Wednesday, September 30, 2026
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Proof of age: जन्मपत्री (Horoscope) उम्र का कानूनी सबूत नहीं… पॉक्सो केस में हाईकोर्ट ने कह दी बड़ी बात

Proof of age: दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए कहा है कि ‘जन्मपत्री’ (Horoscope) और ‘टीकाकरण कार्ड’ (Vaccination Card) को किसी व्यक्ति की आयु का आधिकारिक प्रमाण नहीं माना जा सकता।

जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की पीठ ने स्पष्ट किया कि POCSO अधिनियम के तहत ‘पीड़िता की उम्र’ सबसे मुख्य प्रश्न होता है, जिसे साबित करने की जिम्मेदारी पूरी तरह से अभियोजन पक्ष (Prosecution) पर होती है। अदालत ने 16 वर्षीय लड़की के अपहरण और बलात्कार के आरोपी को बरी करने के निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा है।

अदालत के मुख्य कानूनी तर्क: दस्तावेजों की प्रामाणिकता

  • अदालत ने आयु निर्धारण के संबंध में टिप्पणियां कीं।
  • जन्मपत्री का आधार: पीड़िता के पिता ने गवाही दी थी कि स्कूल में एडमिशन के लिए उसकी जन्मपत्री का उपयोग किया गया था। कोर्ट ने कहा, “स्वीकार्य रूप से, जन्मपत्री को जन्म तिथि का प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसलिए, जन्मपत्री के आधार पर स्कूल रिकॉर्ड में दर्ज की गई उम्र भी आयु का प्रमाण नहीं मानी जा सकती।”
  • टीकाकरण कार्ड: कोर्ट ने ‘च्चा-बच्चा रक्षा कार्ड’ या वैक्सीनेशन कार्ड को भी जन्म तिथि का वैध दस्तावेज मानने से इनकार कर दिया।
  • POCSO की लागूता: चूंकि अभियोजन पक्ष कोई ‘प्रामाणिक’ (Authentic) दस्तावेज पेश नहीं कर सका, इसलिए यह साबित नहीं हो पाया कि घटना के समय लड़की नाबालिग थी। अतः इस मामले में POCSO एक्ट लागू नहीं होता।

मामले की पृष्ठभूमि: विरोधाभासी गवाही

  • मामला: जनवरी 2013 में एक लड़की के अपहरण का मामला दर्ज किया गया था। उसे अमृतसर से बरामद किया गया, जिसके बाद आरोपी पर अपहरण, बलात्कार और पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज हुआ।
  • निचली अदालत का फैसला: जुलाई 2019 में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया था।
  • हाई कोर्ट का अवलोकन: हाई कोर्ट ने पाया कि पीड़िता की गवाही विश्वसनीय नहीं थी। उसके बयानों में कई भौतिक विरोधाभास (Material Contradictions) और सुधार (Improvements) पाए गए। घर छोड़ने की परिस्थितियों और आरोपी के साथ उसके पुराने संपर्कों को लेकर उसके बयान अस्थिर थे।

निष्कर्ष: संदेह का लाभ

अदालत ने अंततः यह माना कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ “संदेह से परे” (Beyond Reasonable Doubt) अपराध साबित करने में विफल रहा। ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई अवैधता या विकृति नहीं पाई गई, इसलिए हाई कोर्ट ने इसमें हस्तक्षेप करने से मना कर दिया।

एक नजर में: कानून की नजर में आयु प्रमाण की वरीयता

भारतीय कानून (विशेषकर जुवेनाइल जस्टिस एक्ट) के अनुसार, उम्र के प्रमाण के लिए वरीयता क्रम इस प्रकार है।

वरीयतादस्तावेज का प्रकार
प्रथमस्कूल का जन्म प्रमाण पत्र या मैट्रिकुलेशन सर्टिफिकेट (10वीं की मार्कशीट)
द्वितीयनगर निगम या पंचायत द्वारा जारी जन्म प्रमाण पत्र
तृतीययदि उपरोक्त उपलब्ध न हों, तो मेडिकल बोर्ड द्वारा ‘ऑसिफिकेशन टेस्ट’ (हड्डियों की जांच)
अमान्यजन्मपत्री, कुंडली, टीकाकरण कार्ड या अनुमानित गवाही
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