क्षति का आसन्न खतरा (Imminent Threat) साबित करना अनिवार्य है।
  4. पासिंग ऑफ (Passing Off):क्षेत्राधिकार के लिए केवल माल की उपलब्धता पर्याप्त नहीं है; वादी को प्रतिवादी या उसके वितरकों द्वारा उस क्षेत्र में वाणिज्यिक स्तर की बिक्री (Commercial-scale sales) साबित करनी होगी।
  5. ऑफलाइन उल्लंघन (Offline Infringement):क्षेत्राधिकार वहां उत्पन्न होता है जहां प्रतिवादी व्यापार के दौरान उस अदालत की सीमा में ट्रेडमार्क का उपयोग करता है।
  6. ऑनलाइन उल्लंघन (Online Infringement):वादी को यह दिखाना होगा कि प्रतिवादी ने उस विशेष क्षेत्र के लोगों को लक्षित (Deliberately Targeted) किया और उनके साथ अपनी वेबसाइट के माध्यम से वाणिज्यिक लेन-देन पूरे किए।
  7. गतिशील प्रभाव (Dynamic Effect):किसी क्षेत्र में कथित उल्लंघन के परिणाम महसूस होने मात्र से सीपीसी (CPC) के तहत क्षेत्राधिकार प्राप्त नहीं होता।
  8. जासूसों (Investigators) का उपयोग:अदालत में क्षेत्राधिकार बनाने के उद्देश्य से किसी अन्वेषक या जासूस के माध्यम से दिल्ली में माल की खरीदारी करवाना ‘क्षेत्राधिकार गढ़ना’ माना जाएगा (सिवाय उन मामलों के जहां जासूस केवल पहले से चल रही बिक्री का दस्तावेजीकरण कर रहा हो)।
  9. फोरम नॉन कन्वीनियंस (Forum Non Conveniens):भले ही तकनीकी रूप से क्षेत्राधिकार बनता हो, लेकिन यदि कोई अन्य मंच अधिक उपयुक्त है और दिल्ली का संबंध नगण्य है, तो अदालत मुकदमा सुनने से इनकार कर सकती है।

नई दिल्ली: सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) की धारा 20 (अन्य वादों का वहां संस्थित किया जाना जहां प्रतिवादी निवास करते हैं या वादहेतुक पैदा होता है), ट्रेड मार्क्स अधिनियम, 1999 (Trade Marks Act, 1999) की धारा 134(2), कॉपीराइट अधिनियम, 1957 (Copyright Act, 1957) की धारा 62(2) (वादी के कारोबार/निवास स्थान पर वाद दायर करने का विशेष अधिकार), ई-कॉमर्स व इंटरनेट मुकदमों में क्षेत्राधिकार निर्धारण का ‘टारगेटिंग टेस्ट’ (Targeting Test), ट्रैप-परचेज (Trap Purchase) या निजी जांचकर्ताओं द्वारा कृत्रिम क्षेत्राधिकार गढ़ने (Manufactured Jurisdiction) पर रोक, तथा फोरम शॉपिंग के विरुद्ध ‘फोरम नॉन कन्वीनियंस’ (Forum Non Conveniens) के सिद्धांतों पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने बौद्धिक संपदा (IP) मुकदमों के प्रादेशिक क्षेत्राधिकार पर एक युगांतरकारी और 246 पन्नों का ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।

दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति पुरुषेन्द्र कुमार कौरव (Justice Purushaindra Kumar Kaurav) की एकल पीठ ने देश भर से दिल्ली लाकर दायर किए गए 17 वाणिज्यिक बौद्धिक संपदा वादों (IP Suits) को सुनने से साफ इनकार करते हुए खारिज/वापस लौटा दिया।

न्यायमूर्ति कौरव ने अपने 246 पृष्ठीय निर्णय में दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा देश भर के आईपी मुकदमों को सुनने की अनियंत्रित प्रवृत्ति पर आत्ममंथन करते हुए कहा कि भारत का बौद्धिक संपदा परिदृश्य काफी हद तक दिल्ली हाईकोर्ट रूपी ‘बरगद के पेड़’ (Banyan Tree) के नीचे फला-फूला है, किंतु इस बरगद को अपने नीचे अन्य पेड़ों (अन्य राज्यों के उच्च न्यायालयों व जिला अदालतों) के विकास को अवरुद्ध नहीं करना चाहिए। अदालत ने सख्त चेतावनी दी कि अखिल भारतीय क्षेत्राधिकार का उपभोग करने के बाद अब आत्म-संयम की एक ‘लक्ष्मण रेखा’ (Lakshman Rekha) खींचना संस्थागत अनुशासन और संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) के लिए अपरिहार्य हो चुका है।

उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं दार्शनिक टिप्पणियां

1. ‘बरगद का पेड़ और अन्य अदालतों का विकास’:

न्यायमूर्ति पुरुषेन्द्र कुमार कौरव ने दिल्ली उच्च न्यायालय के ‘पसंदीदा मंच’ (Preferred Forum) बनने और अन्य उच्च न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र के क्षरण पर अत्यंत सटीक टिप्पणी दर्ज की: “भारत का आईपी परिदृश्य काफी हद तक दिल्ली उच्च न्यायालय रूपी ‘बरगद के पेड़’ (Banyan Tree) के नीचे विकसित हुआ है। यद्यपि बरगद आश्रय और सहूलियत प्रदान करता है, किंतु यह अपने नीचे उगने वाले अन्य पेड़ों के विकास को भी बौना (Stunts the growth of other trees below it) कर देता है। यह मानने का कोई कारण नहीं है कि देश के अन्य उच्च न्यायालय अवसर आने पर आगे नहीं बढ़ेंगे, इस न्यायालय की तरह एक विशेषीकृत आईपी ढांचा (Specialised Machinery) तैयार नहीं करेंगे, और अपने यहां या अपनी जिला अदालतों में आईपी मुकदमों के संचालन को सुगम नहीं बनाएंगे। दिल्ली उच्च न्यायालय को ऐसी प्रतिष्ठा कतई हासिल नहीं करनी चाहिए कि विवाद, वादी या प्रतिवादी का दिल्ली से चाहे कितना भी नगण्य या रत्ती भर संबंध (Minuscule Connection) क्यों न हो, यह अदालत हर मुकदमे को आंख मूंदकर स्वीकार कर लेगी।”

2. ‘अधिकार क्षेत्र की लक्ष्मण रेखा और संस्थागत अनुशासन’:

  • अदालत ने ‘क्षेत्र खोने’ के डर के बजाय ‘संस्थान के अनुशासन’ को प्राथमिकता देते हुए कहा:“आज अखिल भारतीय क्षेत्राधिकार का उपभोग करने के बाद किसी भी अदालत के लिए अपनी सीमाओं से बाहर जाने से खुद को रोकना और एक ‘लक्ष्मण रेखा’ (Lakshman Rekha) खींचना कठिन हो जाता है। यह प्रश्न अधिकार क्षेत्र खोने का नहीं, बल्कि संस्थागत अनुशासन (Institutional Discipline) का है।यदि क्षेत्राधिकार स्वाभाविक रूप से बनता है, तो अदालत को बिना किसी हिचकिचाहट के मुकदमे पर विचार करना चाहिए। किंतु यदि किसी विवाद को किसी अन्य प्राकृतिक अदालत के समक्ष उठाया जाना चाहिए था और उसे लगभग जबरन दिल्ली लाया जाता है, तो वह दूसरा वैध और स्वाभाविक मंच (Rightful and natural forum) उस वादहेतुक पर न्यायनिर्णयन के अवसर से वंचित हो जाता है। संवैधानिक नैतिकता यह मांग करती है कि हम इस योजना का सम्मान करें।”

Also Read; Victim Compensation: यूपी रानी लक्ष्मीबाई महिला एवं बाल सम्मान कोष नियमावली की अनिवार्य मेडिकल शर्त असंवैधानिक घोषित; क्यूं किया निरस्त, जानिए

मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (3 नवंबर 2026)

संदर्भ / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
फोरम / न्यायालयदिल्ली उच्च न्यायालय, नई दिल्ली (मूल वाणिज्यिक एवं बौद्धिक संपदा क्षेत्राधिकार)
पीठासीन न्यायाधीशन्यायमूर्ति पुरुषेन्द्र कुमार कौरव (Justice Purushaindra Kumar Kaurav) (एकल पीठ)
निर्णय की तिथि3 नवंबर 2026 (246 पृष्ठों का वृहद निर्णय)
केस संदर्भएबीडी मेस्ट्रो प्राइवेट लिमिटेड बनाम ग्रेट गैलियन वेंचर्स लिमिटेड एवं 16 अन्य संबद्ध वाणिज्यिक वाद [CS(COMM) Lead Matter / 2026]
मुकदमों की प्रकृति17 अलग-अलग वाणिज्यिक वाद, जो मुख्य रूप से ट्रेडमार्क उल्लंघन (Trademark Infringement), कॉपीराइट उल्लंघन और पासिंग ऑफ (Passing Off) से संबंधित थे।
तथ्यात्मक विसंगति17 में से आधे से अधिक मुकदमों में न तो वादी पक्ष (Plaintiffs) का दिल्ली में कोई वास्तविक पंजीकृत कार्यालय या कारोबार था और न ही प्रतिवादी (Defendants) दिल्ली में स्थित थे। दोनों पक्ष मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र या अन्य दूरस्थ राज्यों में स्थित थे, किंतु मुकदमा दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल किया गया।
क्षेत्राधिकार गढ़ने की युक्तियां (Artificially Created Jurisdiction)वादियों ने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने के लिए मुख्य रूप से दो आधार लिए:
1. प्रतिवादी की इंटरएक्टिव वेबसाइट दिल्ली में इंटरनेट पर खुलती है और कोई भी दिल्ली के पते पर उत्पाद मंगा सकता है।
2. वादी ने एक निजी जांचकर्ता (Private Investigator) को नियुक्त किया, जिसने दिल्ली में बैठकर प्रतिवादी से उत्पाद खरीदकर बिल जनरेट करवा लिया (Trap Purchase)।
अदालत का अंतरिम निष्कर्षकेवल दिल्ली में वेबसाइट का उपलब्ध होना या किसी जांचकर्ता द्वारा योजनाबद्ध तरीके से एक ऑर्डर मंगा लेना दिल्ली की अदालतों को प्रादेशिक क्षेत्राधिकार प्रदान नहीं कर सकता। यह अदालतों की क्षेत्रीय सीमाओं की अवधारणा को नष्ट करता है।
अंतिम निर्णयदिल्ली हाईकोर्ट ने सभी 17 मुकदमों को खारिज/वापस लौटा दिया और वादियों को संबंधित सक्षम स्थानीय अदालतों में जाने का निर्देश दिया।

बौद्धिक संपदा क्षेत्राधिकार पर उच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित 10 मुख्य विधिक सिद्धांत

न्यायमूर्ति कौरव ने अपने 246 पन्नों के निर्णय में ट्रेडमार्क और कॉपीराइट मुकदमों में क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र तय करने हेतु 10 सुस्पष्ट सिद्धांतों का प्रतिपादन किया:

  1. उल्लंघन (Infringement) और पासिंग ऑफ (Passing Off) स्वतंत्र वादहेतुक हैं:
    • यदि एक संयुक्त वाद (Composite Suit) दायर किया जाता है, तो दोनों दावों के लिए प्रादेशिक क्षेत्राधिकार स्वतंत्र रूप से स्थापित किया जाना चाहिए। यदि अदालत पाती है कि किसी एक राहत (जैसे पासिंग ऑफ) के लिए उसके पास अधिकार क्षेत्र नहीं है, तो वह वाद आगे नहीं बढ़ सकता।
  2. ‘कारोबार करता है’ (Carries on Business) की व्याख्या:
    • एक निगमित कंपनी सामान्यतः अपने पंजीकृत कार्यालय (Registered Office) पर ही कारोबार करती मानी जाती है। अधीनस्थ या शाखा कार्यालय (Branch Office) पर मुकदमा केवल तभी चल सकता है जब वादहेतुक का कोई वास्तविक भाग भी उसी स्थान पर उत्पन्न हुआ हो।
  3. ‘क्विआ टाइमेट’ (Quia Timet) निवारक वादों की शर्तें:
    • उल्लंघन की आशंका पर आधारित वाद में यह साबित करना अनिवार्य है कि उल्लंघन का एक आसन्न और अपूरणीय खतरा मौजूद है। विनियमित उत्पादों (जैसे शराब या दवाएं) के मामलों में यह देखना होगा कि क्या प्रतिवादी के पास उस राज्य में बिक्री हेतु आवश्यक वैधानिक लाइसेंस हैं।
  4. पासिंग ऑफ में क्षेत्राधिकार का मानक:
    • किसी इलाके में उत्पाद की छिटपुट मौजूदगी अधिकार क्षेत्र नहीं देती। वादी को यह सिद्ध करना होगा कि प्रतिवादी, उसके थोक विक्रेताओं या खुदरा विक्रेताओं द्वारा उस राज्य/क्षेत्र में व्यावसायिक पैमाने पर बिक्री (Commercial-scale sales) की जा रही है।
  5. ऑफलाइन उल्लंघन:
    • केवल यह तथ्य कि ट्रेडमार्क दिल्ली में पंजीकृत है, पर्याप्त नहीं है। यह दिखाना होगा कि प्रतिवादी ने दिल्ली की भौगोलिक सीमा के भीतर व्यापार के अनुक्रम में उस भ्रामक चिह्न का भौतिक उपयोग किया है।
  6. ऑनलाइन उल्लंघन और ‘टारगेटिंग टेस्ट’ (Targeting Test):
    • वादी को यह ठोस रूप से प्रदर्शित करना होगा कि प्रतिवादी की वेबसाइट ने केवल सूचनात्मक पहुंच नहीं दी, बल्कि उसने विशेष रूप से दिल्ली के उपभोक्ताओं को लक्षित (Deliberately targeted) किया और उनके साथ सक्रिय वाणिज्यिक लेनदेन संपन्न किए।
  7. डायनामिक प्रभाव (Dynamic Effect) क्षेत्राधिकार का आधार नहीं:
    • यह दलील कि अन्य राज्य में हुए उल्लंघन का अप्रत्यक्ष व्यावसायिक नुकसान या प्रभाव दिल्ली में वादी के कार्यालय में महसूस हुआ, सीपीसी की धारा 20 के तहत वाद संस्थित करने का अधिकार नहीं देता।
  8. जांचकर्ताओं द्वारा कृत्रिम क्षेत्राधिकार गढ़ने (Concocting Jurisdiction) पर प्रतिबंध:
    • अदालत ने स्पष्ट व्यवस्था दी: “एक नियम के रूप में, वादी द्वारा क्षेत्राधिकार बनाने के लिए किसी निजी जांचकर्ता या किसी अन्य व्यक्ति को खड़ा करना अधिकार क्षेत्र को मनगढ़ंत बनाने (Concocting Jurisdiction) के समान है।” इसका अपवाद केवल तभी है जब जांचकर्ता पहले से खुले बाजार में हो रही बिक्री का दस्तावेजीकरण मात्र कर रहा हो।
  9. फोरम नॉन कन्वीनियंस (Forum Non Conveniens):
    • भले ही तकनीकी रूप से वाद का कोई सूक्ष्म अंश बनता हो, अदालतें मुकदमे को सुनने से इनकार कर सकती हैं यदि कोई अन्य अदालत अधिक उपयुक्त और स्वाभाविक मंच है, विशेषकर तब जब दिल्ली का संबंध मात्र आकस्मिक या नगण्य हो।
  10. डिमरर का सिद्धांत (Doctrine of Demurrer):
    • वादी की चालाकी भरी कानूनी ड्राफ्टिंग (Clever Drafting) से अदालतें बंधी नहीं हैं। क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार तय करते समय अदालतें दस्तावेजों के समर्थन से रहित खोखले बयानों को सीधे खारिज कर सकती हैं।

विधिक एवं विधायी विश्लेषण: ‘धारा 134(2) ट्रेड मार्क्स एक्ट बनाम सीपीसी धारा 20 और फोरम शॉपिंग’

  • ‘इंडियन परफॉर्मिंग राइट सोसाइटी (IPRS) बनाम संजय डालिया’ [(2015) 10 SCC 161]:
    • सर्वोच्च न्यायालय की दो-न्यायाधीशों की पीठ ने स्पष्ट किया था कि ट्रेड मार्क्स एक्ट की धारा 134(2) और कॉपीराइट एक्ट की धारा 62(2) संसद द्वारा वादियों को सुविधा देने के लिए बनाई गई थी ताकि उन्हें दूर न जाना पड़े।
    • किंतु यदि वादी का मुख्य कार्यालय मुंबई में है और वादहेतुक भी मुंबई में उत्पन्न हुआ है, तो वह केवल इस आधार पर दिल्ली में केस नहीं कर सकता कि दिल्ली में उसका एक छोटा शाखा कार्यालय है। विधायिका का उद्देश्य वादी को ‘फोरम शॉपिंग’ करने और प्रतिवादी को अकारण प्रताड़ित करने का अधिकार देना कभी नहीं था।
  • ई-कॉमर्स युग में ‘ट्रैप परचेज’ (Trap Purchase) की विधिक सीमा:
    • डिजिटल क्रांति के दौर में लगभग हर उत्पाद देश भर में किसी न किसी वेबसाइट या डिलीवरी ऐप के जरिए मंगाया जा सकता है।
    • यदि केवल ऑनलाइन ऑर्डर डिलीवरी को क्षेत्राधिकार मान लिया जाए, तो भारत की 25 उच्च न्यायालयों और सैकड़ों जिला अदालतों की क्षेत्रीय सीमाओं का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। दिल्ली हाईकोर्ट ने बर्गर किंग और इंडी-गो विवादों के पूर्ववर्ती निर्णयों को सुव्यवस्थित करते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि “दुर्भावनापूर्ण तरीके से अधिकार क्षेत्र पैदा करने के लिए की गई खरीद” क्षेत्राधिकार नहीं बना सकती।
  • संवैधानिक नैतिकता और न्यायिक संघवाद:
    • संविधान के तहत बॉम्बे, मद्रास, कलकत्ता, कर्नाटक, गुजरात या इलाहाबाद जैसे सभी उच्च न्यायालयों को समान संवैधानिक दर्जा प्राप्त है।
    • जब दिल्ली बार या वादी केवल अपनी निजी सहूलियत, दिल्ली में वरिष्ठ वकीलों की मौजूदगी, या दिल्ली हाईकोर्ट के त्वरित अंतरिम आदेशों की परंपरा के आधार पर गैर-संबंधित मामलों को दिल्ली खींच लाते हैं, तो यह अन्य राज्यों के विधिक पारिस्थितिकी तंत्र (Legal Ecosystem) को पंगु बनाता है। न्यायमूर्ति कौरव का यह निर्णय न्यायिक विकेंद्रीकरण की दिशा में एक साहसिक मील का पत्थर है।

विधिक विवरण एवं संदर्भ

  • न्यायालय: दिल्ली उच्च न्यायालय, नई दिल्ली (मूल वाणिज्यिक एवं आईपी क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: एबीडी मेस्ट्रो प्राइवेट लिमिटेड बनाम ग्रेट गैलियन वेंचर्स लिमिटेड एवं संबद्ध वाद [CS(COMM) 17 Matters / 2026]
  • पीठासीन न्यायाधीश: न्यायमूर्ति पुरुषेन्द्र कुमार कौरव (Justice Purushaindra Kumar Kaurav) (एकल पीठ)
  • निर्णय की तिथि: 3 नवंबर 2026
  • निर्णय का आकार: 246 पृष्ठ
  • कार्यवाही का परिणाम: सभी 17 वाणिज्यिक आईपी मुकदमों में दिल्ली हाईकोर्ट के प्रादेशिक क्षेत्राधिकार का अभाव पाया गया; वाद वापस लौटाए गए/खारिज।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC):
      • धारा 20 — अन्य वाद वहां संस्थित किए जाएंगे जहां प्रतिवादी निवास करते हैं या वादहेतुक उत्पन्न होता है
      • आदेश 7 नियम 10 — वादपत्र का लौटाया जाना (Return of Plaint)
    • ट्रेड मार्क्स अधिनियम, 1999 (Trade Marks Act, 1999) — धारा 134(2) (मुकदमा दायर करने का विशेष स्थान) एवं धारा 29 (ट्रेडमार्क का उल्लंघन)
    • कॉपीराइट अधिनियम, 1957 (Copyright Act, 1957) — धारा 62(2) (अधिकार क्षेत्र के प्रावधान)
    • वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम, 2015 (Commercial Courts Act, 2015)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • बौद्धिक संपदा मुकदमों में प्रादेशिक क्षेत्राधिकार, फोरम शॉपिंग और न्यायिक अनुशासन का विधिक मानक: ‘दिल्ली उच्च न्यायालय बौद्धिक संपदा विवादों का एक प्रतिष्ठित मंच रहा है, किंतु यह अखिल भारतीय क्षेत्राधिकार का दावा कर अन्य राज्यों के उच्च न्यायालयों और प्राकृतिक मंचों के विकास को अवरुद्ध नहीं कर सकता; अदालतों को अपने अधिकार क्षेत्र की एक सख्त ‘लक्ष्मण रेखा’ खींचनी चाहिए और संस्थागत अनुशासन का पालन करना चाहिए; केवल किसी वेबसाइट का दिल्ली में सुलभ होना, या वादी द्वारा नियुक्त किसी निजी जांचकर्ता द्वारा क्षेत्राधिकार गढ़ने के उद्देश्य से किया गया रणनीतिक खरीद-फरोख्त (Trap Purchase) प्रादेशिक क्षेत्राधिकार का निर्माण नहीं कर सकता; ऑनलाइन उल्लंघन के मामलों में यह सिद्ध करना अनिवार्य है कि प्रतिवादी ने वाणिज्यिक रूप से दिल्ली के उपभोक्ताओं को लक्षित (Targeted) किया है; तथा जहाँ दिल्ली से संबंध मात्र नगण्य या आकस्मिक हो, वहाँ अदालत को ‘फोरम नॉन कन्वीनियंस’ के तहत गैर-प्राकृतिक वादों को सुनने से इनकार कर देना चाहिए।’
  • वर्तमान स्थिति व विधिक प्रभाव: यह निर्णय पूरे देश के बौद्धिक संपदा अधिवक्ताओं और कॉरपोरेट घरानों के लिए एक कड़ा संदेश है; अब वादियों को केवल दिल्ली हाईकोर्ट के आकर्षण में खिंचे चले आने के बजाय उन राज्यों के संबंधित उच्च न्यायालयों (जैसे बॉम्बे, कलकत्ता, कर्नाटक आदि) या स्थानीय वाणिज्यिक जिला अदालतों का रुख करना होगा जहाँ प्रतिवादी वास्तव में स्थित हैं या जहाँ व्यापारिक पैमाने पर उल्लंघन घटित हुआ है।

IP Cases:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतदिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court)
न्यायाधीशन्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव (Justice Purushaindra Kumar Kaurav)
साइटेशन / केसABD Maestro Private Limited v Great Galleon Ventures Ltd + 17 connected matters
फैसले की तिथि03 नवंबर 2026 (246 पन्नों का निर्णय)
मूल विवाददिल्ली से कोई ठोस संबंध न होने के बावजूद वादियों द्वारा दिल्ली हाईकोर्ट में IP (ट्रेडमार्क/कॉपीराइट) सूट दायर करना।
अदालत का अंतिम आदेश1. 17 वाणिज्यिक मुकदमों की सुनवाई से इनकार: वादियों को उचित क्षेत्राधिकार वाली प्रासंगिक अदालतों में जाने का निर्देश।
2. वेबसाइट/ऑनलाइन ऑर्डर पर स्पष्टीकरण: केवल वेबसाइट का दिल्ली में खुलना या रणनीतिक रूप से ऑनलाइन ऑर्डर देकर माल मंगवाना दिल्ली में क्षेत्राधिकार का आधार नहीं बन सकता।
RELATED ARTICLES

Most Popular

Patna
clear sky
21.6 ° C
21.6 °
21.6 °
78 %
2.6kmh
0 %
Fri
22 °
Sat
29 °
Sun
30 °
Mon
30 °
Tue
30 °

Recent Comments